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सोमवार, 20 अगस्त 2012

Parampara .. Tradition (परंपरा)


Parampara .. Tradition
( 'परंपरा' का अंग्रेज़ी अनुवाद ) 
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * अंग्रेज़ी अनुवाद - एलिजाबेथ कुरियन 'मोना'


They are Earth- bear everything, remain silent
They are cows – provide milk, give calves too,
For their sake, we wage wars,
Then auction them at the crossroads:
We are not ashamed of this
This  is our tradition,
Our time honored tradition.

Since time immemorial,
They followed us
To suffer, put up with exile
To lead life in anonymity
And bear every curse;
Sometimes becoming Janaki,
Sometimes Draupadi, sometimes Shaivya ,
After all it is their duty.

And our duty?
What is our duty?
Do we have a duty?
  
When they are heavy with child,
We keep abandoning them in forests,
At the mercy of the five elements,
While we climb the stairs to heaven,
Holding  dog’s chain in our hands ,
Leaving them to melt in ice, part by part;
And when they bring the corpses of our children
Draped in half torn sarees,
We, as the cemetery’s custodians
Extracted full tax from them claiming
Also  the portion of their sarees remaining.

And we are not in the least ashamed
We have even auctioned even our queens
In the crossroads of Benaras
In the garb of the honest Harishchandra .
We have sold many princess Chandanbalas of Champa
In the market places of Kaushambi
In the role of the rich lord nagarseth.

At no time, either at a sale or an auction
Did anyone raise any objection;
No throne shook,
No authority spoke up
Nor a question raised in any  Parliament ;
Then why are you kicking up a row now?
We have not done anything new
We have merely auctioned a few girls,
Some women (some land, some cows)
In the markets of Eluru
अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2011/  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.
In the shops of villages in Andhra.

What’s new in this?
Why do you make so much noise?
Why raise a questioning voice?
We are not ashamed for this,
This is our tradition,
Our honored tradition.


परंपरा

वे पृथ्वी हैं-
         सब सहती हैं
         चुप रहती हैं,
वे गाय हैं-
         दूध देती हैं
         बछड़े भी देती हैं,
हम युद्ध करते हैं
उनकी खातिर
और फिर
लगाते हैं चौराहों पर
उनकी बोली।
         हम इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यह तो हमारी परंपरा है-
                          गौरवशाली परंपरा!

वे सदा से
चलती आई हैं
         हमारे साथ
झेलने के लिए
हर देश-निकाला,
हर एक अज्ञातवास
और हर एक अभिशाप-
         कभी जानकी बनकर,
         कभी द्रौपदी बनकर
         तो कभी शैव्या बनकर।
आखिर यही तो
         उनका धर्म है न !

और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या है हमारा धर्म???

छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें
बियाबान में
पंचतत्वों के हवाले,
         गर्भवती होने पर।
चढ़े चले जाते हैं हम
कुत्तों की ज़ंजीर थामे
स्वर्ग के सोपान पर,
छोड़कर उनके एक एक अंग को
         बर्फ में गलता हुआ।
और जब वे आती हैं
आधी साडी़ में लपेटे हुए
हमारे अपने बच्चों की लाश को,
वसूलते रहे हैं हम
पूरा पूरा टैक्स
मसान के पहरेदार बनकर
बची खुची आधी साड़ी से।

और हम
         इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,
          आखिर यह हमारी परंपरा है-
                                 गौरवशाली परंपरा!

नीलाम किया है हमने
अपनी रानियों तक को
बनारस के चौराहों पर
         सत्यवादी हरिश्चंद्र बनकर।
बोली लगाई है हमने
चंपा की राजपुत्री चंदनबालाओं तक की
कौशांबी के बाज़ारों में
         धनपति नगरसेठ बनकर।
कभी.......
किसी नीलामी पर
किसी बोली पर
         किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ,
         कोई आसन नहीं डोला,
         कोई शासन नहीं बोला, 
         और न ही कभी
         एक भी सवाल उठा-
                   किसी संसद में।

फिर अब क्यों बवाल उठाते हो?

कुछ नया तो नहीं किया हमने ;
कुछ लड़कियों, कुछ औरतों को-
(कुछ ज़मीनों, कुछ गायों को)-
         नीलाम भर ही तो किया है
         एलूरु के बाज़ारों में,
         आंध्र के गाँवों की हाटों में।

इसमें नया क्या है?
क्यों बवाल मचाते हो??
क्यों सवाल उठाते हो???
         हम तो इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यही तो हमारी परंपरा है-
                           गौरवशाली परंपरा!
http://bit.ly/K5HUpx

('देहरी', पृष्ठ 77)

नाभि कुंडं (नाभि कुंड )


नाभि कुंडं
('नाभि कुंड' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.


पदे,पदे वॆंटाडे
कलनॊक्कटि कांचनु
करवाडिन कुठारान्नि
करमुलतो पट्टि नीवु
नडयाडुतुन्नावु
नलुबाटल कूडलि लो

निनु कांचग कूडारा
नडि बाटन जनालु
धरिंचारु मोमुलपै
प्रेमामीर तॊडुगुलु
चाकलोडि वदनान्नि
तलपिंचे तोडुवुलु

कुरिपिंचरंतलोने
प्रश्नल वाडगळ्ळु
नापै नी अप्रियतकु
प्रमाणालु येमिटनि?

ना अशोक वाटिकलो
बहु दिनालु भारंगा
शोक देवतै नीवु
निवशिंचाल्सो च्चिंदि .

अपुडे अरुदॆंचुताडो राकुमारुडु
रूपं लो अतडेमो वन कुमारुडु

नी चेतिलोनि कुठारान्नि
तन कारान धरिंचि
ना नाभि कुंडान
दागिन अमृत भांडम्
मुलालतो मट्टुपॆट्टॆ
राकुमारुडु
मिन्नु विरिगि मीदपडितॆ
तॆगिपोयिन तरुवुला
नेलकॊरिगिपोयावु अपुडे नुव्वु

कानी कांचे कललु कल्लले कदा !
कालेववि ऎन्नटिकी निजालकि, ऎल्ललु


    నాభి కుండం 


పదే,పదే వెంటాడే 
కలనొక్కటి కాంచను 
కరవాడిన కుఠారాన్ని
కరములతో పట్టి నీవు 
నడయాడుతున్నావు 
నలుబాటల కూడలి లో 


నిను కాంచగ కూడారా 
నడి బాటన జనాలు 
ధరించారు మోములపై 
ప్రేమామీర తొడుగులు 
చాకలోడి వదనాన్ని 
తలపించే తోడువులు 

కురిపించరంతలోనే 
ప్రశ్నల వాడగళ్ళు 
నాపై నీ అప్రియతకు 
ప్రమాణాలు యేమిటని? 

నా అశోక వాటికలో
బహు దినాలు భారంగా 
శోక దేవతై నీవు 
నివశించాల్సో చ్చింది .

అపుడే అరుదెంచుతాడో రాకుమారుడు 
రూపం లో అతడేమో వన కుమారుడు 

నీ చేతిలోని కుఠారాన్ని
తన కారాన ధరించి 
నా నాభి కుండాన
దాగిన అమృత భాండమ్ 
ములాలతో మట్టుపెట్టె 
రాకుమారుడు 
మిన్ను విరిగి మీదపడితె 
తెగిపోయిన తరువులా
నేలకొరిగిపోయావు అపుడే నువ్వు 

కానీ కాంచే కలలు కల్లలే కదా !
కాలేవవి ఎన్నటికీ నిజాలకి, ఎల్లలు


नाभिकुंड

एक सपना
दिखाई देता है मुझे बार–बार :
तुम्हारे हाथों में
थमा दी गई है एक कुल्हाड़ी
बीच बाज़ार में
और
धोबियों के मुखौटे लगाए हुए
बहुत सारे लोग
माँग रहे हैं तुमसे
मेरे प्रति अप्रेम का प्रमाण,
गुज़ारने पड़े थे न तुम्हें
कई दिवस
मेरी अशोक वाटिका में !
तभी आता है कोई
वनवासी राजकुमार,
तुम्हारे हाथ से लेकर कुल्हाड़ी
काट डालता है
मेरी नाभि में छिपे अमृतकुंड की जड़ें;
और तुम –
कटे पेड़ की तरह ढह जाती हो !

पर –
सपने तो सपने होते हैं न !

('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 16)

रविवार, 12 अगस्त 2012

मृत्यु आती है


मृत्यु आती है
रोज़,
हर पल
अलग अलग भेस में
अलग अलग अंदाज़ में,
खेलती शिकार
करती आखेट.

उस बार वह आई थी
अलस्सुबह.
पेड की कटी शाख से
कूद पड़ी थी बूढ़े सफ़ेद वेताल की तरह
बीच रास्ते
और लाद कर ले गई थी कंधे पर विक्रम को.
लोग कहते रह गए
बस नाक से खून गिरा था,
और तो कोई चोट नहीं.

अगली बार जब वह आई
चुपचाप दबे पाँव पीछे खडी हो गई ठिठुरती सी
ठेलती रही तिल तिल भर धूप की ओर;
और अचानक लगा गई छलांग
पहाड़ी के छज्जे से गहरी खाई में,
बिल्ली ने दांतों में दबोच ली थी गरदन.

अगले दिन वह फिर आई
शेर की तरह ठहरी रही चट्टान पर
कई पहर,
और फिर टूट पड़ी कहर सी ,
एक ही पंजे में नोच ली रगे-जाँ;
एक-एक साँस निचोड़ ली थी पछाड़ पछाड़ कर.

उसका खेल रुकता थोड़े है.
उसने फिर भेस बदला,
साँप की तरह रेंगती हुई आई और
सरक गई खून की नालियों में.
पता तो तब चला जब देह लहराई
और सारी नसें तड़तडाकर फटने लगीं.
उसे क्या; वह तो रक्त में स्नान कर अट्टहास करती है
और अचानक चुपचाप ताकने लगती है
अगले शिकार को पगलाई आँखों से.

वह देखो; उसने फिर भेस बदला.
समुद्रतट की रेत को गुदगुदाते हैं अनेक दानवाकार केकड़े
और जकड लेते हैं बहते पानी तक को
रौरव नरक जैसी अपनी कुरूप टांगों में.
उछालें मारता है समुद्र,
चीत्कार करती हैं लहरें;
बडवानल के उदर में घुसते चले जाते हैं
केकड़ों के विषैले नाखून,
और वह करती है ज्वार भाटे के सीने पर
उन्माद से परिपूर्ण तांडव नृत्य
मथती हुई दसों दिशाओं को.

पर वह थकती नहीं,
वह छकती भी नहीं;
फिर आती है,
फिर फिर आती है.
अभी उस शाम वह फिर आई थी
बहुत शांत
बहुत शालीन.
कोने में ठहरी रही
प्यार से मुस्कराती;

इतने ही प्यार से आई हो उतर कर
तो स्वागत है तुम्हारा.
मैं बाँहें पसार कर आवाहन करता हूँ
अपने पिता और पितामह की तरह.
आओ, हे मृत्यु, आओ;
मुझे अपनी गोदी में समा लो -
चिर शांत क्रोड़ में;
और मुक्त कर दो!
तुम्ही तो माँ हो
मुझे फिर फिर जनोगी!!

शनिवार, 11 अगस्त 2012

Many a name did they give me (कई नाम दिए उन्होंने मुझे)



Many a name did they give me 
'कई नाम दिए उन्होंने मुझे' का अंग्रेज़ी अनुवाद )    
              हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा   *  अंग्रेज़ी अनुवाद -  एलिजाबेथ कुरियन 'मोना'


They gave me a name – Mother
And secured for themselves many liberties
To till me like the earth
Then to abandon me.

They gave me a second name - Sister
And secured for  themselves the right
To seize my rights
Then to abandon me.

The third name was – Wife
They secured for themselves
A set of powers and dominations
To capture all I had
Then to abandon me .

The fourth name  - Daughter
They  secured for themselves
The steps to heaven , having done kanyadaan
Tying me to an alien stump, helpless.

One more name they gave me – Whore
And secured for themselves titles- 
Purifier, reformer and savior
And kept pushing me time and again
Into hell of their own lust.


 कई नाम दिए उन्होंने मुझे

 

उन्होंने मुझे
एक नाम दिया - माँ
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
बहुत सारी स्वतंत्रताएं
दुहने की ज़मीन की तरह मुझे 
और उपेक्षित छोड़ देने की.

 उन्होंने मुझे
दूसरा नाम दिया - बहन
और अपने लिए सुरक्षित कर लिए
बहुत सारे अधिकार
मेरा अधिकार हड़पने के
और उपेक्षित छोड़ देने के .

  उन्होंने मुझे
तीसरा नाम दिया - पत्नी
और अपने लिए सुरक्षित कर लिया
दुनिया भर का प्रभुत्व और वर्चस्व
मेरा सर्वस्व हरण करने को
और उपेक्षित छोड़ देने को. 

 उन्होंने मुझे
चौथा नाम दिया - बेटी
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
स्वर्ग की सीढियां , करके कन्यादान
बाँध कर पराये खूंटे पर अरक्षित मुझे. 

 उन्होंने मुझे
एक और नाम दिया - वेश्या
और आरक्षित कर ली अपने लिए
भूमिका पतितपावन , उद्धारक और मसीहा की
धकेलते रहने को बार बार मुझे
उनकी अपनी वासना के नरक में .......

('देहरी', पृष्ठ 31)

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

भगवती, पत्‍नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ (पत्नीं मनोरमां देहि)



भगवती, पत्नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ
('पत्नीं मनोरमां देहि' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  *  मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति



* व्यवस्था जरुरी थिक समाज के सुचारु संचालनकहेतु। ए॓हि हेतु
ओ ’घर’ आओर ’बाहर’ बँटवारा कयलनि

एकरा संगे-संगेबाँटि देलन्हि श्रम के।
जन्मना स्त्री होयबाक कारण, हमरा हिस्सा में ’घर’ आओर ’घर’ काज
आबि गेल।
ओ शै‌नेः शै‌नेः मालिक बनइत गेलाह आओर हम गुलाम।
हम चाहियोक अपन दायरा नहि बद‌इल सकलहूँ।
सेवा कयनाइ आब हमर भाग्य बनि चूकल छल।
 

* मालिक त मालिक होइत अछि।
गुलाम ओकरा लेल मेहनत आ उत्पादन करैत अछि।
हम औरत सब मिलक बुझि पर‌‍इत अछि जेना, अपन मेहनत आओर उत्पादन
मालिकक नाऊ क देल्हूँ।
घर बनयलहूँ हम- बसयलहूँ हम।
मालिक भ गेलाह ओ।
हमर मालिक त छलाह पहिलहि सँ, आब घरक मालिक सेहो भ गेलाह।
आओर त आओर हमर, धिया-पुता सेहो हमर नहि रहल।
उत्पादक स्‍त्री, उत्पादन स्‍त्रीक; उत्पाद मालिकक।
हमर परिश्रमक फल, हमर सृजनक फल- दुनु हमर नहि भेल।।
 

* देह सँ हम श्रम कयलहुँ आओर सृजन।
उत्पादन आओर पुनरुत्पादन- दुनु हमर मेहनत हमर भक हमर
नहि अछि।
नहि देह पर नहि घर-द्वार पर हमर अधिकार अछि।
अपना लेल, अपना शरीरक लेल, अपना घरक लेल, अपना
धिया-पुताक लेल- किछु फैसला करबाक अधिकार नहि अछि हमरा हाथ में।
सब फैसला कर लगलाह ओ- कहियो पिता ब‍इनक त कहियो
पति ब‍इनक।
ओ दिन सेहो आबि गेल जखन ओ फैसला लेब‍अ लगलाह,
स्‍त्री के जन्म लेबाक चाही वा नहि।
पुरुख विधाता बनि चुकल छल।
बुझि पर‍इत अछि विधाता केओ पुरुखे रहल हेताह- कखनो वा कहियो॥

* सब निर्णय हुनका हिस्सा में आबि गेल।
आओर हमरा हिस्सा में परल अनुकरण,अनुगमन,अनुपालन,अनुसरण।
बेशक ओ हमरा देवी बनाक पुजल‌इथ सेहो।
मुदा कतेक चलाकी सँ हमर अजादीक बंधक-पत्र पर दस्खत करवा लेलैथ।
भक्‍त बनि हमरा सामने अयलाह; आओर हाथ जोड़िक विनती कयलाह-
"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृतानुसारिणी/
तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम।"
हँ ! ओ हमरा पत्नी बना लेलाह-हमरा हुनकर आज्ञाक जरे-जरे
हुनकर मानसिक आ अप्रकट इच्छाक अनुसरण सेहो करअ परत।
अपन कुलीनता आ पवित्रताक बल पर, हुनका पाप‍अक दुर्गम
संसार सागर सँ बेड़ा पार सेहो लगावअ पड़त।
हम त साधन छी, हम माध्यम छी - मात्र हुनकर मुक्‍तिक लेल॥

* आओर हमर मुक्‍ति?

[हमर देहक मुक्‍ति, हमर मनक मुक्‍ति, हमर आत्माक मुक्‍ति ??
हमर व्यक्‍तिक मुक्‍ति, सामाजिक मुक्‍ति- आर्थिक मुक्‍ति आओर आध्‍यात्मिक मुक्‍ति ???
नहि हमर मुक्‍तिक कोई अर्थ नहि अछि -जखन तक हम परछाईं छी।
परछाईं कहियो मुक्‍त नहि हो‍इत अछि।
हम...परछाईं छी हम...चिरबद्ध परछाईं।
स्‍त्री नहि छी हम ?] 

पत्नीं मनोरमां देहि

* व्यवस्था ज़रूरी है समाज के सुचारू संचालन के लिए। इसलिए 
उन्होंने 'घर' और 'बाहर' का बंटवारा कर दिया।


इसी के साथ बंटवारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में 'घर' और 'घर का काम' आ गया।
वे धीरे-धीरे मालिक बन गए और मैं गुलाम।
मैं चाहकर भी अपना क्षेत्र नहीं बदल सकती थी।
सेवा करना ही अब मेरी नियति थी !


  • मालिक तो मालिक है।
गुलाम उसके लिए मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं।
हम औरतों ने भी अपनी मेहनत और अपना उत्पादन सब जैसे मालिक के नाम कर दिया।
घर बनाया हमने - बसाया हमने।
मालिक वे हो गए।
होते ही.
हमारे मालिक थे, तो हमारे घर के भी मालिक थे।
हमें बहलाना भी उन्हें खूब आता था।
वस्तुओं पर हमारे नाम अंकित कर दिए गए।
हम खुश।
पर सच तो यही था कि नाम भले हमारे लिखे गए हों, सब कुछ था मालिक का ही।
और तो और, हमारे बच्चे भी हमारे न थे।
उत्पादक स्त्री, उत्पादन स्त्री का; उत्पाद मालिक का।
हमारे श्रम का फल, हमारे सृजन का फल - दोनों ही हमारे न हुए.


  • देह से हमने श्रम भी किया और सृजन भी।
उत्पादन और पुनरुत्पादन - दोनों क्षमताएँ हमारी होकर भी हमारी न रहीं।
न देह और न घर - पर हमारा नियंत्रण रहा।
अपने बारे में, अपने शरीर के बारे में, अपने घर के बारे में, अपनी संतान के बारे में - कोई फैसला करने का हक हमारे पास नहीं रहा।
सारे फैसले हमारे लिए वे करने लगे - कभी पिता बनकर, तो कभी पति बनकर।
वह दिन भी आ गया जब स्त्री को जन्म लेना है या नहीं, यह भी वे ही तय करने लगे।
पुरूष विधाता बन गया।
शायद विधाता कोई पुरूष ही होगा - अगर कहीं हो, या कभी रहा हो।

  • सारे निर्णय उनके हिस्से में आए।
और मेरे हिस्से में आया अनुकरण, अनुगमन, अनुपालन, अनुसरण।
बेशक, उन्होंने मुझे देवी बनाकर पूजा भी।
पर कितनी चालाकी से मुझसे मेरी आजादी के बंधक-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए।
भक्त बनकर आए वे मेरे सामने; और हाथ जोड़कर याचना की -"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणी/तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम। "
हंह!उन्होंने मुझे पत्नी बना लिया - मुझे उनकी आज्ञाओं का ही नहीं, मानसिक और अप्रकट इच्छाओं का भी अनुसरण करना होगा,
अपनी कुलीनता औ पवित्रता के बल पर मैं उन्हें पापों के दुर्गम संसार सागर के पार ले जाऊं।
मैं तो साधन हूँ, माध्यम भर हूँ - उनकी मुक्ति के लिए।

  • और मेरी मुक्ति?

[मेरी देह की मुक्ति, मेरे मन की मुक्ति, मेरी आत्मा की मुक्ति??
मेरी वैयक्तिक मुक्ति, मेरी सामाजिक - आर्थिक मुक्ति, मेरी आध्यात्मिक मुक्ति???
नहीं, शायद मेरी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं - जब तक मैं छाया हूँ।
छाया कहीं कभी मुक्त होती है?
तो...छाया हूँ मैं...चिर बद्ध छाया?

स्त्री नहीं हूँ मैं?]

('देहरी', पृष्ठ 81)

हम छी मनमौजी (स्वेच्छाचार)



हम छी मनमौजी 
('स्वेच्छाचार' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  *  मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति   


 हँ, हम छी मनमौजी.

ओ हमरा हर में जोतअ चाहलैथ
हम जुआ गिरा देल्हूँ.
ओ हमरा पर सवारी लादअ चाहलैथ
हम हौदा उलइट देल्हूँ.
ओ हमर माथ रौंद चाहलैथ
हम कुंडली लपेटि पट‌इक देल्हूँ.
ओ हमरा जंजीर में बान्ह चाहलैथ
हम पग घूँघरु बान्हि सड़क पर आबि गेल्हूँ!

आब ओ हमरा सँ कर‍इत छथि घृणा,
हम छी महा ठगनी कह‍इत छथि,
हमर परछाईं तक सँ दूर भाग‍इत छथि,
बेचारा परछा‍ईं सँ भअ चूकल छथि आन्हर,
हिरण्मय आलोक कोना झेलताह।

हँ हम छी मनमौजी!

हम अपन गिरिधर सँ प्रीत कयलहूँ,
हुनका वरण कयलहूँ,
गल्ली गल्ली ढिंढोरा पीटलहूँ
जिनकर माथ पर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

हमर पियाअक सेज सूली पर,
अति मन भावन,
हम एकरा स्वयं चुन्लहूँ।



स्वेच्छाचार

                                                                                                                              हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.

उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया ,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!

अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!

हाँ,मैं हूँ स्वेच्छाचारी!

मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की-
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!

मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!

('देहरी', पृष्ठ 41)

गुडिया-गाय-गुलाम (मैथिली में)


गुडिया-गाय-गुलाम 
('गुडिया-गाय-गुलाम' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  * मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति   

परसु अहाँ हमरा 
हल्ला कर‍अ वाली गुड़िया बुइझ 
जमीन पर पट‍इक देल्हूँ
आओर पैर सँ रौंदल्हूँ हम कोनो शिकायत नहि कयलहूँ।

काल्हि अहाँ हमरा 
अपन खुँटा परअक गाय बुझि
हमरा पैर में पगहा बांधि देल्हूँ
आओर दुहि देल्हूँ हमरा , हम कोनो शिकायत नहि कयलहूँ।

आई अहाँ हमरा 
अपन हुक्म‍अक गुलाम बुझि
गरम सलाख सँ जी दा‍इग देल्हूँ आओर अखनो चाहैत छी 
हम कोनो शिकायत नहि करु !

न‍इ! 
हम गुड़िया नहि छी
हम गाय नहि   छी 
हम गुलाम नहि  छी !!



परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 

कल तुमने मुझे
अपने खूंटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 

आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ.

नहीं!
मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!!
('देहरी', पृष्ठ 1)

विनती (निवेदन)


 विनती
('निवेदन' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  * मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति   


जीवन 
बड्ड छोट थिक 
नम्हर अछि तकरार,
एकरा आओर नहिं खींचह राअर ।

ओहुना हमर-तोहर,
भेंट भेल छल बड्ड देर सँअ,
जन्मक फेर में प‍इरक,
भेंट भक‍अ रहि गेलहूँ अछूत,
देहअक घेर में ।

संसारअक बंधन की कम अछि,
जे अपन्हुँ घेर बना लेल्हूँ
लोक लाजअक पट की कम प‍इर गेल छ्ल
जे लगा लेलहूँ,
शक-शुभाअक ताला ।

कखनहूँ,
काँप‌इत पँखुड़ी पर,
तृण अंकित कर‌इत अछि चुंबन,
सौ-सौ प्रलयअक,
झंझा में,
जीवित अछि झंकार
इ थिक अनहद उपहार ।

कखनहूँ कुछ पलअक लेल,
मिललहूँ हम ए॓ना,
एक धार में बहबाआक हेतु,
काल-कोठरी में,
मृत्यु-प्रतीक्षाआक हेतु
संग-संग रहबाआक हेतु

काँटाआक उपर सेज सजा क,
मीरा भेल दीवानी
शीश काटि,
राखि देलअक,
पियाअक चौखट पर,
कबिरा ।

मिलन महोत्सव
दिव्य आरती,
रोम-रोम गाव‌इत अछि,
आकाशअक थारी में सूरज-चान,
चौमुख दियरा बारि,
गुंजी पड़ल अछि,
मंगलाचार !!

भोर भेल,
हम ब‍इन गेल्हूँ शँख,
साँझ भ॓ल्हूँ मुरली,
छिरयल्हूँ लहर-लहर ब‍इन,
रेत ब‍इन सुधि लेलहूँ।

स्वाति‍इक बुँद अहाँ भेलहूँ
कखनहूँ, हम
चातक तृषा अधुरा,
सोन चम्पई गंध
भेल्हूँ अहाँ,
हम हिरना कस्तुरी।

आब ,
प्राण जाए पर लागल अछि,
अखनहूँ त मान छोड़ूह,
आँखि‍इक कोर सँअ झर‌इत टप-टप,
तपित भेल हरसिंगार ,
मुखर मौन कर‌इत अछि मुन्हार।




जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लंबी है तकरार !
और न खींचो रार !!

यूँ भी हम तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में।

जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोकलाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?

कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुंबन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार !
वह अनहद उपहार !!

केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के।

सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने।

मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चंदा
चौमुख दियना बार !
गूँजे मंगलचार !!

भोर हुए
हम शंख बन गए,
साँझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली।

स्वाति-बूँद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचंपई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी।

आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार !
मुखर मौन मनुहार !!

("प्रेम बना रहे"- पृष्ठ 81)

सोमवार, 6 अगस्त 2012

Doll, Cow, Slave (गुड़िया, गाय, गुलाम)

Doll - Cow - Slave
( 'गुडिया-गाय-गुलाम' का अंग्रेज़ी अनुवाद )
              हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा   *  अंग्रेज़ी अनुवाद -  एलिजाबेथ कुरियन 'मोना'

The other day, thinking that
I was a screaming doll, 
You thrashed me on the ground 
And  trampled me under your foot. 
I did not complain.

Yesterday, thinking that
I was a cow tethered to your post,
You pinioned my legs with rope 
And milked me dry. 
I did not complain.

Today, thinking that
I am your bonded slave, 
You burn my tongue with hot iron .
Now also you wish that 
I should not complain.

No! I am not a doll! 
I am not a cow!! 
I am not a slave!!



परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 

कल तुमने मुझे
अपने खूंटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 

आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ.

नहीं! मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!!
('देहरी', पृष्ठ 1)