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सोमवार, 30 मई 2011

कुर्सी : रोटी

कुर्सी मुकुट और दरबार 
रोटी पेटों की सरकार 
       कुर्सी भरे पेट का राज 
       रोटी भूखों की आवाज़ 
              कुर्सी सपनों का संसार 
              रोटी मजबूरी-बेगार 


 कुर्सी शीश चढ़े कुछ फूल 
रोटी पाँव चुभे कुछ शूल 
              कुर्सी रक्त-रक्त की प्यास 
                रोटी स्वेद कणों की आस 
                           कुर्सी ज़हरीला इतिहास 
                          रोटी सुकराती विश्वास 

कुर्सी अकबर की बंदूक
रोटी राणा की इक चूक 
       कुर्सी सतसइया सिंगार
       रोटी भूषण की हुंकार  
              कुर्सी जलियाँवाला बाग़
              रोटी ऊधमसिंह की आग 


   कुर्सी जिन्ना: की तकरार 
रोटी गांधी का अवतार 
              कुर्सी धर्मों का संग्राम 
               रोटी हडताली आसाम 
                              कुर्सी सोया देश तमाम 
                               रोटी जागृति का पैगाम
31 अक्टूबर,1981  

मंगलवार, 24 मई 2011

हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं



हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं
हर लौ घर की ही दुश्मन है, दीपक जो भी बाले हैं

बाँहों में थिरके है तन पर
मन का पंछी तड़प रहा
होंठ-होंठ मुस्कान धरी पर
शूल आँख में कसक रहा
              संबंधों की कौन कहेगा
              व्यापारिक अनुबंध हुए!
यहाँ हिमालय के भीतर ही
आतुर लावा दहक रहा

दूध-चांदनी में धुलकर भी,  सारे गजरे काले हैं
हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं

विश्वासों की मौन बालिका
दुष्यंतों से छली गई
और इत्र बन जाने खातिर
बिना खिली हर कली गई
                शहनाई की आवाजें हैं
                सभी दृष्टियाँ सूनी हैं!
किसकी डोली उठी न जाने
किसकी अर्थी चली गई

गाए कौन मल्हार-मर्सिया, शब्द-शब्द पर ताले हैं
हर लौ घर की ही दुश्मन है, दीपक जो भी बाले हैं

28 अक्टूबर 1981