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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अनुनाद



ज़िंदगी के
नाद पर
बजता हुआ
अनुनाद है ;
          कविता कहाँ,
          अनुवाद है!


बाँसवन में
गूँजती है
बाँसुरी की धुन,
औ’ प्रमदवन में
खनकती
झाँझरें रुनझुन; 
राधिका बनकर कभी मन
छेड़ता है तान,
फिर कभी बन राम
करता
जानकी संधान; 
नयन
नयनों से करें जब
मौन संभाषण,
या कि मानस वीथिका पर
गुप्त संप्रेषण;  
जबकि कालिंदी किनारे
कृष्ण मेघों से डरे,
राम घन की दामिनी में
स्मरण सीता का करे;
जान लो तब
यह हृदय का
हृदय से
संवाद है!


जब कभी थक कर
किसी ने
फेर ली आँखें,
जब कभी बोझिल हुई हैं
भींजकर पाँखें; 
जबकि सारे पात
पतझर
की अमानत हो गए,
झर गए सब पुष्प
असमय
हो गईं निर्वस्त्र शाखें; 
साथ सोई छाँह को भी
छोड़कर छल से
घोर वन में
या भवन में, 
प्राण
नल औ’ बुद्ध
बनने के लिए
जब शून्य ताके,
जब हृदय
गलकर, पिघलकर,
आँसुओं के मोतियों की
आब बन झाँके;
काव्य का क्षण 
वह
युगों की पीर है,
अवसाद है!


हादसों पर हादसे
जब भूमि पर घटते,
देख शोषण दीन जन का
घोर घन फटते; 
मेरुदंडों की सिधाई की सज़ा में
होंठ सिल जाते जभी
या
शीश कटते, 
या कि भींतों में
चिने जाते
कभी निर्भीक बच्चे; 
बींध देतीं सूलियाँ जब
प्रेम की
हर एक नस, 
जब पिलाया जाय
सच के
पक्षधर को विष; 
भीड़ हो दुःशासनों की -
कीचकों की-
जयद्रथों की - 
तब चले जो चक्र बनकर
शंख बन गूँजे-
वही
प्रतिवाद है!
(ताकि सनद रहे : ऋषभ देव शर्मा : प्रकाशन काल - 2002)

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

जल ही जीवन

गोमुख से चला तो कितना स्वच्छ था मैं
पुण्य फल का प्रतीक
पवित्रतम
सौभाग्य से परिपूर्ण!

और फिर बीच राह में
वे सब मिले एक के बाद एक
मेरी पहचान मिटाने को आतुर
जाने कितने नाले-पनाले
त्रिशंकु की लार से उपजी कर्मनाशा सरीखे!!

...अब मैं वैतरणी का कुंड हूँ
दुर्भाग्य से दबा
बदबू से भरा
दिव्यता का ऐसा घृणित परिणाम
सोचा न था!!!

आज भी तुम कहते हो
मेरी ही नाभि में है
अपराजेय सुगंध की शाश्वत झील?
                       
3.1. 2017.............................

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

प्रफुल्लता

प्राण की अमराइयों में
प्रीत का कोकिल

बोल उट्ठा ...

बौर रोमों में
उठे हैं खिल


31 मार्च, 2000

मैं उजला होने आया...

मैं उजला होने आया था,
जग ने और कलुष में धोया!
जिसको धोने की खातिर मैं,
दिवस-रैन जन्मों तक रोया!!

31 मार्च, 2000
14:00 

सोचा था आकाश बनूँगा ...

सोचा था, आकाश बनूँगा, पर पाषाण बना
पुष्प वाटिका जली, यज्ञ-मंडप श्मसान बना


प्रभुओं की स्तुति छोड़, तनिक जो दोष बताया तो
कल तक का भगवान, आज पापी शैतान बना


मैंने जिसको छुआ कभी वह, पानी अमरित था
पर अपनों का अमरित दान, मुझे विष पान बना

30 मार्च, 2004.
रात्रि 02:20


मंगलवार, 20 सितंबर 2016

प्यार का पर्याय पूछा सिंधु से कल शाम


Dr. Rishabha Deo Sharma reciting his famous geet "Pyar ka paryaay pucha Sindhu se kal shaam" in Vishva Vatsalya Manch meeting in Hyderabad on Sept. 19th 2016.

सवैया, दोहे और प्रेमगीत



Dr. Rishabha Deo Sharma reciting his poem in Vishva Vatsalya Manch meeting in Hyderabad on Sept. 19th 2016

बहरापन : पाँच छोटी कविताएँ



Dr. Rishabha Deo Sharma addressing members of Kadambini Club and reciting his poems in Kadambini Club Sept 2016 meeting