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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

बचपन की तलाश

वह खोए बचपन की तलाश करता हुआ अचानक बच्चों के बीच पहुँच गया।
पर यह देखकर सकते में आ गया कि बच्चे तो उससे ज़्यादा बूढ़े लगने लगे हैं।
तनाव और थकान से भरे बच्चे बड़े अजनबी से लगे उसे।
वे उसे पहचान भी नहीं सके।
वह भी कहाँ उन्हें पहचान सका था!
खिलना-खिलखिलाना वे भूल चुके थे - अभिनय ज़रूर कर रहे थे।
उसे याद आया; उसी ने तो दिया है बच्चों को यह असुरक्षित वर्तमान और अनिश्चित भविष्य।
••• और वह वापस अपनी काल कोठरी में लौट आया।

वह शाम

शाम थी कैसी कि नटखट बादलों में हम घिरे थे।
सब दिशाएँ खो गई थीं, भटकते यूँ ही फिरे थे।।
याद हैं फिसलन भरी क्या चीड़ की वे पत्तियाँ?
एक-दूजे को संभाले दूर तक जिनसे गिरे थे।।

गुस्सा

पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था।
आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।।
मैं जिसे गुस्सा समझ ताज़िंदगी डरता रहा;
डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।

सम्मोहन

अमरित की कनी ज़हर में डुबाई है।
चमकती हुई तलवार निकल आई है।।
यह अलौकिक रूप नज़रें बाँध लेगा;
आज बिजली चाँदनी में नहाई है।।

भय

डर रहे बूढ़े सयाने, सब कहें 'हम क्या करें'?
छिप गए सब कोटरों में, जान कर भी क्यों मरें??
चाँदनी में बाल खोले, घूमती है प्रेतनी!
और बच्चे हैं कि बाहर खेलने की ज़िद करें!

जीवन जो जिया

झल्लाई सी सुबह, पगलाई सी शाम।
क्रोध भरी दोपहर, यों ही दिवस तमाम।।
प्रेत ठोकते द्वार, ले ले मेरा नाम!
रात भूतनी बनी, यहाँ कहाँ विश्राम।।

इतिहास बनाने वाले

खेत काटकर सड़क बना दी, सभी सुखा दीं क्यारी।
मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो हैं व्यापारी।।
कहीं तुम्हारी विजय कथा में, मेरा नाम नहीं है!
ब्रज का सब कुछ हरण कर लिया, प्रभुता यही तुम्हारी।।

दौड़

मैंने जिनके वास्ते सब छल किए।
सौ बलाएँ लीं, सदा मंगल किए।।
वक़्त का क्या फेर? सत्ता क्या गई?
वे मुझी को छोड़, आगे चल दिए।।

युद्ध

हाथ में लेकर पताका शिखर पर चढ़ता रहा।
आदमी अपनी सरहदें खींचकर लड़ता रहा।।
भूमि जिसके नाम पर खून से लथपथ पड़ी है!
सातवें आकाश पर वह बैठकर हँसता रहा।।

मानव अधिकार

मरता है कोई छात्र तो सियासत न कीजिए।
भूखों मरे किसान तो तिजारत न कीजिए।।
हैं आप बड़े बुद्धिमान, शब्दों के खिलाड़ी!
लेकिन पिशाच कर्म की वकालत न कीजिए।।