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शुक्रवार, 25 मई 2012

परंपरा


वे पृथ्वी हैं-
         सब सहती हैं
         चुप रहती हैं,
वे गाय हैं-
         दूध देती हैं
         बछड़े भी देती हैं,
हम युद्ध करते हैं
उनकी खातिर
और फिर
लगाते हैं चौराहों पर
उनकी बोली।
         हम इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यह तो हमारी परंपरा है-
                          गौरवशाली परंपरा!


वे सदा से
चलती आई हैं
         हमारे साथ
झेलने के लिए
हर देश-निकाला,
हर एक अज्ञातवास
और हर एक अभिशाप-
         कभी जानकी बनकर,
         कभी द्रौपदी बनकर
         तो कभी शैव्या बनकर।
आखिर यही तो
         उनका धर्म है न !


और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या है हमारा धर्म???


छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें
बियाबान में
पंचतत्वों के हवाले,
         गर्भवती होने पर।
चढ़े चले जाते हैं हम
कुत्तों की ज़ंजीर थामे
स्वर्ग के सोपान पर,
छोड़कर उनके एक एक अंग को
         बर्फ में गलता हुआ।
और जब वे आती हैं
आधी साडी़ में लपेटे हुए
हमारे अपने बच्चों की लाश को,
वसूलते रहे हैं हम
पूरा पूरा टैक्स
मसान के पहरेदार बनकर
बची खुची आधी साड़ी से।


और हम
         इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,
          आखिर यह हमारी परंपरा है-
                                 गौरवशाली परंपरा!


नीलाम किया है हमने
अपनी रानियों तक को
बनारस के चौराहों पर
         सत्यवादी हरिश्चंद्र बनकर।
बोली लगाई है हमने
चंपा की राजपुत्री चंदनबालाओं तक की
कौशांबी के बाज़ारों में
         धनपति नगरसेठ बनकर।
कभी.......
किसी नीलामी पर
किसी बोली पर
         किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ,
         कोई आसन नहीं डोला,
         कोई शासन नहीं बोला, 
         और न ही कभी
         एक भी सवाल उठा-
                   किसी संसद में।


फिर अब क्यों बवाल उठाते हो?


कुछ नया तो नहीं किया हमने ;
कुछ लड़कियों, कुछ औरतों को-
(कुछ ज़मीनों, कुछ गायों को)-
         नीलाम भर ही तो किया है
         एलूरु के बाज़ारों में,
         आंध्र के गाँवों की हाटों में।


इसमें नया क्या है?
क्यों बवाल मचाते हो??
क्यों सवाल उठाते हो???
         हम तो इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यही तो हमारी परंपरा है-
                           गौरवशाली परंपरा!
http://bit.ly/K5HUpx

सोमवार, 14 मई 2012

मैं बुझे चाँद सा

मैं बुझे चाँद सा
अन्धेरे में छिपा हुआ बैठा था
सब रागिनियाँ डूब चुकी थीं
प्रलय निशा में

तभी जगे तुम
दूर सिंधु के जल में झलमल
और बाँसुरी ऐसी फूँकी
अंधकार को फाँक फाँक में चीर चीर कर
सातों सुर बज उठे
सात रंगों वाले

बुझे चाँद में एक एक कर
सभी कलाएँ थिरक उठीं!

बुधवार, 2 मई 2012

बातों ही बातों में अरे, यह क्या हुआ, ऋषभ?

बातों ही बातों में अरे यह क्या हुआ ऋषभ
खिलता हुआ गुलाब अँगारा हुआ ऋषभ

कल तक था जिनकि आँख का तारा हुआ ऋषभ
उनकी हि आज आँख का काँटा हुआ ऋषभ

कोई न साथ दे सका इस प्रेम पंथ में
तलवार-धार पर सदा चलना हुआ ऋषभ

किरणों के रंग फर्श प' गिर कर चटक गए
ज्यों इंद्रधनुष काँच का टूटा हुआ ऋषभ

पल पल धुएँ में दोस्तो! तब्दील हो रहा
बचपन के प्रेमपत्र-सा जलता हुआ ऋषभ

छू जाएँ तेरे होंठ कभी भूल से कहीं
इस चाह में तन त्याग के प्याला हुआ ऋषभ

लहरों प' प्यार-प्यार-प्यार-प्यार लिख रहा
कहते हैं लोग-बाग दीवाना हुआ ऋषभ

पूर्णकुंभ- अगस्त 2002 - आवरण पृष्ठ 

मंगलवार, 1 मई 2012

याद आए तो नहीं आँसू बहाना

याद आए तो,  नहीं आँसू बहाना
क्यारियों को सींचना, गुलशन सजाना

चित्र तो मैंने जला डाले सभी अब
पत्र सारे तुम नदी में फेंक आना

लोग हाथों में लिए पत्थर खड़े हों
किंतु तुम निश्चिंत हो हँसना हँसाना

फूल-सा बच्चा कहीं सोता दिखे तो
चूम लेना भाल, लेकिन मत जगाना

यह नहीं इच्छा कि मुझको याद रक्खो
मित्र,  पर अपराध मेरे भूल जाना

पूर्णकुंभ - जून  2001- आवरण पृष्ठ 

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

परदेस में नवसंवत्सर




मन उदास है आज सुबह से
कुछ भी नहीं सुहाता जैसे

सब कुछ तो है यहाँ पास में
फिर भी कुछ है जो खोया है
गाँव, गली, घर, आँगन अपना
करके याद बहुत रोया है

नवसंवत्सर की वेला में
अभी अभी बीते बरसों तक
बंदनवार सजाए मैंने
अभी अभी तो कल परसों तक.

यहाँ कहाँ वे आम महकते
यहाँ कहाँ हरियाली वैसी
यहाँ कौन पूरे रंगोली
वैभव में कंगाली कैसी

यहाँ उदास और एकाकी
मैं हूँ, और वहाँ घर सारा
पूजा की पावन ध्वनियों से
गूँज रहा होगा चौबारा

सुनते हैं कोई ब्रह्मा थे
सृष्टि जिन्होंने रची इसी दिन
और सुना है किसी राम का
भी अभिषेक हुआ था इस दिन
धर्मराज जो रहे युधिष्ठिर
इस ही दिन थे हुए प्रतिष्ठित
यह युगादि का पर्व मनोहर
अग जग को करता आनंदित

यों तो बातें हुई फोन पर
घंटों चैटिंग भी कर ली है
सोशल साइट दिखीं कई, पर
मन का इक कोना खाली है

मैं डालर के लिए यहाँ पर
मानव वन में भटक रहा हूँ
पर अपनी निजता को खोकर
आज स्वयं को खटक रहा हूँ

अभी वेब कैम से देखा
माँ यों तो खुश खुश दिखती है  
पर आँखों की नमी हँसी से
उस भोली से कब छिपती है
मुझको तो उपदेश रही थी
अपने आँसू पोंछ रही थी

यह जीवन छह रस का मिश्रण
इसको इसी तरह जीना है
इसीलिए तो हर युगादि पर
छह रस का मिश्रण पीना है
माँ कहती है – अरे
नीम की कलियाँ कडवी
सब कटुता को सहना
तुम्हें सिखा देंगी ये
और पके केले की मधुता
सुख में तुम्हें डुबा देंगी ये
हरी और काली मिर्चों का
तीखापन यदि झेल गए तो  
चाहे जितना तपे जिंदगी
बिना क्रोध यदि खेल गए तो
जीवन सहज सुहाना होगा
हर किस्मत को आना होगा
डरो नहीं तुम किसी हाल में
इसीलिए तो लवण जरूरी
और हताशा कभी न घेरे
खट्टी इमली से क्या दूरी
जो है आज कसैला बेटे
कल वह मीठा हो जाएगा
हरी आमियाँ तपें धूप में
तब रसाल वन महकाएगा

अम्मा, यों तो वे सारे रस
इस विदेश में भी मिलते हैं
लेकिन एक महारस तेरे
हाथों का न कहीं मिलता है
मेरे मन में तो भारत है
बाहर कहीं नहीं दिखता है

इसीलिए तू भी उदास है
ऊपर ऊपर से हँसती है
इसीलिए मैं भी उदास हूँ
सब बेगानों की बस्ती है

तेरे चरणों में करता हूँ
इस युगादि पर पूजन-अर्चन
अपने आशीषों से कर दे
तू मेरा वंदन अभिनंदन

दूर देस में मैं बैठा हूँ
इसीलिए यह मन उदास है
तेरे हाथों षटरस चखने
की ही केवल भूख प्यास है
   

बुधवार, 15 फरवरी 2012

(एक असमाप्त प्रेम कविता) पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ ....


मैंने

किताबें पहन रखी थीं,
औरों से अलग दिखता था,
तुम खिंची चली आईं
मेरी ही तरह किताबों को ओढ़े हुए।
अक्सर हम दोनों
पास-पास रहते,
पर चुप रहते,
हमारी किताबें आपस में बातें करतीं
और हम प्रमुदित होते।


उस दिन
जब बाहर बहुत बरसात थी
तुम्हारे नक़ाब की किताब का
एक पन्ना गलकर बह गया
और मैंने
तुम्हारा एक रोम देख लिया
भीतर कुछ ऐसी बरसात हुई
कि मेरी पोशाक की एक किताब पूरी गल गई।
मैंने दूसरी किताब से
पोशाक में पैबंद लगाने की
कोशिश करते हुए
चोर नज़रों से तुम्हारी ओर देखा।
तुम 
निर्निमेष ताक रही थीं
फटी पोशाक में से झाँकती हुई
मेरी मांसपेशियों को।
मैंने जल्दी से
पैबंद सी दिया
और तुमने भी
अपने नक़ाब पर दूसरा नया पन्ना
चिपका लिया।


बार-बार हुआ ऐसा,
हर बार मैंने नया पैबंद लगाया,
हर बार तुमने नया पन्ना चिपकाया।
किताबें पहले की तरह
बातें करती रहीं
और हमारे बीच संवाद नहीं हो सका।


उस दिन
बरसात के बाद की तेज धूप में
मैंने अचानक
भीगी किताबें
सूखने के लिए उतार दीं
तो तुमने
आतंक, विस्मय, लज्जा और संकोच से
आँखें मींच ली थीं
और मैंने झट से
क्षमा माँगते हुए
फिर से किताबें पहन ली थीं।


रात भर सो नहीं सका था मैं,
सोचता रहा था
उस क्षणिक हल्केपन के बारे में
जो किताबों की भारी पोशाक
उतारने पर महसूस हुआ था।


उस रात
मैंने निश्चय किया
कि
अब से कैद नहीं रखूँगा स्वयं को
किताबों की इस भारी पोशाक में।


अगले ही दिन
मैंने अपने चारों ओर जमे
पुस्तकालय को हटा दिया
और
तुम्हारे आँख मींचने की
परवाह किए बिना
तुम्हारे कानों में
अनुनयपूर्वक फुसफुसाया था-
           क्या मैं
           तुम्हारे नक़ाब में
           चिनी हुईं किताबें
           नोंच सकता हूँ?


जवाब में तुमने
एक बार कोमल दृष्टि से
मुझे देखा था
और पलकें झुका ली थीं।
मैंने किताबों की ईंटों को
छुकर
फिर पूछा था-
           नोंच दूँ?


जवाब में तुमने
अर्थपूर्ण दृष्टि से
मुझे देखा था
और मैंने साहस करके
एक किताब नोंच ली थी।
झरोखे में से
मेरी गंध भरी हवा का एक झोंका
तुमसे टकराया था
और तुमने गहरी साँस लेकर
मेरी ओर देखा था
कृतज्ञता के भाव से।
देखकर
पलकें
फिर से झुका ली थीं।


मैंने डरते हुए कहा था-
           तुम चाहो तो
           इस किताब को
           फिर वहीं चिपका दूँ?


तुमने लजाते हुए
कहा था...
           नहीं!


उस क्षण मैं तुम्हारे
और निकट आ गया,
मैंने धीरे से
तुम्हें छूआ
किताब नोचने से बने झरोखे में से।
तुम्हारे होंठों पर
सिसकी बनकर
अनहद नाद उभरा;
और मैंने
तुम्हारे अस्तित्व पर चिपकी
दूसरी किताब नोंच दी।
धीरे से
फिर तुम्हें छुआ,
फिर वही मादक
अनहद नाद उभरा।
फिर एक किताब और....
एक किताब और...
एक किताब और...
फिर एक छुअन और....
एक छुअन और....
एक छुअन और....
फिर एक सिसकी और....
एक सिसकी और....
एक सिसकी और....


तुम्हारी चेतना के आकाश में
गुंजायमान
अनहद नाद में
डूब गया मैं,
डूब गईं तुम,
डूब गए हम दोनों।
डूबे तो ऐसे डूबे
कि तिर गए।
औंधे घट के
पीयूष रस में स्नान करके
समुद्र की सुनहरी रेत पर
हम दोनों
पसर गए।
हमारे अस्तित्व को उस दिन
पहली बार छुआ -
महकती हुई धरती ने,
गमकती हुई हवा ने,
लहराते हुए पानी ने,
सहलाती हुई आग ने
और गाते हुए आकाश ने। 
किताबों से बाहर निकलने के बाद
उस दिन
देर तक नहाते रहे थे हम दोनों
इसी तरह।


और तब 
आदित्य, चंद्र और नक्षत्रों ने
हमारी धुली हुई आत्मा पर
एक शब्द लिखा था....
ढाई आखर ‘प्यार’ का!


उस दिन
हम सचमुच पंडित हो गए थे
‘प्रेम’ का ढाई आखर पढ़कर।


हमें मिल गया था
जीवन का रहस्य
और
मुक्ति का मार्ग।


उस दिन के बाद से
हम विचरते रहे
मोक्ष में
बिना पोशाकों के।


हमने चाँदनी रातों में प्यार किया,
हमने अँधेरों में प्यार की बिजलियाँ चमकाईं,
हमने सवेरों में प्यार के फूल खिलाए,
हमने दुपहरी में प्यार के बादल बरसाए,
हमने साँझों में प्यार के गीत गुनगुनाए;
और 
हमें कभी
किसी पोशाक की ज़रूरत नहीं पडी़,
किसी किताब की ज़रूरत नहीं पडी़।
हमारी आत्मा पर अंकित
ढाई आखर ही
अब हमारा पुस्तकालय था,
विश्वकोश था।


बहुत सुखी थे हम
आनंद में खॊए हुए
कि तभी
उस आधे चाँद की रात में
मैंने पाया
तुम्हारे एक कोने पर चिपका हुआ
एक किताब का पन्ना।
मैंने सहज भाव से
तुम्हारे वजूद पर से
नोंचने की कोशिश की
कागज़ के उस पन्ने को
बिना तुमसे अनुमति माँगे।


पन्ना अभी ज़रा सा ही फटा था
कि तुम चीख उठीं....
           नहीं!
शायद 
तुम्हें याद आ गया था
कोई पुराना अनुभव।


मैं डर गया था
और उसी हड़बडी़ में
मेरे नाखूनों की खरोंच
उभर आई थी
तुम्हारे ऊपर।


खरोंच के ऊपर
चिपका दिया था तुमने
फटे हुए कागज़ को
और घृणा से मुँह फेर लिया था
मेरी ओर से।


रो पडी़ थीं तुम
शिकायत करती हुईं
कि क्यों मैंने
कागज़ को नोंचना चाहा
बिना तुमसे अनुमति माँगे।


उस रात से
धरती में खूशबू नहीं रही,
हवाओं की छुअन गायब हो गई,
पानी फीका हो गया,
आग में तपन नहीं बची
और आकाश गूँगा हो गया।


उस रात से
मेरे नाखूनों की खरोंच में से
किताबें उगने लगीं
और तुम्हारे चारों ओर
नक़ाब बनकर तनने लगीं।


उस रात से
मेरे होंठों पर प्रार्थना है,
याचना है मेरी आँखों में,
अभ्यर्थना है मेरे माथे पर,
कंपन है मेरी उँगलियों में,
मेरी आत्मा में क्रंदन है
और
मेरे अस्तित्व में प्रतीक्षा का रुदन है;
मुझे आदेश दो
कि मैं नोंच दूँ
तमाम कागज़ों को,
किताबों को
और नक़ाबों को।


कहीं ऐसा न हो,
ये किताबें
फिर से
छा जाएँ
पूरे अस्तित्व पर
और फिर से
चेतना
कैद हो जाए
पोथियों के बीच!


मुझे प्रतीक्षा है
तुम्हारे संकेत की,
इससे पहले कि
मर जाए हमारी मुक्ति
या 
मिट जाए
प्यार का ढाई आखर..........
                     

                     (तुम्हारा आदेश मिलने 
                     यह कविता
                     अधूरी रहेगी,
                     और प्रतीक्षा में रहेगा
                      तुम्हारा कबीर!)
[1995 में गोवा विश्वविद्यालय में संपन्न केंद्रीय हिंदी निदेशालय के लेखक शिविर के दौरान एक बैठक में लिखी गई यह कविता मेरे कविता-संग्रह ''ताकि सनद रहे'' (2002) में (पृष्ठ 129-139) प्रकाशित है].