फ़ॉलोअर

ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

दर्द की कोकिला बोली

हमारी आह के काँधे, 

तुम्हारी चाह की डोली 

तुम्हारी माँग में, सजनी!

हमारे रक्त की रोली


मिटाए भी न मिट पाईं

तुम्हारे मन की बालू से

हमारी रूप रेखाएँ

बहुत धो ली, बहुत छोली


प्रथम अनुभव, प्रथम छलना 

कठिन अनुभव, कठिन छलना 

लुटी किस चक्रवर्ती से

तापसी बालिका भोली


जान पहचान थी जिससे

उम्र आसान थी जिससे 

छुड़ाकर भीड़ में अँगुली

गया वह दूर हमजोली


सहमकर और शरमाकर

तड़पकर और लहराकर 

'किया है प्यार मैंने तो'

दर्द की कोकिला बोली


#पुरानी_डायरी से

(नई दिल्ली : 7 अगस्त, 1984)

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

तुमको ख़त में क्या-क्या लिक्खूँ?

 तुमको ख़त में क्या-क्या लिक्खूँ?

कब-कब हँस-हँस रोया, लिक्खूँ?


तारे गिन-गिन रातें काटीं

भोर  हुई तो सोया, लिक्खूँ? 


नेह नीर से सींच-सींच कर 

यह अक्षय वट बोया, लिक्खूँ? 


एक फूल रूमाल कढ़ा जो

ओसों खूब भिगोया, लिक्खूँ? 


दिल से दिल के इस सौदे में 

क्या पाया क्या खोया, लिक्खूँ? 


कैसे राम! तिरे वह तल पर 

तुमने जिसे डुबोया, लिक्खूँ?


मधु अपराध किया जो पल ने

वह जन्मों ने ढोया, लिक्खूँ?


अँजुरी-अँजुरी पानी छाना 

फिर भी रेत सँजोया, लिक्खूँ?


साँसों  की नश्वर माला में 

मोती दिव्य पिरोया, लिक्खूँ? 


चमक उठा शुभ नाम तुम्हारा;

मन आँसू से धोया, लिक्खूँ?

                         (2002)