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शुक्रवार, 12 मई 2017

प्रार्थना

अब तक निभाया,
आगे भी साथ दो!
साँस टूटे तो,
सिर पर तुम्हारा हाथ हो!!
                            [4/5/2017]

प्यासे हैं!

ओस प्यासी, गुलाब प्यासे हैं।
नींद प्यासी है,ख्वाब प्यासे हैं।।

रेत का तन तप चुका कितना,
कितनी पी लें शराब प्यासे हैं।।

जब से ढाला गया इन ओठों को,
उस ही दिन से, जनाब, प्यासे हैं।।

मोर ये, चातक ये, पपीहे ये,
इनको दीजे जवाब, प्यासे हैं।।

कब के जागे हैं नयन दीवाने,
अब तो उलटो नक़ाब, प्यासे हैं।।

कहिए इक़बाल से, फ़िराक़ों से,
हम पे लिख दें क़िताब प्यासे हैं।।
                                                    [1983]

गुरुवार, 11 मई 2017

शहीद की माँ

माँएँ राजनीति नहीं समझतीं,
खोजती हैं उस सुदर्शनधारी को
जिसने काठ की तलवार देकर
चक्रव्यूह में धकेल दिए
उनके जवान बेटे।

24/4/2017

वेणीसंहार


धरती के वेणी संहार को
प्रतीक्षा रहती है भीम की।
----
युधिष्ठिर स्वर्ग में ही अच्छे!

24/4/2017

स्थितप्रज्ञ


जनता भूखी है, हुआ करे।
किसान नंगे हैं, हुआ करें।।
जवान मरते हैं, मरा करें।
सत्ता बची रहे, दुआ करें।।
24/4/2017

ఇక అప్పుడు భూమి కంపిస్తుంది (इक अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदि)

చిన్నప్పుడు విన్న మాట ః

భూమి గోమాత కొమ్ముమీద ఆని ఉందనీ

బరువు వల్ల ఒక కొమ్ము అలసిపోతే

గోమాత రెండో కొమ్ముకి మార్చుకుంటుందనీ

అప్పుడు భూమి కంపిస్తుందననీ .



ఒకసారి ఎక్కడో చదివాను ః

బ్రహ్మాండమైన తాబేలు మూపు మీద

భూమి ఆని ఉంటుందనీ

వీపు దురద పెట్టినప్పుడు

ఎప్పుడైనా ఆ తాబేలు కదిలితే

భూమి కంపిస్తుందనీ.



తరవాతెప్పుడో ఒక పౌరాణిక నాటకంలో చూశాను ః

వేయిపడగల శేషనాగు

భూమిని మోస్తోందనీ,

కాలం నాగస్వరం ఊదితే

ఆ సర్పం తోక ఆడుతుందనీ

వేయిపడగలూ ఊగుతాయనీ

అప్పుడు భూమి కంపిస్తుందనీ.



భూగర్భ శాస్త్రవేత్తలు చెప్పారు ః

భూమి కడుపులో

అంతటా ప్లేట్లు ఉంటాయనీ

అవన్నీ వరసలుగా పేర్చి ఉటాయనీ

ఒక ప్లేటు జారిందంటే

మరొకటి కదులుతుందనీ

అప్పుడు భూమి కమ్పిస్తుందనీ.



అర్థశాస్త్ర గ్రంథాలు తెలియజేస్తాయి ః

మనిషి నియమాలని అతిక్రమిస్తే

ప్రకృతి ఎదురు తిరుగుతుందనీ

అప్పుడు భూమి కంపిస్తుందనీ.



మతాన్ని గుత్తకు తీసుకున్నవాళ్ళు ప్రకటించారు ః

ధర్మానికి హాని కలిగినప్పుడల్లా

అధర్మం పెరిగిపోయినప్పుడల్లా

అన్యాయం,అత్యాచారం పెరిగిపోతాయనీ

అప్పుడు భూమి కమ్పిస్తుందనీ.



భూమి కంపిస్తుంది

పగుళ్ళు ఏర్పడతాయి

పదేసి అంతస్తులూ మట్టిలో కలిసిపోతాయి

కొన్ని వేల పూరిపాకలు భూగర్భంలో కలిసిపోతాయి.

గోమాత కొమ్ములు గుచ్చుకుని

స్కూలు పిల్లల పేగులు ఛిద్రమౌతాయి.



తాబేటి డిప్పమీద పడి

రక్తసిక్తమౌతాయి

గర్భవతులు తమ కడుపులో నింపుకున్న

కొత్త జీవితపు ఆశలు.



ఆదిశేషుడి విషపు కాటుకి నీలంగా మారిపోతుంది

పొలాల్లోనూ కర్మాగారాల్లోనూ

పనిచేసే వాళ్ళ నెత్తురు.



ప్లేట్లలా విరిగిపోతాయి మేడలు

గాయాలతో ఛిద్రమైపోతుంది

ఈ పచ్చని నేల దేహం.



నల్లని నీడలాంటి మృత్యువు

పరికెత్తుతూనే ఉంది అనుక్షణం

అన్నివైపులనుంచీ చుట్టుముడుతూ

మనిషి ప్రాణాలని.



ఇన్ని రకాల మృత్యువు

మనిషేమో ఒక్కడే.



సృష్టి ప్రారంభమైనప్పటి నుంచీ

ఈ పరుగు వెంట వస్తూనే ఉంది

విలీనం చేస్తూనే ఉన్నాయి నాగరికతలని భూకంపాలు

అట్టహాసం చేస్తూనే ఉన్నాడు కాలభైరవుడు

తాండవనృత్యం చేస్తూ

కానీ

ప్రతిసారీ ఎక్కడో ఒకచోట

కూలిన శిథిలాల మధ్య

కదులుతుంది ఒక చెయ్యి

పైకి లేస్తాయి ఐదు వేళ్ళు

ఊపిరి పీలుస్తూ

అన్ని శిథిలాలనీ చీల్చుకుని

సవాలు చేస్తూ !

***

మూలం ః రిషభ్ దేవ్ శర్మ

అనువాదం ః ఆర్.శాంత సుందరి

इक अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदि (और तब धरती हिलती है!)

************************************************
इक अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदि
*************************************************
( ऋषभ देव शर्मा की हिंदी कविता
“और तब धरती हिलती है” का
आर. शांता सुंदरी कृत तेलुगु अनुवाद)
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

चिन्नप्पुडु विन्न माटः
भूमि गोमात कॊम्मुमीद आनि उंदनी
बरुवु वल्ल ऒक कॊम्मु अलसिपोते
गोमात रॆंडो कॊम्मुकि मार्चुकुंटुंदनी
अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदननी .

ऒकसारि ऎक्कडो चदिवानु:
ब्रह्मांडमैन ताबेलु मूपु मीद
भूमि आनि उंटुंदनी
वीपु दुरद पॆट्टिनप्पुडु
ऎप्पुडैना आ ताबेलु कदिलिते
भूमि कंपिस्तुंदनी.

तरवातॆप्पुडो ऒक पौराणिक नाटकंलो चूशानु:
वेयिपडगल शेषनागु
भूमिनि मोस्तोंदनी,
कालं नागस्वरं ऊदिते
आ सर्पं तोक आडुतुंदनी
वेयिपडगलू ऊगुतायनी
अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदनी.

भूगर्भ शास्त्रवेत्तलु चॆप्पारु:
भूमि कडुपुलो
अंतटा प्लेट्लु उंटायनी
अवन्नी वरसलुगा पेर्चि उटायनी
ऒक प्लेटु जारिंदंटे
मरॊकटि कदुलुतुंदनी
अप्पुडु भूमि कम्पिस्तुंदनी.

अर्थशास्त्र ग्रंथालु तॆलियजेस्तायि:
मनिषि नियमालनि अतिक्रमिस्ते
प्रकृति ऎदुरु तिरुगुतुंदनी
अप्पुडु भूमि कंपिस्तुंदनी.

मतान्नि गुत्तकु तीसुकुन्नवाळ्ळु प्रकटिंचारु:
धर्मानिकि हानि कलिगिनप्पुडल्ला
अधर्मं पॆरिगिपोयिनप्पुडल्ला
अन्यायं,अत्याचारं पॆरिगिपोतायनी
अप्पुडु भूमि कम्पिस्तुंदनी.

भूमि कंपिस्तुंदि
पगुळ्ळु एर्पडतायि
पदेसि अंतस्तुलू मट्टिलो कलिसिपोतायि
कॊन्नि वेल पूरिपाकलु भूगर्भंलो कलिसिपोतायि.
गोमात कॊम्मुलु गुच्चुकुनि
स्कूलु पिल्लल पेगुलु छिद्रमौतायि.

ताबेटि डिप्पमीद पडि
रक्तसिक्तमौतायि
गर्भवतुलु तम कडुपुलो निंपुकुन्न
कॊत्त जीवितपु आशलु.

आदिशेषुडि विषपु काटुकि नीलंगा मारिपोतुंदि
पॊलाल्लोनू कर्मागाराल्लोनू
पनिचेसे वाळ्ळ नॆत्तुरु.

प्लेट्लला विरिगिपोतायि मेडलु
गायालतो छिद्रमैपोतुंदि
ई पच्चनि नेल देहं.

नल्लनि नीडलांटि मृत्युवु
परिकॆत्तुतूने उंदि अनुक्षणं
अन्निवैपुलनुंची चुट्टुमुडुतू
मनिषि प्राणालनि.

इन्नि रकाल मृत्युवु
मनिषेमो ऒक्कडे.

सृष्टि प्रारंभमैनप्पटि नुंची
ई परुगु वॆंट वस्तूने उंदि
विलीनं चेस्तूने उन्नायि नागरिकतलनि भूकंपालु
अट्टहासं चेस्तूने उन्नाडु कालभैरवुडु
तांडवनृत्यं चेस्तू
कानी
प्रतिसारी ऎक्कडो ऒकचोट
कूलिन शिथिलाल मध्य
कदुलुतुंदि ऒक चॆय्यि
पैकि लेस्तायि ऐदु वेळ्ळु
ऊपिरि पीलुस्तू
अन्नि शिथिलालनी चील्चुकुनि
सवालु चेस्तू !

***
मूलं : ऋषभ देव शर्मा
अनुवादं : आर. शांता सुंदरी 

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और तब धरती हिलती है!
********************
- ऋषभ देव शर्मा
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सुना था बचपन में :
धरती टिकी है गौमाता के सींग पर,
जब बोझ से थक जाता है एक सींग
तो गौमाता सींग बदलती है
और तब धरती हिलती है।

एक बार कहीं पढा़ था :
भीमकाय कछुए की पीठ पर
टिका है धरती का गोला,
कभी-कभार जब हरकत करता है कछुआ
पीठ में खुजली होने पर
तो धरती हिलती है।

बाद में देखा किसी पौराणिक नाटक में :
हज़ार फणवाले शेषनाग ने
धारण किया है धरती को,
काल की बीन बजती है
तो थिरकती है शेषनाग की पूँछ
झूमते हैं हज़ार फण
और तब धरती हिलती है।

भू-गर्भ के जानकारों ने बताया :
धरती के पेट में हैं
प्लेटें ही प्लेटें
पर्त दर पर्त

कोई पर्त खिसकती है
कोई प्लेट सरकती है
तो धरती हिलती है।

अर्थशास्त्र की किताब कहती है :
जब मनुष्य ज्यादती करता है
तो प्रकृति विद्रोह करती है
और तब धरती हिलती है।

धर्म के ठेकेदारों ने घोषणा की :
जब-जब धर्म की हानि होती है
जब-जब अधर्म बढ़ता है
जब-जब भरता है पाप का घड़ा
बढ़ जाते हैं अन्याय और अनाचार
तो धरती हिलती है।

हिलती है धरती
पड़ती है दरारें
मटियामेट हो जाती हैं दस-दस मंजिलें
भू-गर्भ में समा जाती हैं हजारोहजार झोंपडि़याँ।

बिंध जाती हैं स्कूली बच्चों की आँतें
गौमाता के सींग से।

कछुए की पीठ पर गिरकर
लहूलुहान हो जाते हैं
गर्भवती महिलाओं के
नए जीवन की संभावनाओं से भरे हुए उदर।

शेषनाग के विषदंश से नीला पड़ जाता है
खेतों और कारखानों में
काम करते आदमी का खून।
प्लेटों की तरह टूटती हैं
अट्टालिकाएँ
और क्षत-विक्षत हो जाती है
पृथ्वी की हरी-भरी काया।

काले साये-सी मौत,
दौड़ रही है हर पल
हर दिशा से घेर कर
आदमी के प्राण को।

इतनी सारी मौत,
आदमी अकेला।

सृष्टि के आरंभ से
चली आती है यह दौड़,
भूकंप लीलते हैं बार-बार सभ्यताओं को
और अट्टहास करता है कालभैरव
तांडव नृत्य के बीच

पर

हर बार कहीं
ढेरोढेर मलबे के तले
हिलता है एक हाथ
और उग आती हैं पाँच उँगलियाँ
साँस लेती हुई
सारे मलबे को चीरकर
चुनौती देती हुई! O

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

बचपन की तलाश

वह खोए बचपन की तलाश करता हुआ अचानक बच्चों के बीच पहुँच गया।
पर यह देखकर सकते में आ गया कि बच्चे तो उससे ज़्यादा बूढ़े लगने लगे हैं।
तनाव और थकान से भरे बच्चे बड़े अजनबी से लगे उसे।
वे उसे पहचान भी नहीं सके।
वह भी कहाँ उन्हें पहचान सका था!
खिलना-खिलखिलाना वे भूल चुके थे - अभिनय ज़रूर कर रहे थे।
उसे याद आया; उसी ने तो दिया है बच्चों को यह असुरक्षित वर्तमान और अनिश्चित भविष्य।
••• और वह वापस अपनी काल कोठरी में लौट आया।

वह शाम

शाम थी कैसी कि नटखट बादलों में हम घिरे थे।
सब दिशाएँ खो गई थीं, भटकते यूँ ही फिरे थे।।
याद हैं फिसलन भरी क्या चीड़ की वे पत्तियाँ?
एक-दूजे को संभाले दूर तक जिनसे गिरे थे।।

गुस्सा

पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था।
आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।।
मैं जिसे गुस्सा समझ ताज़िंदगी डरता रहा;
डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।

सम्मोहन

अमरित की कनी ज़हर में डुबाई है।
चमकती हुई तलवार निकल आई है।।
यह अलौकिक रूप नज़रें बाँध लेगा;
आज बिजली चाँदनी में नहाई है।।

भय

डर रहे बूढ़े सयाने, सब कहें 'हम क्या करें'?
छिप गए सब कोटरों में, जान कर भी क्यों मरें??
चाँदनी में बाल खोले, घूमती है प्रेतनी!
और बच्चे हैं कि बाहर खेलने की ज़िद करें!

जीवन जो जिया

झल्लाई सी सुबह, पगलाई सी शाम।
क्रोध भरी दोपहर, यों ही दिवस तमाम।।
प्रेत ठोकते द्वार, ले ले मेरा नाम!
रात भूतनी बनी, यहाँ कहाँ विश्राम।।

इतिहास बनाने वाले

खेत काटकर सड़क बना दी, सभी सुखा दीं क्यारी।
मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो हैं व्यापारी।।
कहीं तुम्हारी विजय कथा में, मेरा नाम नहीं है!
ब्रज का सब कुछ हरण कर लिया, प्रभुता यही तुम्हारी।।

दौड़

मैंने जिनके वास्ते सब छल किए।
सौ बलाएँ लीं, सदा मंगल किए।।
वक़्त का क्या फेर? सत्ता क्या गई?
वे मुझी को छोड़, आगे चल दिए।।

युद्ध

हाथ में लेकर पताका शिखर पर चढ़ता रहा।
आदमी अपनी सरहदें खींचकर लड़ता रहा।।
भूमि जिसके नाम पर खून से लथपथ पड़ी है!
सातवें आकाश पर वह बैठकर हँसता रहा।।

मानव अधिकार

मरता है कोई छात्र तो सियासत न कीजिए।
भूखों मरे किसान तो तिजारत न कीजिए।।
हैं आप बड़े बुद्धिमान, शब्दों के खिलाड़ी!
लेकिन पिशाच कर्म की वकालत न कीजिए।।

आतंक बीज

कल आपने बोई थीं गलियों में नफ़रतें।
यों आज लहलहाई हैं घर घर में दहशतें।।
नादान बालकों को वहशी बनाने वालो!
खाएँगी तुमको एक दिन तुम्हारी वहशतें।।

शुभ आगमन

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से मधुरिम पराग झरता है
तुम्हारी निगाह से धरा का रँग निखरता है
जाग उठती हैं दिशाएँ तुम्हारे आने से
तुम्हारे गाने से सूरज उड़ान भरता है

खुशबू

एक पगली छोकरी।
फूलों की टोकरी।।
खुशबू ने कर ली
उसके घर नौकरी।।

रासायनिक बम

दम तोड़ने से पहले सपने नीले पड़ गए थे,
होंठ ऐंठ गए थे सफेद फेन उगलते-उगलते;
अच्छा हुआ, नींद में ही तड़क गई थीं नसें,
दम टूट गया; नींद नहीं टूटी!

जल्लाद! तुम सचमुच कितने दयालु हो!!

वह मैं न था

होंठ पर थे गीत मेरे, साँस में मेरी कहानी थी।
उन दिनों आपको मेरी हर अदा लगती सुहानी थी।।
आज बरसों बाद अपनी समझ में यह बात आई है;
आपने चाहा जिसे वह मैं न था, मेरी जवानी थी।।

हालचाल

मौसम का हालचाल, हमसे न पूछिए।
यारों की चाल-ढाल, हमसे न पूछिए।।
नेता की रग में पैठ के, कुर्सी के कीट ने -
क्या-क्या किया कमाल,हमसे न पूछिए।।

लाचार हूँ

दुश्मन के संग वास की आदत से लाचार हूँ।
वर्षा के बीच प्यास की आदत से लाचार हूँ।।
मैं जानता हूँ, आज फिर तुमने झूठ कहा है;
पर क्या करूँ, विश्वास की आदत से लाचार हूँ।।

रूप

कब कहा मैंने कि मुझको बाँह में अपनी भरो।
कब कहा मैंने कि आहें याद में मेरी भरो।।
यह तुम्हारा रूप पावन, दृष्टि को पावन करे;
प्राण में गूँजा करे, बस, तान कुछ ऐसी भरो।

शुभोदय

फिर सुहानी भोर आई, मित्रवर, तुमको नमन।
ऊर्जा की धूप छाई, मित्रवर, तुमको नमन।।
यह दिवस उल्लास में, आनंद में खिलता रहे;
शुभकामना संदेश लाई, मित्रवर, तुमको नमन।।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

कवि धर्म

संभव नहीं कि शक्ति हो औ' ज़्यादती न हो।
इतना करो कि ज़्यादती को ज़्यादती कहो।।
जनता के चारणो! सुनो,सत्ता के मत बनो;
तुम जागते रहो कि कहीं ज़्यादती न हो।।
6/4/2017

बंदूक

छज्जे प' चोंच लड़ाते कबूतरों को देख कर;
बस्ती के दारोगा ने कल बंदूक दाग दी।।
सरकार के फरमान से हम इस कदर डरे;
बचपन के सारे खतों को रो रो के आग दी।।

6/4/2017

औचित्य का प्रश्न

बदज़ुबानों की सभा की, क्या सदारत कीजिए?
क्यों किसी पर सच जताने, की हिमाकत कीजिए??
मौन ही रहना उचित है, इस नए माहौल में;
प्यार की बातें न करिए, बस सियासत कीजिए!!

6/4/2017

कैसे चलूँ?

यह विषम पथ, नाथ!मैं कैसे चलूँ?
अब तुम्हारे साथ मैं कैसे चलूँ?
लोग हाथों में लिए पत्थर खड़े:
हाथ में दे हाथ मैं कैसे चलूँ?

6/4/2017

सावधान

प्रभुओं से सावधान औ' प्रभुता से सावधान।
दंगल में जीत कर मिली सत्ता से सावधान।।
सीता के घर में झाँकते धोबी कई-कई!
नेता तो खैर ठीक है जनता से सावधान।।
5/4/2017

खैर मनाओ

कीमत घटी इनसान की खैर मनाओ।
इस दौर में भगवान की खैर मनाओ।
जब सौंप दी अंधों को बंदूक आपने!
अब आप अपनी जान की खैर मनाओ।।
5/4/2017

डर सा

राह चलते राह से डर सा लगे है आजकल।
आपअपनी छाँह से डर सा लगे है आजकल।।
चर्चा चली है आ गए सियासत में साँप भी!
यार!अपनी बाँह से डर सा लगे है आजकल।।
5/4/2017

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

युद्धं सोकनि मूडडुगुल नेल :बिना युद्ध वाली तीन डग ज़मीन



 बिना युद्ध वाली तीन डग ज़मीन - ऋषभदेव शर्मा 
*************************************************

इक्कीसवीं शताब्दी की
पहली रात के अँधेरे में
जन्म लेना चाहता है एक शिशु
पर सहम-सहम जाता है
वापस लौट जाता है
उसी अँधेरी गुफा में
जिसके
शीतल गर्भ में
सोया हुआ था
अनादि काल से।

‘बच्चे!
यह कैसी ज़िद है,
कैसा भय है,
तुम जन्मते क्यों नहीं?’

-अपने माथे का पसीना
पोंछती हुई
पूछती है
धरती की
बूढ़ी़ आया।

अष्टावक्र सरीखा
बच्चा
चीख उठता है गर्भ में से :

‘नहीं आना है मुझे
तुम्हारी इस धरती के नरक में।
क्या है तुम्हारे पास मुझे देने को?
कुछ और नए हथियार बना डालोगे तुम
मेरी पैदाइश की खुशी में,
और दागोगे
मेरे भविष्य की छाती पर
बन्दूकें और मशीनगनें,
फोडो़गे कुछ नए बम,
बरसा दोगे
रेडियोधर्मी विकिरणों की बारिश
मेरे दिमाग के हर कोने में।
मुझे नहीं आना है
तुम्हारी दुनिया हें।
नहीं.......नहीं.....नहीं!’

और फिर छा जाती है
एक चुप्पी।
अजन्मे बच्चे के इन्कार का
कोई जवाब
किसी के पास नहीं है,
किसी के पास नहीं है कोई जवाब |

एक बार फिर
सुनाई पड़ती है
बच्चे की आवाज़,
राजा बलि के दरवाज़े पर
गुहार लगाते
वामन की तरह :

‘मुझे
तुम्हारी दुनिया में आने के लिए
तीन डग ज़मीन चाहिए।
सिर्फ तीन डग
साफ-सुथरी जमीन!
तीन डग जमीन-
जिस पर
कभी कोई
युद्ध न लडा़ गया हो,
तीन डग ज़मीन -
जिस पर
कभी किसी अस्त्र-शस्त्र की
छाया न पडी़ हो,
तीन डग ज़मीन-
जिसकी वायु शुद्ध
और प्रकृति पवित्र हो!’

आवाज़ कहीं खो गई है,
बच्चा भी चुप है,
धरती की बूढी़ आया भी चुप है,
चुप हैं तमाम महामहिम भूमिपति,
तमाम बड़बोले भूमिपुत्र भी चुप हैं।
नहीं बची है किसी के पास-
तीन डग ज़मीन
जिसकी वायु शुद्ध
और
प्रकृति पवित्र हो!

(ऋषभदेव शर्मा)

युद्धं सोकनि मूडडुगुल नेल
(''बिना युद्ध वाली तीन डग ज़मीन - ऋषभदेव शर्मा'' का तेलुगु अनुवाद)
अनुवादक : आर. शांता सुंदरी
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इरवैयॊकटो शताब्दंलो
मॊट्टमॊदटि चीकटि रात्रि
पुट्टालनि चूस्तुन्नदॊक शिशुवु
कानी ऊरिके बॆदिरिपोतोंदि
मळ्ळी वॆळ्ळिपोतोंदि अदे चीकटि गुहलोकि
अनादि नुंची
तनु निद्रिस्तू उंडिन चल्लनि गर्भंलोकि.
'एय् !
एमिटी मॊंडितनं,
ऎंदुकंत भयं,
ऎंदुकु जन्मिंचवु नुव्वु?' -
तन नुदुट पट्टिन चॆमट तुडुचुकुंटू
अडिगिंदि वृद्धुरालैन भूमि.
अष्टावक्रुडिलांटि शिशुवु
कॆव्वुमनि अरिचिंदि गर्भंलोनुंचि :
'नेनु रानु ई नरकंलांटि नी लोकंलोकि.
नाकिच्चेंदुकु एमुंदि नीवद्द?
नेनु पुट्टानन्न संबरंतो
इंका कॊन्नि कॊत्त आयुधालनि तयारु चेस्तावु,
ना भविष्यत्तु छाती मीदिकि गुरिपॆट्टि कालुस्तावु -
तुपाकुलू, मॆषीन् गन् लू
कॊन्नि कॊत्त बांबुलू पेलुस्तावु
रेडियोधार्मिक किरणालनि कुरिपिस्तावु
ना मस्तिष्कंलोनि मूल मूल मूलल्लोनू -
नी ई लोकंलोकि नेनु रानु गाक रानु.
रानु...रानु...रानंटे रानु ...!'
आ तरवात परुचुकुंदि निश्शब्दं
इंका पुट्टनि आ शिशुवु निराकरणकि
ऎवरि दग्गरा लेदु समाधानं.

मळ्ळी विनिपिंचिंदि शिशुवु गॊंतु
बलि चक्रवर्ति गुम्मं दग्गर निलबडि पिलिचिन
वामनुडि गॊंतुला :

'नेनु नी लोकंलोकि रावालंटे
नाकु मूडडुगुल नेल कावालि.
केवलं मूडडुगुले -
स्वच्छमैन, शुभ्रमैन नेल!
आ मूडडुगुल नेल मीद
ऎप्पुडू ऎटुवंटि अस्त्र शस्त्राल नीडा
पडि उंडकूडदु.
अक्कडि गालि परिशुभ्रo गा उंडालि
प्रकृति पवित्रंगा उंडालि !'
आ गॊंतु ऎक्कडो मायमैंदि.
शिशुवु मौनंगा उंडिपोयाडु
नेलतल्ली माट्लाडलेदु
महाराजुलू, भूपतुलू मौनं दाल्चारु
प्रगल्भालु पलिके भूमिपुत्रुलू माट्लाडलेदु.
परिशुभ्रमैन गाली,पवित्रमैन प्रकृतितो विलसिल्ले
मूडडुगुल नेल वाळ्ळॆवरि दग्गरा लेदु!

मूलं : प्रॊ. ऋषभदेव् शर्म
अनुवादं: आर्.शांतसुंदरि


యుద్ధం సోకని మూడడుగుల నేల


ఇరవైయొకటో శతాబ్దంలో
మొట్టమొదటి చీకటి రాత్రి
పుట్టాలని చూస్తున్నదొక శిశువు
కానీ ఊరికే బెదిరిపోతోంది
మళ్ళీ వెళ్ళిపోతోంది అదే చీకటి గుహలోకి
అనాది నుంచీ
తను నిద్రిస్తూ ఉండిన చల్లని గర్భంలోకి.
'ఏయ్ !
ఏమిటీ మొండితనం,
ఎందుకంత భయం,
ఎందుకు జన్మించవు నువ్వు?' -
తన నుదుట పట్టిన చెమట తుడుచుకుంటూ
అడిగింది వృద్ధురాలైన భూమి.
అష్టావక్రుడిలాంటి శిశువు
కెవ్వుమని అరిచింది గర్భంలోనుంచి :
'నేను రాను ఈ నరకంలాంటి నీ లోకంలోకి.
నాకిచ్చేందుకు ఏముంది నీవద్ద?
నేను పుట్టానన్న సంబరంతో
ఇంకా కొన్ని కొత్త ఆయుధాలని తయారు చేస్తావు,
నా భవిష్యత్తు ఛాతీ మీదికి గురిపెట్టి కాలుస్తావు -
తుపాకులూ, మెషీన్ గన్ లూ
కొన్ని కొత్త బాంబులూ పేలుస్తావు
రేడియోధార్మిక కిరణాలని కురిపిస్తావు
నా మస్తిష్కంలోని మూల మూల మూలల్లోనూ -
నీ ఈ లోకంలోకి నేను రాను గాక రాను.
రాను...రాను...రానంటే రాను ...!'
ఆ తరవాత పరుచుకుంది నిశ్శబ్దం
ఇంకా పుట్టని ఆ శిశువు నిరాకరణకి
ఎవరి దగ్గరా లేదు సమాధానం.

మళ్ళీ వినిపించింది శిశువు గొంతు
బలి చక్రవర్తి గుమ్మం దగ్గర నిలబడి పిలిచిన
వామనుడి గొంతులా :

'నేను నీ లోకంలోకి రావాలంటే
నాకు మూడడుగుల నేల కావాలి.
కేవలం మూడడుగులే -
స్వచ్ఛమైన, శుభ్రమైన నేల!
ఆ మూడడుగుల నేల మీద
ఎప్పుడూ ఎటువంటి అస్త్ర శస్త్రాల నీడా
పడి ఉండకూడదు.
అక్కడి గాలి పరిశుభ్రo గా ఉండాలి
ప్రకృతి పవిత్రంగా ఉండాలి !'
ఆ గొంతు ఎక్కడో మాయమైంది.
శిశువు మౌనంగా ఉండిపోయాడు
నేలతల్లీ మాట్లాడలేదు
మహారాజులూ, భూపతులూ మౌనం దాల్చారు
ప్రగల్భాలు పలికే భూమిపుత్రులూ మాట్లాడలేదు.
పరిశుభ్రమైన గాలీ,పవిత్రమైన ప్రకృతితో విలసిల్లే
మూడడుగుల నేల వాళ్ళెవరి దగ్గరా లేదు!

మూలం : ప్రొ. రిషభదేవ్ శర్మ
అనువాదం: ఆర్.శాంతసుందరి

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

बारह त्रिपदियाँ


1.

नहीं पता होता, कल क्या होगा......
आज को उसकी छाया से क्यों नहीं बचा पाते हम.....
*
यह क्षण भी रिस गया,लो!

2.

रात का तीसरा पहर
गीता पढ़ लूँ
*
फाँसी के वक़्त सामान्य रहना है!

3.

घिर रहा नीला अँधेरा
सिकुड़ती हैं नसें.....
*
भोर के संगीत से सूरज नहीं उगता!

4.

आज वह मेरे पास बैठा
बहुत देर बैठा रहा
*
पहले सा गुस्सा नहीं आया ; प्यार भी तो नहीं!

5.

नागफनी बोई थी बरसों पहले
नादानी थी
*
बड़ा समझदार है काँटों का जंगल!

6.

जितने देखे सारे सपने चूर हो गए
जितने भी थे सारे अपने दूर हो गए
*
वह जिद्दी अब भी अपनों के सपने जीता है!

7.

कल जिन्होंने अभिनंदन किया था,
आज चीर हरण कर रहे हैं
*
सम्मान सत्ता का होता है, अपमान व्यक्ति का!

8.

क्रोध रिश्तों को ध्वस्त कर देता है
आजकल सभी बड़े क्रोध में हैं
*
दम तोड़ रहे हैं सारे रिश्ते!

9.

उसने मणियों को समझा कंकर-पत्थर
लुटाता रहा झोली भर-भर
*
नीलाम हो गया मणियों के बाज़ार में!

10.

इतने दिन से खड़ा हुआ था चौखट पर
आज कहा - भीतर आ जाओ
*
जब मुझको वापस जाना है!

11.
सुगंध ने बाँधा
फिर बाँधा सौगंध ने
*
आज बंधन टूटने को हैं सभी!

12.

हवाओं को डँस रहे हैं नाग
चाँद को निगल रही है अमावस
*
माँ, मुझे चंदन बनना है!

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

निषेधाज्ञा


चुप रहो,
वे सुन रहे हैं!
छिपे रहो,
वे देख रहे हैं!!
साँस मत लो,
उन्हें हमारा जीना पसंद नहीं!!!
...      ...      ...

उनकी तो 
ऐसी की तैसी।


शनिवार, 18 मार्च 2017

चुप्पी

चुन-चुन कर मार दिए जाएँगे
आज के दौर में
बोलने वाले?

जो चुप हैं
वे तो मरे हुए हैं ही!.

@ऋषभदेव शर्मा
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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

अनुनाद



ज़िंदगी के
नाद पर
बजता हुआ
अनुनाद है ;
          कविता कहाँ,
          अनुवाद है!


बाँसवन में
गूँजती है
बाँसुरी की धुन,
औ’ प्रमदवन में
खनकती
झाँझरें रुनझुन; 
राधिका बनकर कभी मन
छेड़ता है तान,
फिर कभी बन राम
करता
जानकी संधान; 
नयन
नयनों से करें जब
मौन संभाषण,
या कि मानस वीथिका पर
गुप्त संप्रेषण;  
जबकि कालिंदी किनारे
कृष्ण मेघों से डरे,
राम घन की दामिनी में
स्मरण सीता का करे;
जान लो तब
यह हृदय का
हृदय से
संवाद है!


जब कभी थक कर
किसी ने
फेर ली आँखें,
जब कभी बोझिल हुई हैं
भींजकर पाँखें; 
जबकि सारे पात
पतझर
की अमानत हो गए,
झर गए सब पुष्प
असमय
हो गईं निर्वस्त्र शाखें; 
साथ सोई छाँह को भी
छोड़कर छल से
घोर वन में
या भवन में, 
प्राण
नल औ’ बुद्ध
बनने के लिए
जब शून्य ताके,
जब हृदय
गलकर, पिघलकर,
आँसुओं के मोतियों की
आब बन झाँके;
काव्य का क्षण 
वह
युगों की पीर है,
अवसाद है!


हादसों पर हादसे
जब भूमि पर घटते,
देख शोषण दीन जन का
घोर घन फटते; 
मेरुदंडों की सिधाई की सज़ा में
होंठ सिल जाते जभी
या
शीश कटते, 
या कि भींतों में
चिने जाते
कभी निर्भीक बच्चे; 
बींध देतीं सूलियाँ जब
प्रेम की
हर एक नस, 
जब पिलाया जाय
सच के
पक्षधर को विष; 
भीड़ हो दुःशासनों की -
कीचकों की-
जयद्रथों की - 
तब चले जो चक्र बनकर
शंख बन गूँजे-
वही
प्रतिवाद है!
(ताकि सनद रहे : ऋषभ देव शर्मा : प्रकाशन काल - 2002)

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

जल ही जीवन

गोमुख से चला तो कितना स्वच्छ था मैं
पुण्य फल का प्रतीक
पवित्रतम
सौभाग्य से परिपूर्ण!

और फिर बीच राह में
वे सब मिले एक के बाद एक
मेरी पहचान मिटाने को आतुर
जाने कितने नाले-पनाले
त्रिशंकु की लार से उपजी कर्मनाशा सरीखे!!

...अब मैं वैतरणी का कुंड हूँ
दुर्भाग्य से दबा
बदबू से भरा
दिव्यता का ऐसा घृणित परिणाम
सोचा न था!!!

आज भी तुम कहते हो
मेरी ही नाभि में है
अपराजेय सुगंध की शाश्वत झील?
                       
3.1. 2017.............................