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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

विदा २०११ !


यह लो, एक बरस बीत गया

हम प्रेम की प्रतीक्षा में
बस लड़ते ही रह गए
साल भर

इसी तरह गँवा दिए
साल दर साल
लड़ते लड़ते
प्रेम की प्रतीक्षा में

बहुत खरोंचें दीं हम दोनों ने
एक दूसरे को

बहुत अपराध किए
बहुत सताया एक दूजे को
एक दूजे का प्यार जानते हुए भी

समय तेज़ी से दौड़ने लगा है
पिछले हर बरस से तेज

इस तीव्र काल प्रवाह में
कल हो न हो
फिर समय मिले न मिले

क्षमा माँग लूँ तुमसे
तुम जो धरती हो
तुम जो आकाश हो
तुम जो जल हो, वायु हो
तुम जो अग्नि हो, प्राण हो ,प्रेम हो
मैंने तुम्हें बहुत सताया , बहुत बहुत सताया
मेरे अपराधों को क्षमा करना

नए वर्ष में
फिर मिलेंगे हम
नए हर्ष से

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

गांधी जयंती पर 12 दोहे




1.
दुनिया कब से लड़ रही , भर प्राणों में क्रोध
नया युद्ध तुमने लड़ा, सविनय किया विरोध
2 .
दुनिया लडती क्रोध से, करती अत्याचार
भारत लड़ता सत्य ले, बाँट बाँट कर प्यार
3 .
उनके हाथों में रहे, सब खूनी हथियार
पर तुमने त्यागे नहीं, सत्य-अहिंसा-प्यार
4 .
अड़े सत्य पर तुम सदा, दिया न्याय का साथ
सत्ता-बल के सामने, नहीं झुकाया माथ
5 .
निर्भय होने का दिया, तुमने ऐसा मंत्र
जगा देश का आत्म-बल, होकर रहा स्वतंत्र
6 .
मिले प्रेम के युद्ध में, भले जीत या हार
तुमने सिखलाया हमें,शस्त्रहीन प्रतिकार
7.
सत्ता,प्रभुता,राजमद, शोषण के पर्याय
नमक बना तुमने दिया, जन-संघर्ष उपाय
8 .
क्या न किया अंग्रेज़ ने,  क्या न गिराई गाज
मगर न कुचली जा सकी, जनता की आवाज़
9
सच्चा नायक तो वही, कथनी-करनी एक
वरना तो झूठे यहाँ, नेता फिरें अनेक
10 .
दौड़ रहे पागल हुए, महानगर की ओर
गांधी की वाणी सुनो, चलो गाँव की ओर
11 .
अगर कहीं कोई मरे, ऋण से दबा किसान
यह गांधी के देश में, उचित नहीं, श्रीमान
12 .
दुनिया बनती जा रही, मंडी औ' बाज़ार
इसे बनाओ, मित्रवर, प्रेमपूर्ण परिवार

29 /9 /2011 //रात्रि 01 :45 .
[ दूरदर्शन (सप्तगिरि चैनल) के निमित्त]

रविवार, 25 सितंबर 2011

अंबर की किरणें सतरंगी लेकिन धरती मटियाली है

अंबर की किरणें सतरंगी
लेकिन धरती मटियाली है
दिया बुझ गया उस खोली का
तुमने कंदीलें बाली हैं

पीले फूलों के भीतर से
झाँक सकोगे क्या जीवन तुम
दूर दूर तक मरुथल फैले
यहाँ ज़रा सी हरियाली है

इसी गली के नुक्कड़ पर तो
पंखों को रेहान धर तितली
कहीं पेट भरने की खातिर
सजा रही तन की थाली है

रतिपति ऋतुपति कहीं और जा
मधुऋतु   की बातें कर लेना
हर शंकर की हथेलियों पर
धरी हुई विष की प्याली है

अमलतास संन्यासी सहमा
सरसों का संसार सिहरता
गुलमोहर बंदूक लिए है
हर कीकर लिए दुनाली है

19 /12 /1981  


सोमवार, 5 सितंबर 2011

बहरे देश में

१.
हर तरफ अंधे धृतराष्ट्र  हैं,
गांधारियों ने
आँखों पर पट्टी बाँध रक्खी है.
महाभारतकार की कलम
रुकी हुई है,
संजय ने चुप्पी साध रक्खी है.
कौन सुने?
कौन बताए?
शरशय्या पर पड़े भीष्मपितामह की
प्यासी आवाजों का
बहरे देश में क्या हुआ?
                  क्या न हुआ?

२.
दुर्योधन से तो कोई शिकायत नहीं,
लेकिन वह एक युधिष्ठिर
जिसके चेहरे पर धर्मराज का मुखौटा चिपका है-
चौराहे चौराहे
अश्वत्थामा की
अनहुई मौत का
समाचार लिए घूमता है;
और उसका बड़ा भाई कर्ण
दानवीर होने का दंभ लिए
दूर-
कुरुक्षेत्र के उस छोर पर जा बैठा है .
किसी को कोई परवाह नहीं
भीष्मपितामह की  प्यासी आवाजों का
बहरे देश में क्या हुआ?
                  क्या न हुआ?

३.
उस पहले  महायुद्ध में जिसने
धरती फोड़कर गंगा निकाल दी थी
वह गांडीवधारी अर्जुन
वैरागी हो गया है;
सारा पौरुष भूल कर भीम
गोदाम में सो गया है.
अभिमन्यु
भूख के चक्रव्यूह से लड़ रहा है,
उत्तरा लकडियाँ बीन रही है
               सुबह चूल्हे के लिए,
               शाम चिता के लिए.
कृष्ण की
कौरवों से शिखर वार्त्ता चल रही है,
द्रौपदी
दु:शासन के टुकड़ों पर पल रही है.
कुंती
मोतियाबिंदभरी आँखों से देख रही है
कैसे उसके दूध का खून हुआ
और कैसे खून पानी हो गया?
कौन सुने?
कौन बताए?
शरशय्या पर पड़े भीष्मपितामह की
प्यासी आवाजों का
बहरे देश में क्या हुआ?
                  क्या न हुआ?

03 /12 /1981    

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

तू कच्ची कचनार

तू कच्ची कचनार राधिके! तू कच्ची कचनार
तू पागल बटमार कन्हैया! तू पागल बटमार

चंदा जैसा मुखड़ा तेरा , कोयल जैसे बोल
जा तू अपनी राह बटोही, करे न और मखौल
तू कोमल सुकुमार राधिके! तू कोमल सुकुमार 
तू है ठेठ गँवार कन्हैया! तू है ठेठ गँवार  

नागिन सी बलखाय किशोरी! हिरनी जैसी चाल 
साँझ भई अब मधुवन मोहे मत रोके नंदलाल!
सुन मेरी मनुहार राधिके! सुन मेरी मनुहार 
तू तो भया लबार कन्हैया! तू तो भया लबार 

चंद्र  किरण सा रूप सलोना, सोने जैसा गात 
मन को मोहे वंशीवाले! तेरी मीठी बात  
तू सुंदर सिंगार राधिके! तू सुंदर सिंगार 
तू चंचल बजमार! कन्हैया!! तू चंचल बजमार !!!

27 नवंबर 1981   


शनिवार, 30 जुलाई 2011

दीवारों के कान सजग हैं

१.

''रूप रश्मियों से नहलाकर
मन की गाँठें खोल

यौवन की वेदी पर अर्पित
क्वाँरा हृदय अमोल

प्राणों पर चुंबन अंकित हों
जीवन में रस घोल!''

                ''दीवारों के कान सजग हैं
                 धीरे धीरे बोल!!''

२.

नभ के शब्द, धरा का सौरभ
हमको छुआ करें

दुग्ध स्नात हर मधुरजनी हो
मिल कर दुआ करें

चाँदी सी किरणें छू छू कर
मनसिज युवा करें

                 दीवारों के कान सजग हैं!
                 होते! हुआ करें!!

३.

नहीं द्वार पर धूप थिरकती
और सूर्य का भान नहीं

कमरे कमरे में सीलन है
दिवा रात्रि का ज्ञान नहीं

                 दीवारों के कान सजग हैं
                 और रोशनी डरी हुई!

ऐसे घर में कौन रहेगा
जिसमें रोशनदान नहीं?

22 नवम्बर 1981  



  

दीवारों के कान

१.
चूल्हा दीपक मौन हैं
आतंकित नादान
गुप्तचरों से सजग हैं
दीवारों के कान

२.
मन की बातें जान लो
नयनों से ही प्राण
ये बजमारे सजग हैं
दीवारों के कान 

३.
जब से जन्मे जेल में
द्वापर में भगवान
तब से सुनते सजग हैं
दीवारों के कान

४.
एक चील के पंख से
जब से गिरा विमान
ध्वनियाँ सुनते सजग हैं
दीवारों के कान 


22 नवंबर 1981     

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

नीम की ओट में

नीम की ओट में जो कई खेल खेले
चुभे पाँव में शूल बनकर बहुत दिन.
वासना के युवा पाहुने जो कुँवारे
बसे प्राण में भूल बनकर बहुत दिन.
           चुंबनों के नखों के उगे चिह्न सारे
           खिले देह में फूल बन कर बहुत दिन
स्वप्न वे सब सलोने कसम वायदे वे
उड़े राह में धूल बन कर बहुत दिन.
११/११/१९८१    

बुधवार, 27 जुलाई 2011

खिला गुलमुहर जब कभी

खिला गुलमुहर जब कभी द्वार मेरे
          याद तेरी अचानक मुझे आ गई

किसी वृक्ष पर जो दिखा नाम तेरा
          जिंदगी ने कहा - ज़िंदगी पा गई

आइने ने कभी आँख मारी अगर
           आँख छवि में तुम्हारी ही भरमा गई

चीर कर दुपहरी , छाँह ऐसे घिरी
          चूनरी ज्यों तुम्हारी लहर छा गई.

   ११/११/१९८१.      

छुआ चाँदनी ने

छुआ चाँदनी ने जभी गात क्वाँरा
नहाने लगी रूप में यामिनी

कहीं जो अधर पर खिली रातरानी
मचलने लगी अभ्र में दामिनी

           चितवनों से निहारा तनिक वक्र जो
           उषा-सांझ पलकों की अनुगामिनी

तुम गईं द्वार से घूँघटा खींचकर
तपस्वी जपे कामिनी-कामिनी

११/११/१९८१  

शुक्रवार, 3 जून 2011

मुलाकाती

मैं आज उससे मिलने गया था
बहुत लंबी लाइन थी
मैं भी लग गया
सुबह से शाम हो गई
पोस्टर देखता खड़ा रहा
वह चला भी गया
मुझसे चला नहीं जाता;
आक थू ! 

सोमवार, 30 मई 2011

कुर्सी : रोटी

कुर्सी मुकुट और दरबार 
रोटी पेटों की सरकार 
       कुर्सी भरे पेट का राज 
       रोटी भूखों की आवाज़ 
              कुर्सी सपनों का संसार 
              रोटी मजबूरी-बेगार 


 कुर्सी शीश चढ़े कुछ फूल 
रोटी पाँव चुभे कुछ शूल 
              कुर्सी रक्त-रक्त की प्यास 
                रोटी स्वेद कणों की आस 
                           कुर्सी ज़हरीला इतिहास 
                          रोटी सुकराती विश्वास 

कुर्सी अकबर की बंदूक
रोटी राणा की इक चूक 
       कुर्सी सतसइया सिंगार
       रोटी भूषण की हुंकार  
              कुर्सी जलियाँवाला बाग़
              रोटी ऊधमसिंह की आग 


   कुर्सी जिन्ना: की तकरार 
रोटी गांधी का अवतार 
              कुर्सी धर्मों का संग्राम 
               रोटी हडताली आसाम 
                              कुर्सी सोया देश तमाम 
                               रोटी जागृति का पैगाम
31 अक्टूबर,1981  

मंगलवार, 24 मई 2011

हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं



हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं
हर लौ घर की ही दुश्मन है, दीपक जो भी बाले हैं

बाँहों में थिरके है तन पर
मन का पंछी तड़प रहा
होंठ-होंठ मुस्कान धरी पर
शूल आँख में कसक रहा
              संबंधों की कौन कहेगा
              व्यापारिक अनुबंध हुए!
यहाँ हिमालय के भीतर ही
आतुर लावा दहक रहा

दूध-चांदनी में धुलकर भी,  सारे गजरे काले हैं
हर छत पर लटकी चमगादड़, दीवारों पर जाले हैं

विश्वासों की मौन बालिका
दुष्यंतों से छली गई
और इत्र बन जाने खातिर
बिना खिली हर कली गई
                शहनाई की आवाजें हैं
                सभी दृष्टियाँ सूनी हैं!
किसकी डोली उठी न जाने
किसकी अर्थी चली गई

गाए कौन मल्हार-मर्सिया, शब्द-शब्द पर ताले हैं
हर लौ घर की ही दुश्मन है, दीपक जो भी बाले हैं

28 अक्टूबर 1981

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

सृजनकि आरंभ क्षणं


''सृजन का पल'' [कविता] का तेलुगु अनुवाद 

सृजनकि आरंभ क्षणं
*********************
चॆप्पालन्न कोरिक
रचिंचालन्न तपन
केवलं तन अस्तित्वान्नि तानु वॆतुक्कोवटमे !

ऒंटिकि पुव्वो
गड्डिपरको
इसुको
लेक रायो तगिलिते
नरनराना ऒक पुलकरिंत
मळ्ळी मळ्ळी ताकालनि...इंका मुट्टुकोवालनि...
आ तरवात ताककूडदनि...
उप्पॊंगे रक्तं माटलाडे
आ क्षणं
अभिव्यक्ति क्षणं
अदे क्षणं सृजनकि प्रारंभं !

कळ्ळमुंदु ऎन्नॆन्नो रंगुलु कदलुतूने उंटायि
कानी एदो ऒक रंगु
ऎप्पुडो कनुरॆप्पलनि दाटि वॆळ्ळि
कललो कदलाडिनप्पुडु
मनसु लोतुल्लो
उत्साहं इंद्रधनुस्सुगा विरिसिनप्पुडु
दिगुलु मब्बुलु चीलिनप्पुडु
सत्संकल्पमने ज्योति वॆलिगे
अदे क्षणं सृजनकि प्रारंभं !

गालिलो तेलिवच्चे ऒक सुवासन
ऊपिरिलो कलवगाने
रागमेदो पलुकुतू
श्वासल तीगलनि बिगिस्तुंदि
मनसु हरिणं कलत चॆंदि तिरुगुतू
अलसिपोयि कूलबडुतुंदि
मुडुचुकुनि पडुकुंटुंदि

आ कलवरं
आ पिच्चि परुगु
ओटमि गुरिंचि अवगाहन
उन्नट्टुंडि एदो दॊरिकिन आनंदं.

आजन्मांतं दाहंतो आत्म
वॆदुकुतूने उंटुंदि
नदुलू,सरोवरालू,बावुलू
कानि बतुकु ऎंड
गॊंतुलो मुळ्ळु मॊलिपिस्तुंदि

ऎप्पुडो ऒक नदि दॊरिकिते
शब्दभेदि बाणमॊकटि
ऒक जीवान्नि हरिस्तुंदि
ऐना चावदु दाहं

इंकॆप्पुडैना ऒक सरोवरं कनबडिते
यक्षुडॊकडु ऎदुरुपडि
संधिस्ताडु प्रश्नलनि वरसगा
दाहार्ति मूर्छपोयि विलविल्लाडुतुंदि

नीटिकोसं वॆतुकुलाट आगदु
अप्पुडॊक जलपातं कनिपिस्ते
दोसिलिपट्टि नीळ्ळु तागि सेदतीरिते
चिरकालपु आ दाहं तीरुतुंदि
निर्मलमैन पाल धार
अमृतंतो तडिसिन पय्यॆद
तृप्तिनिस्तुंदि.

मौनं बद्दलै
हद्दुलु चॆरिगिपोयि
शरीरं दिक्कुललो करिगिपोयि
केवलं मिगुलुतुंदि शून्यं...देहरहितंगा,
शून्यंलोंचि पदाल नक्षत्रालु पॊडिचिनपुडु
आ क्षणमे
अभिव्यक्तिकि आरंभं !

अलाटि दुर्लभमैन क्षणं नाकु दॊरिकिंदॊकटि
अप्पगिस्तुन्नानु दान्नि नीकीक्षणान
स्वीकरिंचु निष्कपटंगा
इदॊक्कटे अभिव्यक्तिकि आरंभ क्षणं
सृजनकि प्रारंभ क्षणं !

*******************************************************
हिंदी मूलं : ऋषभदेव शर्मा 
अनुवादं : आर .शांत सुंदरि
( एप्रिल् पालपिट्ट मासपत्रिकलो प्रचुरिंचबडिंदि)

సృజనకి ఆరంభ క్షణం
*********************
చెప్పాలన్న కోరిక
రచించాలన్న తపన
కేవలం తన అస్తిత్వాన్ని తాను వెతుక్కోవటమే !

ఒంటికి పువ్వో
గడ్డిపరకో
ఇసుకో
లేక రాయో తగిలితే
నరనరానా ఒక పులకరింత
మళ్ళీ మళ్ళీ తాకాలని...ఇంకా ముట్టుకోవాలని...
ఆ తరవాత తాకకూడదని...
ఉప్పొంగే రక్తం మాటలాడే 
ఆ క్షణం
అభివ్యక్తి క్షణం
అదే క్షణం సృజనకి ప్రారంభం !

కళ్ళముందు ఎన్నెన్నో రంగులు కదలుతూనే ఉంటాయి
కానీ ఏదో ఒక రంగు
ఎప్పుడో కనురెప్పలని దాటి వెళ్ళి
కలలో కదలాడినప్పుడు
మనసు లోతుల్లో
ఉత్సాహం ఇంద్రధనుస్సుగా విరిసినప్పుడు
దిగులు మబ్బులు చీలినప్పుడు
సత్సంకల్పమనే జ్యోతి వెలిగే
అదే క్షణం సృజనకి ప్రారంభం !

గాలిలో తేలివచ్చే ఒక సువాసన
ఊపిరిలో కలవగానే
రాగమేదో పలుకుతూ
శ్వాసల తీగలని బిగిస్తుంది
మనసు హరిణం కలత చెంది తిరుగుతూ
అలసిపోయి కూలబడుతుంది
ముడుచుకుని పడుకుంటుంది

ఆ కలవరం
ఆ పిచ్చి పరుగు
ఓటమి గురించి అవగాహన
ఉన్నట్టుండి ఏదో దొరికిన ఆనందం.

ఆజన్మాంతం దాహంతో ఆత్మ
వెదుకుతూనే ఉంటుంది
నదులూ,సరోవరాలూ,బావులూ
కాని బతుకు ఎండ
గొంతులో ముళ్ళు మొలిపిస్తుంది

ఎప్పుడో ఒక నది దొరికితే
శబ్దభేది బాణమొకటి
ఒక జీవాన్ని హరిస్తుంది
ఐనా చావదు దాహం

ఇంకెప్పుడైనా ఒక సరోవరం కనబడితే
యక్షుడొకడు ఎదురుపడి
సంధిస్తాడు ప్రశ్నలని వరసగా
దాహార్తి మూర్ఛపోయి విలవిల్లాడుతుంది

నీటికోసం వెతుకులాట ఆగదు
అప్పుడొక జలపాతం కనిపిస్తే
దోసిలిపట్టి నీళ్ళు తాగి సేదతీరితే
చిరకాలపు ఆ దాహం తీరుతుంది
నిర్మలమైన పాల ధార
అమృతంతో తడిసిన పయ్యెద
తృప్తినిస్తుంది.

మౌనం బద్దలై
హద్దులు చెరిగిపోయి
శరీరం దిక్కులలో కరిగిపోయి
కేవలం మిగులుతుంది శూన్యం...దేహరహితంగా,
శూన్యంలోంచి పదాల నక్షత్రాలు పొడిచినపుడు
ఆ క్షణమే
అభివ్యక్తికి ఆరంభం !

అలాటి దుర్లభమైన క్షణం నాకు దొరికిందొకటి
అప్పగిస్తున్నాను దాన్ని నీకీక్షణాన
స్వీకరించు నిష్కపటంగా
ఇదొక్కటే అభివ్యక్తికి ఆరంభ క్షణం
సృజనకి ప్రారంభ క్షణం !

***************************************************

హిందీ మూలం : ఋషభదేవ్ శర్మ
అనువాదం : అర్ర్.శాంత సుందరి
( ఏప్రిల్ పాలపిట్ట మాసపత్రికలో ప్రచురించబడింది)

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

बहरापन : पाँच कविताएँ

एक :

शोर है, हंगामा है;
लोग
ताबड़तोड़ पीट रहे हैं
मेजें
और सोच रहे हैं
हिंदुस्तान
           बहरा है!

दो :

सडकों पर
उतर आई है भीड़,
जनता
नक्कारे पीट रही है,
पूछता है कबीर-
बहरे हो गए क्या
खुदा
           लोकतंत्र के!

तीन :

दीवारों ने सुन ली,
तारों ने भी सुन ली,
केवल तुमने नहीं सुनी
मेरे मन की बात;
आखिर
तुम ठहरे
           जन्मों के बहरे!

चार :

बहुत दिन
सहा मैंने,
सुनती रही चुपचाप,
झेलती रही
मारकाट सारी,
पर तुम तो उतारू हो गए
मेरी पहचान मेटने पर;
चिल्लाओ मत,
बहरी नहीं हूँ मैं;
और आज से
           गूँगी भी नहीं!

पाँच :

धूल, धुआँ, गुब्बार,
तेज़ाब ही तेज़ाब,
रेडियोधर्मी विकिरण -
तपता हुआ
ब्रह्माण्ड का गोला;
फटने लगे हैं
अंतरिक्ष के कानों के परदे,
चीखती है निर्वसना प्रकृति
......और......
           दिशाएँ बहरी हैं!  

1997 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

कट रहे हैं हाथ मेरे

आँख पर पट्टी बँधी है, काटता है विश्व फेरी!

उड़ रहा तो है कबूतर, पाँव में धागे बँधे हैं.
आँख ताके है शिकारी , कर गुलेलों के सधे हैं.
हैं धरी गिरवी तुम्ही पर सब उड़ानें हाय मेरी!

होंठ मेरे खुद सिलाकर, कान अपने खोलते हो.
जब युधिष्ठिर सत्य बोले, शोर नभ में घोलते हो.
द्रोण विश्वासी हुआ है, छल रही है नीति तेरी!

कट रहे हैं हाथ मेरे, लेखनी फिर फिर उठाते.
क़त्ल कर वे बच रहे हैं, जो तुम्हें सिज़्दे झुकाते.
हो न पाएगी उषा तो, पर तिमिर की क्रीत चेरी!

16 /10 /1981 .  

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

सहृदय

मैंने उससे पूछा
कविता सुनोगे?
उसने काला चश्मा पहन लिया.
मैंने उससे फिर पूछा
कविता सुनोगे?
उसने काला कोट पहन लिया.
मैंने उससे एक बार फिर पूछा
कविता सुनोगे?
उसने काले दस्ताने पहन लिए.

मैं उसे कैसे बताऊँ -
मेरी कविता को श्रोता चाहिए
जासूस,
        जज़
             और
                   जल्लाद
                            नहीं?! 

लोकतंत्र की जय

उस दिन गाँव वालों की आँख कुत्तों की आवाज़ से खुली.
दरअसल गाँव में एक हाथी आ गया था;
और कुत्ते भौंकने लगे थे.

औरतों ने हाथी की आरती उतारी;
कुत्ते भौंकते रहे.

बच्चों ने हाथी को केले खिलाए,
भरपूर मस्ती की;
कुत्ते भौंकते रहे.

कुछ युवक हाथी को मैदान में ले गए,
खूब कंदुक क्रीडा की;
कुत्ते भौंकते रहे.

इसी तरह रात हो गई,
नाच-गाना हुआ,
हाथी ने भी ठुमके लगाए;
निहाल हो गया सारा गाँव;
कुत्ते भौंकते रहे.

अगले दिन भी गाँव वालों की आँख कुत्तों की आवाज़ से खुली.
हाथी गाँव से चला गया था;
कुत्ते अब भी भौंक रहे थे.
दरअसल कुत्ते पागल हो चुके थे.

तब से गाँव-गाँव जाता है हाथी;
और भौंकते रहते हैं कुत्ते.
हाथी को कुत्तों से कोई शिकायत नहीं.
अपनी-अपनी समझ,
अपना-अपना धरम;
लोकतंत्र की जय!

19 / 2 / 2005 .

सोमवार, 31 जनवरी 2011

मैं सृजन की टेक धारे हूँ

तुम सदा आक्रोश में भरकर
               मिटाने पर उतारू हो;
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

o
पत्थरों में गुल खिलाए
पानियों में बिजलियाँ ढूँढीं,
रेत से मीनार चिन दी
बादलों को चूमने को,
सिंधु को मैंने मथा है
और अमृत भी निकाला.
तुम सदा से बेल विष की ही
               उगाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

o
मैं धरा को बाहुओं पर तोलता हूँ,
हर हवा में स्नेह-सौरभ घोलता हूँ;
मैं पसीना नित्य बोता हूँ,
स्वर्ण बन कर प्रकट होता हूँ;
आग के पर्वत बनाए पालतू मैंने,
हिमशिखर पर घर बना निश्चिंत सोता हूँ.

और तुम चुपचाप आकर
भूमि को थर-थर कँपाते,
भूधरों को ही नहीं,
नक्षत्र-मंडल को हिलाते.
तुम विनाशी शक्तियों के पुंज हो;
तुम कभी दावाग्नि, बड़वानल कभी;
तुम महामारी, महासंग्राम तुम.
तुम सदा से मृत्यु का जादू
                जगाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

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लोग रोते हैं बिलख कर
                  तो तुम्हें संतोष मिलता.
डूबती जब नाव, मरते लाख मछुआरे,
                       तुम्हें संतोष मिलता.
आदमी जब ज़िंदगी की भीख माँगे,
हादसा जब आदमी को कील टाँगे;
हर दिशा में रुदन-क्रंदन,
आदमी की शक्तियों का
                        शक्ति भर मंथन,
                 तब तुम्हें संतोष मिलता.

बालकों के आँसुओं पर मुस्कराते हो,
औरतों की मूर्च्छना पर राग गाते हो;
झोंपड़ी की डूब पर आलाप भरते हो,
लाख लाशों को गिरा शृंगार करते हो;
सोचते हो आज तुम जीते-
                      हराया आदमी को,
सोचते हो आज तम जीता -
                      हराया रोशनी को.

पर नहीं! तुम जानते हो -
मैं सदा ही राख में से जन्म लेता हूँ,
ध्वंस के सिर पर उगाता हूँ नई कलियाँ;
दर्द हैं, संवेदना, अनुभूतियाँ हैं पास मेरे,
चीर कर अंधड़, बनाता हूँ नई गलियाँ.

ओ प्रलय सागर!
तुम्हारी रूद्र लहरों को प्रणाम!
काल-जिह्वा-सी
'सुनामी' क्रुद्ध लहरों को प्रणाम!
तुम कभी नव वर्ष में भूकंप लाते हो,
तो कभी वर्षांत में तांडव मचाते हो!
तुम महा विस्तीर्ण, अपरंपार हो, निस्सीम हो!
जानता हूँ मैं कि छोटा हूँ बहुत ही तुच्छ हूँ,

पर तुम्हारे सामने
मैं सिर उठाए फिर खड़ा हूँ;
हूँ बहुत छोटा भले
पर मौत से थोड़ा बड़ा हूँ.
तुम सदा रथचक्र को उलटा
                चलाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.


-फरवरी  2005-

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

लांछित

मनुष्य नहीं हूँ मैं अब
एक गाथा  हूँ;

गाथा गूँजती है
चारमीनार से कन्नगी की प्रतिमा तक
और सुनी जा सकती है
मैरीना बीच से कोवलम तक;
गाथा कसैले संवादों की,
गाथा घिनौने प्रवादों की.

गली-गली घर-घर
चीख-चीख कर
                 जाने कितने धोबी
सुना रहे हैं मेरी करतूत,
महलों तक पहुँचा  रहे हैं आसूचना
दिशा-दिशा से
                   दुर्मुख दूत.

राम, तुम कहाँ हो ?
मुझे निर्वासित क्यों नहीं करते?
मेरे लिए तो धरती फटने से रही!

[22 /2 /2005 ]

नसीहत

कैसे कहता मैं उसे
बदनाम लोगों से बचने के लिए?

मैं कम बदनाम हूँ क्या?

आखिर कोई तो नैतिकता होगी
बुरे आदमी की भी!

[२५ फरवरी २००५].

दोहे : शरद पूर्णिमा

कालिंदी का कूल वह,
वह कदंब की डार.
मन-मधुवन में थिरकते 
अब भी बारंबार..

'राधा-राधा' टेरती 
जब वंशी की तान.
मन-पंछी तब-तब भरे 
चंदा और उड़ान.

१० अक्तूबर २००३  

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

दोहे : हंसा लहूलुहान


जीवन दर्शन और क्या , बस इतनी पहचान.
एक ज्योति को देखना, सबमें एक समान..[१८/१/२००४]


'देवी' कहकर पूजते , करते अत्याचार.
आर्यपुत्र! अब छोड़ दो, यह दुहरा व्यवहार..

अग्निपरीक्षा दे चुकी , सीता बारम्बार.
कर्तव्यों का राम के, अब तो करो विचार..

किया धूप ने जब कभी, मरुथल बीच प्रहार.
बादल बन कर छा गया, तब तब माँ का प्यार..

विषमय जीवन-समर में, हंसा लहूलुहान.
प्रिये! अमृत की धार से, छू दो तन मन प्राण.[२७/९/२००३]  

बुधवार, 26 जनवरी 2011

परी की कहानी

एक परी थी
एक मैं था
मैं क्या था
मैं तो था ही नहीं
बस एक परी थी

परी ने मुझे देखा
मैं धरती पर रेंग रहा था
परी मुस्कराई
मेरे पास आई,
जादू की छडी के अगले सिरे पर चिपके
शुक्र तारे से मुझे छू दिया
मेरी काया के तार झनझना उठे
मेरी रीढ़ में से दो सुनहरे पंख उग आए

परी ने कहा - 'उड़ो'
और मैं
सम्मोहित सा उड़ चला
देर तक उड़ता रहा
दूर तक उड़ता रहा
जब तक वह उड़ाती रही
जहाँ तक वह उड़ाती रही

वह मुझे रोज़ उड़ाती
मैं रोज़ उड़ता
आखिर मैं अच्छा उड़ाक बन गया

बादलों के शीश पर उड़ते हुए
एक दिन मैंने परी से पूछा -
'क्यों दिए तुमने मुझे ये पंख
क्यों सिखाया मुझे उड़ना '

वह हमारा पहला संवाद था
परी ने सहजता से उत्तर दिया-
'क्योंकि मुझे उड़ने वालों से नफरत है
क्योंकि मैं पंखवालों का आखेट करती हूँ'

इसके बाद परी मुस्कराई
मेरे पास आई
जादू की तलवार से धीरे धीरे मेरे पंख रेत दिए
अपनी दी हुई हर उड़ान को हलाल कर दिया

अब 'मैं' फिर धरती पर रेंग रहा है.

[कहानी का नीति पाठ :  
उड़ान के लिए जादू के नहीं सच के पंख चाहिए होते हैं!]


25 फरवरी 2004

जीवन समर में

जीवन-समर में जब गिरा मित्रों के घात से
हर घाव को सहला गए बस तेरे हाथ थे

रक्षा-कवच बना दिया आँचल की छाँव से
वरना मैं कैसे झेलता दिन-रात हादसे

पाँवों में शूल जो चुभे पलकों से चुन लिए
वनवास की हर राह में हम साथ-साथ थे

मैं रेत-रेत हर दिशा में दौड़ता फिरा
मधु गंध रूप रस बने तुम मेरे साथ थे

लहरों से लड़के आ गया इस पार चूंकि जब
मैं डूब रहा था तो तुम भी मेरे साथ थे
28 मार्च 2004 

औरत : एक गाली ?

वे हास्य का आलंबन हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.
वे आक्रमण का पात्र हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.

औरतें कुएँ में पडी हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.

मर्दों की दुनिया में औरत होना
मनुष्य होना नहीं हैं.
वे नहीं हैं मनुष्य
क्योंकि वे औरतें हैं.

'औरत होना' एक गाली है - मर्दों की दुनिया में!

कवि हो तो क्या हुआ
तुम भी तो मर्द हो;
खूब गालियाँ दो औरत के नाम पर
और खूब तालियाँ पिटवाओ.

[औरत को गाली देने पर मेरा देश ताली पीटता है!]

अठारह जनवरी,2004

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

'आखर कलश' से साभार : सात कविताएँ



ऋषभ देव शर्मा की सात कविताएँ