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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

दोहे : हंसा लहूलुहान


जीवन दर्शन और क्या , बस इतनी पहचान.
एक ज्योति को देखना, सबमें एक समान..[१८/१/२००४]


'देवी' कहकर पूजते , करते अत्याचार.
आर्यपुत्र! अब छोड़ दो, यह दुहरा व्यवहार..

अग्निपरीक्षा दे चुकी , सीता बारम्बार.
कर्तव्यों का राम के, अब तो करो विचार..

किया धूप ने जब कभी, मरुथल बीच प्रहार.
बादल बन कर छा गया, तब तब माँ का प्यार..

विषमय जीवन-समर में, हंसा लहूलुहान.
प्रिये! अमृत की धार से, छू दो तन मन प्राण.[२७/९/२००३]  

2 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सामयिक विसंगतियों पर प्रहार करने में सक्षम ...सुन्दर भाव पूर्ण दोहे ..
बहुत अच्छे लगे !

ऋषभ Rishabha ने कहा…

@सुरेन्द्र सिंह " झंझट "

आपने दोहों के प्रहारक तेवर को पहचान कर सराहना की. आभारी हूँ.