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मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

प्रेम बना रहे : मनोदशाओं की समग्र अभिव्यंजना - सुस्मिता घोष

अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.
प्रेम बना रहे : मनोदशाओं की समग्र अभिव्यंजना

                                                      - सुस्मिता घोष

हिंदी साहित्य जगत को समर्पित डॉ. ॠषभ देव शर्मा (1957) द्वारा रचित काव्य कृति ‘प्रेम बना रहे’ (2012) अनेक कारणों से प्रशंसनीय है। इस काव्य कृति में केवल प्रेम का चित्रण ही नहीं है बल्कि इसमें मन के भाव–अनुभावों, तर्क–वितर्क, धारणा–अवधारणाओं का भी चित्रण है। ऐसी भी मनोदशाओं का इसमें अंकन है कि जब कोई किसी से अत्यधिक प्रेम करता है तब उसे यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने प्रियतम को समझता है, प्रेमी मन अपने ही विचारों के जाल में उलझा रहता है, भावनाओं के आवेग में प्रियतम की भावनाओं को समझ नहीं पाता और अपने साथी को ही दुख दे बैठता है। तत्पश्चात अपने साथी को दुख में देखता है तब वह स्वयं ही पश्चात्ताप करता है। दूसरी ओर प्रेमी और प्रेमपात्र की एकप्राणता भी पूरी शिद्धत के साथ उभरकर आई दीखती है। ‘संगम’ कविता में मन के मिलन का अद्भुत वर्णन किया गया है – 

घुल गया
तुम्हारे गौर वर्ण में
मेरे कंठ का सारा नीलापन
 उतर गया
हमारे भीतर आकाश का विस्तार
और समा गया
समुद्र की गहराई में।    (पृ सं 9)

प्रियतम अपनी प्रियतमा की तुलना नदी से करता है कि वह उद्दाम, चंचल, बहती, बिखरती जब समुद्र से मिलने के बाद शांत, शीतल और पूर्ण नज़र आती है। वह अपने प्रियतम को जितना समझने की कोशिश करता है, उसके अंदर झाँकने की कोशिश करता है, उतना ही वह अपने को अनजान पाता है। ‘अवाक’ शीर्षक में प्रेमी के विस्मय का अद्भुत चित्रण है – 

मैं अवाक हो 
सिर्फ ताकता रह जाता हूँ 
कभी चित्र को 
 कभी चित्र में तुम दिखते हो 
 कभी चित्र तुममें दिखता है
 आज अभी तो ऐसा दीखा 
जबरन ओढी केचुल कोई 
तुमने स्वयं नोंच डाली है।   (पृ सं 18,19) 

वहीं ‘प्रमाद’ कविता में प्रेमिका को पाने के लिए जतन करता प्रेमी है। प्रियतमा के प्रेम को अपनी मुट्ठी में बंद करना चाहता है परंतु उसका अभिमान टूट कर बिखर जाता है। अभिमान के टूटने पर उसे यह अहसास होता है कि प्रेम अधिकतर नहीं समर्पण है - 

मिट्टी का मिथ्या अभिमान 
तुम्हारी दिव्यता के प्रसाद को 
समझ लिया था प्रेम।     (पृ सं 22)

समर्पण व त्याग की परिभाषा से परे एक दूसरे के साथ जीवन काटते-काटते एक दूसरे का साथ ही मन को रास आने लगता है। एक जब अपनी उडान आकश में भरता है तो दूसरा उसकी हौसला अफज़ाई करता है। अपने सपनों का त्याग कर अपने साथी की सफलता में खुश होता है। ‘आकाश’ कविता में समर्पण का चित्रण बड़े ही सुंदर ढंग से किया गया है - 

मानस के राजहंस ने 
अपने सुनहरे पंख
साँप की केंचुल जैसे
छोड़ दिए
तुम्हारी झोली में
मेरे पंख
तुम्हें मिल ये - जैसे इनका होना 
सार्थक हो गया।
मेरे पास
पंख नहीं हैं, न हों,
पर तुम तो हो-
*** कितना सुख है
 इस अनुभूति में 
कि-
तुम्हीं मेरे पंख हो 
तुम्हीं मेरी उडान,
तुम्हीं मेरा आकाश,
और यह सारा आकाश
मेरी बाँहो में सिमटा है 
मेरे होठों से चिपका है
मेरी आँखों में अँज गया है     (पृ सं 33,34,35) 

दोनों एक दूसरे के सपनों को जीते हैं। प्रेमी भी अपने सपनों को देकर अपने प्रिय को पा लिया है। यही दोनों उनका स्वाभिमान और विश्वास है। जीवन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना लेकर दोनों जीवन पथ पर चले थे। उसे पूरा करने के लिए किसी गलत तरिके का सहारा न लेंगे, इनका यह संकल्प था। ‘आग को जिंदा रखना’ कविता में संकल्प की प्रचेष्टा देखी जा सकती है - 

आग को जिंदा रखना
ऐसा न हो 
कि गीली सीली लकड़ियाँ 
आग को धुएँ में तब्दील कर दें या फिर
फायर ब्रिगेड का हमला 
यह सारी तपन पी जाए 
याद रखना 
आग को जिंदा रखना 
एक विज्ञान है  
जिसकी तकनीक 
तुम्हारे हाथों में है।           (पृ सं 37)

मनुष्यों का जीवन परिवर्तनशील है। इसके साथ मशीनों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। हाड मांस के शरीर के अंदर बसने वाला मन बड़ा ही चंचल होता है। जब दो मन एक साथ जीवन यापन करने का निश्चय करते हैं तो ऐसा कभी नहीं होता कि उनकी भावनाएँ आपस में न टकराएँ। ऐसा भी संभव नहीं कि एक कहे और दूसरा उसकी बात बिना शर्त मानता जाए। यदि ऐसा होता है तो वह साथी नहीं गुलाम होगा। जीवन साथी वही होते हैं जो एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें तथा एक दूसरे के दुख तकलीफ़ में साथ दें। दोनों के सुख-दुख एक ही हों। 

कई बार ऐसा महसूस होता है कि जीवन एक अंधा कुआँ है जो किसी भी परिवर्तन से निर्विकार है। परंतु यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सच है? रचनाकार ने अपने शब्दों में जीवन के इस सत्य को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। यदि जीवन को एक अंधा कुआँ मान भी लें तो अंधे कुएँ की गहराई से आती प्रति ध्वनियाँ बिजली जैसी कौंधती हैं। बिजली के फूल की तरह चमकती हैं और रोशनी देती हैं जो जीवन को प्रकाशित करती है। सूरज ढलने का भ्रम देता है पर ढलता नहीं इसका एहसास हमें अंधेरे में ही होता है। ‘अंधा कुआँ’ शीर्षक में यह द्रष्टव्य है -

देखो।
 अंधा कुआँ होना भी
कोई दुर्भाग्य नहीं
गहराई में से
 आती हुई प्रतिध्वनियाँ
माध्यम बनती हैं
****
सूरज -
जो ढलने का
भ्रम देता है
पर कभी ढलता नहीं।       (पृ सं 40 41)

‘गोपिका मैं’ शीर्षक में जीवन साथी के मन में एक दूसरे के प्रति गोपियों जैसा दीवानापन है। हर आहट अपने प्रेमी के आने का भ्रम देता है। इसमें प्रेम का आध्यात्मिक स्वरूप झलकता है। ‘वसीयत’ कविता में समर्पण के भाव को देखा जा सकता है। यहाँ प्रेमी स्वयं को ही ‘हव्य सामग्री‘ के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ यह द्रष्टव्य है- 

सुनो 
मैंने 
अपने दोंनो हाथ 
तुम्हारे नाम 
वसीयत/ 
कर दिए हैं।
***
अगर तुम्हें 
कभी ऊष्मा की ज़रूरत हो
तो
मेरे दोनों बेडौल हाथ
चूल्हे में झोंक देना 
ये मैंने 
तुम्हारे नाम 
वसीयत 
कर दिए हैं।    (पृ सं.45, 46) 

‘सौंदर्य’ शीर्षक कविता में कवि ने सौंदर्य व प्रयोजन के बीच सुंदर तालमेल बैठाया है। जीवन में सुंदरता ही सब कुछ नहीं होती बल्कि उपयोगिता का महत्त्व होता है। किसी चीज की सार्थकता ही उसकी सुंदरता होती है। इन पंक्तियों में यह स्पष्ट है - 

प्रश्न
सुडौल और बेडौल
होने का नहीं
जुझारू और
सक्रिय होने का है
सुंदरता से आगे
उपयोगिता का है
ऊर्जस्विता का है।         (पृ सं 47)

‘प्रिय चारुशीले’ शीर्षक कविता में प्रेमी की तुलना ऐसे भ्रमर से की है जो वह जितनी बार अपने प्रेम को प्रेयसी के समक्ष प्रस्तुत करता है उतनी बार उसे प्रेयसी से उपेक्षा ही प्राप्त होती है। वह अपराधी की तरह प्रत्येक दंड के लिए प्रस्तुत रहता है ताकि अपनी प्रियतमा की रुष्टता को कम कर सके। इन पंक्तियों में इन भावों का चित्रण मिलता है- 

प्रिये चारुशीले।
तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने नतमस्तक है
आज यह भी हो जाने दो 
ठुकराओ, राधा ठकुरानी।           (पृ सं 59)

‘रोपता हूँ बीज तुम में’ शीर्षक कविता में दोनों जीवन के प्रति आशावादी हैं। वे इस नश्वर जीवन में अपने प्रेम को अमर बनाने को व्याकुल हैं तथा एक नवीन सृष्टि की कामना करते हुए कल्पवृक्ष लगाना चाहते हैं तथा ऐसी संतति को जन्म देना चाहते हैं जो सृष्टि के अंत का कारण न बने बल्कि सृष्टि को पुष्ट करे और प्रलय को रोके।

इन काव्य शृंखलाओं में नायिका का रूठना–मनाना, घृणा-प्रेम, तिरस्कार-स्वीकार भावों का वर्णन सुंदर ढंग से वर्णन किया गया है। नायिका गोपन की अपनी तमाम चेष्टाओं के बाद भी अपने प्रेम को छिपा नहीं पाती है। प्रेमी को पूर्ण समर्पण का अहसास करा जाती है। प्रेमी भी उसके प्रेम में सराबोर हो जाता है। ‘निवेदन’, ‘मन किसी का’, ‘मत गिराओ बिजलियाँ’, ‘तृप्ति की अप्सरा’ और ‘आज मेरा गीत’ में परिपक्व प्रेम भावना को अनुभव किया जा सकता है। 

‘जितना प्यार दिया है तुमने’ शीर्षक गीत में कवि ने प्रेमी के तृप्त मन को दर्शाया है। प्रेमी कृतज्ञता बोध, आभार व्यक्त करते हुए कहता है कि - 

जो आभार किया है तुमने मैं तो इसके योग्य नहीं था 
जो अधिकार दिया है तुमने मैं तो इसके योग्य नहीं था    (पृ सं 101)

‘जीवन समर में’ शीर्षक गजल में दर्शित है कि जीवन के संधर्ष में जब सभी मित्र शत्रु बन जाते है, तब भी जीवन संगिनी साथ नहीं छोडती। वह ढाल बनकर न केवल रक्षा करती है बल्कि जीवन में फिर से उठ खड़े होकर आगे बढ़ने की हिम्मत भी देती है – 

जीवन – समर में जब गिरा मित्रों के घात से 
हर घाव को सहला गए बस तेरे हाथ थे।       (पृसं117)

सारांशत: इस काव्य कृति में कवि ने प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है्। पुरुषप्रधान समाज में जहाँ स्त्री व स्त्री की भावना पुरुषों की जागीर है, वहाँ इस कवि ने स्त्री की भावनाओं को उचित मान दिया है। विषय के अनुसार भाव, भाषा, विचार, उपमेय, उपमान और लयात्मकता की दृष्टि एक श्रेष्ठ कृति है - हिंदी काव्य जगत को एक सुंदर उपहार है – ‘प्रेम बना रहे’!

बुधवार, 28 अगस्त 2013

बुधवार, 21 अगस्त 2013

बोम्मै-पसु-अडिमै = गुड़िया-गाय-गुलाम

अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2011/  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.
गुड़िया–गाय–गुलाम (मूल : ऋषभ देव शर्मा)

परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.

कल तुमने मुझे
अपने खूँटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.

आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ

नहीं!
मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!! 
(देहरी: 2011: पृष्ठ1)


तमिल अनुवाद (नीरजा)

போம்மை-பஸு-அடிமை 


ரொம்ப காலமாய நீ ஏந்நை
சத்தமபோடும் பொம்மை என்று நிநைத்து
தீரையில நிர்லாக்ஷ்யமாஈ விஸிரிநாய
காலால மிதைத்தாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.

நேட்ரு நீ ஏந்நை
உந கம்புக்கு கட்டிய பஸு என்று நிநைத்து 
ஏந காலில கயிரை மாட்ரீநாய
ஏந பால மடியை கரைத்திநாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.

இன்று நீ என்னை
உன் அடிமை என்று நினைத்து
ஏன் நாக்கை இரும்பு ஈட்டியால் ஸுட்ரிவிட்டாய ஆனாலும் நீ நினைக்கிறா
நான் வாய் அசைக்யமாட்டேன் என்று! 

இல்லை!
நான் பொம்மை இல்லை!
நான் பசுவும் இல்லை!! 
நான் அடிமை இல்லை!!!


हिंदी लिप्यंतरण


बोम्मै-पसु-अडिमै


रोंभ कालमाय नी एन्नै 
चत्तमपोडुम बोम्मै एंड्रु निनैत्तु 
तिरैयिल निर्लाक्ष्यमाई विसिरिनाय 
कालाल मिदैत्ताय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै. 

नेट्रु नी एन्नै 
उन कम्बुक्कु कट्टिय पसु एंड्रू निनैत्तु 
एन कालिल कयिरै माट्रीनाय 
एन पाल मडियै करैत्तिनाय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै. 

इंद्रु नी एन्नै 
उन अडिमै एंड्रु निनैत्तु 
एन नक्कै इरुम्बु ईट्टीयाल सुट्रिविट्टाय आनालुम नी निनैक्कराया 
नान वाई असैक्यमाटेन एंड्रू ! 

इल्लै ! 
नान बोम्मै इल्लै ! 
नान पसुवुम इल्लै !! 
नान अडिमै इल्लै !!!


सोमवार, 22 जुलाई 2013

लोकनिद्रा

अरी ओ चिरैया!
ज़रा उषा की अगवानी के गीत तो गाओ.
                              जनता को जगाना है

अरी ओ कलियो!
ज़रा चटक कर खुशबू बिखेरो न
                              जनता को जगाना है

अजी ओ सूरज दादा!
जमे हिम खंड पिघला दो अपनी धूप से
                              जनता को जगाना है

अरी ओ हवाओ!
सहलाओ मत, जोर से हिलाओ, झकझोरो
                              जनता को जगाना है

अरे ओ बादलो!
उमडो घुमडो गरजो बरसो, बिजली चमकाओ
                              जनता को जगाना है


अरी ओ धरती!
फट नहीं पड़ना!  थोड़ा और धीर धरो!!
                              जनता जाग रही है!!!



विस्मरण

वह खाली आँखों से मुझे देख रही थी निर्निमेष
पहचानने की कोशिश करती हुई

मैंने अपनी पहचान बताई
वह सुन न सकी,
दोनों कानों के परदे ध्वस्त हो चुके थे

मैं पास जा बैठा सटकर
उसकी उँगलियाँ सहलाईं
गाल छुए
वह वैसे ही देखती रही - कोई पहचान नहीं!
मुझे देख रही थी या मेरे पार; आज तक पता नहीं

मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया
दुनिया की सबसे गरम सेज अभी ठंडी नहीं हुई थी!
मैंने धीरे से पुकारा - माँ....
उसकी पुतलियाँ घूमीं - स्मृति लौट रही थी!
उसने होंठ खोले - आवाज़ जा चुकी थी!

कडुआती आँखें मींच लीं मैंने आँसू गटकने को
अहह! उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं ;
मैंने आँखें खोलीं - वह मुझे पहचान रही थी!
आँखों में आँखें डाल कर मैंने काँपते स्वर में कहा - माँ, राम राम;
माँ के होंठ फडफडाए- जीभ नहीं उठी
आवाज़ नहीं निकली - पर असीसती उँगलियाँ बोल रही थीं

माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी!



रविवार, 21 जुलाई 2013

गलगोड्डा[1]

कई बरस पहले हमारे पुरखे
इस गाँव में ले आए थे
एक विचित्र प्राणी

कहने को चौपाया
पर थीं तीन ही टांगें – तीनों घायल,
चौथी टांग अदृश्य

घिसट घिसट कर चलता
मौके बेमौके सींग और पूँछ चलाता
जोर से डकारता

हमने उसके गले में भ्रष्टाचार की ईंटें बाँध दी हैं
अदृश्य टांग की जगह रोप दिया है ऐरावत का घंटा
अब वह चलता नहीं खड़ा खड़ा हिलता है  






[1] . चंचल पशुओं के गले में बाँधा जाने वाला गति-अवरोधक पत्थर, पाया अथवा खूंटा.



क्षणिक

इंद्र के वज्र सा मेरा अस्तित्व

अभी कौंधा
और
लो, विलीन हो चला

पलक झपकते हो गई प्रलय



सोमवार, 15 अप्रैल 2013

कुत्ता-गति


प्रभो!
तुम्हारे कुत्तों ने बहुत सताया है मुझे
जाने कहाँ से निकल कर चुपचाप
चलने लगते हैं बचपन से ही
मेरे साथ साथ
कभी आगे कभी पीछे

मेरी पद चाप
मेरी देह गंध
इन तक दूर से पहुँच जाती रही है
और ये झपटते रहे हैं मुझ पर अचानक घात लगाकर
गली खेत गाँव घर शहर ही नहीं
सारे धरम करम भरम में भी

सपनों तक में
मुझे इनकी आवाजे अकेला नहीं होने देतीं
सुरक्षित नहीं महसूसने देतीं
और तुम कहते हो ये मेरी सुरक्षा के लिए हैं

घोर अंधेरी रात में
आवाजें उनकी बहुत दूर लगती रहती हैं
पर वे झपट पड़ते हैं अचानक बहुत नज़दीक से
मैं कूद पड़ता हूँ  पर्वत शिखर से गहरी नदी में
मुझे तैरना नहीं आता
पानी भरता चला जाता है मेरे मुँह में
नाक कान आँख  में
मेरे भीतर भौंकने लगते हैं हज़ारों कुत्ते एक साथ

यही कुत्ता-गति होनी थी मेरी
तो मुझे मानुष-देह क्यों दी थी भला ?