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सोमवार, 22 जुलाई 2013

विस्मरण

वह खाली आँखों से मुझे देख रही थी निर्निमेष
पहचानने की कोशिश करती हुई

मैंने अपनी पहचान बताई
वह सुन न सकी,
दोनों कानों के परदे ध्वस्त हो चुके थे

मैं पास जा बैठा सटकर
उसकी उँगलियाँ सहलाईं
गाल छुए
वह वैसे ही देखती रही - कोई पहचान नहीं!
मुझे देख रही थी या मेरे पार; आज तक पता नहीं

मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया
दुनिया की सबसे गरम सेज अभी ठंडी नहीं हुई थी!
मैंने धीरे से पुकारा - माँ....
उसकी पुतलियाँ घूमीं - स्मृति लौट रही थी!
उसने होंठ खोले - आवाज़ जा चुकी थी!

कडुआती आँखें मींच लीं मैंने आँसू गटकने को
अहह! उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं ;
मैंने आँखें खोलीं - वह मुझे पहचान रही थी!
आँखों में आँखें डाल कर मैंने काँपते स्वर में कहा - माँ, राम राम;
माँ के होंठ फडफडाए- जीभ नहीं उठी
आवाज़ नहीं निकली - पर असीसती उँगलियाँ बोल रही थीं

माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी!



1 टिप्पणी:

SP Sudhesh ने कहा…

मैं ने माँ पर अनेक कविताएँ पढ़ी हैं । अपनी माँ पर कई कविताएँ भी लिखीं ।
पर आप की यह कविता रास्ते चलते किसी अन्य की माँ का मार्मिक चित्रण
करती है । दूसरे की माँ में अपनी ही माँ को देख लेना कितना रसात्मक है ,
यह कविता बताती है । धन्य हो गये शर्मा जी आप यह रचना रच कर । आप की
कवित्व शक्ति को प़णाम करता हूँ ।