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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

स्वेच्छाचार

हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.
उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया ,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!

अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!

हाँ,मैं हूँ स्वेच्छाचारी!
मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की-
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!

मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!

4 टिप्‍पणियां:

santha ने कहा…

sharmaa ji ,

aaj kal patr patrikaon me jis baat ko lekar garmagaram charcha hone lagee hai ...shaayad useese prabhaavit hokar aapkee kalam se yeh kavita phootee hai.

kavita bhejne ke liye dhanyavaad.

shanta sundari

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ऋषभ की कविताएँ: स्वेच्छाचार
समाज में व्याप्त अन्याय और मनमानी को स्वीकार न कर अपनी अंतरात्मा की आवाज पर चलनेवाली स्त्रियों को स्वेच्छाचारिणी कह कर प्रताड़ित किया जाने का बहुत उचित
उत्तर दिया है इस कविता में ,आपके संवेदनशील मन ने!
ऋषभदेव जी ,आपको बधाई!

प्रस्तुतकर्त्री - प्रतिभा सक्सेना

Kamal ने कहा…

Priy Rishabh ji,
Is purush-pradhaan samaj mein kisi n kisi roop mein aadikal se lagbhag poore vishw mein naari ko
purush ka gulam samjha gaya aur aadikal se naari apne swaabhiman ke liye sangharsh bhi karti rahi >
swa-icchha-aachaar jaise dosh rahit shabd ko bhi ek gali bana kar rakh diya gaya-(Swechhacharini ?)
Apne badi kushalta is shabd ki asmita ko is kavita mein nibhaaya hai. Saadhuwad !
kamal

SYED MASOOM RAZA ने कहा…

Aadarneeya Sir,

Kavita vaakayee apna sandesh dene mein kamiyab rahi hai. Mahilaaon ko jitna dabaya gayaa utnaa hi voh oopar udati gayee. Aapki rachana un mahilayoon ke liye bada sambal hai jo purusha pradhan samaj mein apna stahan bade sangharsh ke bad abana pane me saphal rahi hai. bahut-bahut badhai.
Syed masoom Raza