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मंगलवार, 4 मई 2010

लाज न आवत आपको


तुम्हें चबाने को हड्डी चाहिए थी
खाने को गर्म गोश्त
चाटने को गोरी चमड़ी
चाकरी को सेविका
और साथ सोने को रमणी.


तुमने मुझे नहीं
मेरी देह को चाहा.
पर मैं देह होकर भी
देह भर नहीं थी.


मैं औरत थी!
मुझे लोकलाज थी!


तरसती थी मैं भी - तुम्हारे संग को
तड़पती थी मैं भी - राग रंग को
पर मुझे लोकलाज थी.


तुम क्या जानो लोकलाज?
बस दौड़े चले आए साथ साथ!


न तुमने रात देखी न बारिश
न तुमने नाव देखी न नदी
तुम्हें लाश भी दिखाई नहीं दी
साँप तो क्या ही दीखता?
तुम लाश पर चढ़े चले आए!
तुम साँप से खिंचे चले आए!
न था तुम्हें कोई भय
न थी लोकलाज.


तुम पुरुष थे
सर्वसमर्थ .


और समर्थ को कैसा दोष?


मैं औरत थी
पूर्ण पराधीन.


और पराधीन को कैसा सुख?


तुम आए
मैंने सोचा-
प्रलय की रात में मेरा प्यार आ गया.
पर नहीं
यह तो कोई और था.
इसे तो
हड्डी चाहिए थी चबाने को
गर्म गोश्त खाने को
गोरी चमड़ी चाटने को
और रमणी साथ सोने को!


पर मैं औरत थी
लोकलाज की मारी औरत!


तुम्हें बता बैठी तुम्हारा सच
और तुम लौट गए उलटे पैरों
कभी न आने को!

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

आज ही यह रचना कहीं पढ़ी थी, याद नहीं आ रहा कि कहाँ..

संजय भास्कर ने कहा…

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

Sunil Kumar ने कहा…

एक नारी की व्यथा को एक पुरुष के द्वारा व्यक्त करने का प्रयास सराहनीय है

सुन्दर अभिव्यक्ति एवं रचना के लिए बधाई