मन उदास है आज सुबह से
कुछ भी नहीं सुहाता जैसे
सब कुछ तो है यहाँ पास में
फिर भी कुछ है जो खोया है
गाँव, गली, घर, आँगन अपना
करके याद बहुत रोया है
नवसंवत्सर की वेला में
अभी अभी बीते बरसों तक
बंदनवार सजाए मैंने
अभी अभी तो कल परसों तक.
यहाँ कहाँ वे आम महकते
यहाँ कहाँ हरियाली वैसी
यहाँ कौन पूरे रंगोली
वैभव में कंगाली कैसी
यहाँ उदास और एकाकी
मैं हूँ, और वहाँ घर सारा
पूजा की पावन ध्वनियों से
गूँज रहा होगा चौबारा
सुनते हैं कोई ब्रह्मा थे
सृष्टि जिन्होंने रची इसी दिन
और सुना है किसी राम का
भी अभिषेक हुआ था इस दिन
धर्मराज जो रहे युधिष्ठिर
इस ही दिन थे हुए प्रतिष्ठित
यह युगादि का पर्व मनोहर
अग जग को करता आनंदित
यों तो बातें हुई फोन पर
घंटों चैटिंग भी कर ली है
सोशल साइट दिखीं कई, पर
मन का इक कोना खाली है
मैं डालर के लिए यहाँ पर
मानव वन में भटक रहा हूँ
पर अपनी निजता को खोकर
आज स्वयं को खटक रहा हूँ
अभी वेब कैम से देखा
माँ यों तो खुश खुश दिखती है
पर आँखों की नमी हँसी से
उस भोली से कब छिपती है
मुझको तो उपदेश रही थी
अपने आँसू पोंछ रही थी
यह जीवन छह रस का मिश्रण
इसको इसी तरह जीना है
इसीलिए तो हर युगादि पर
छह रस का मिश्रण पीना है
माँ कहती है – अरे
नीम की कलियाँ कडवी
सब कटुता को सहना
तुम्हें सिखा देंगी ये
और पके केले की मधुता
सुख में तुम्हें डुबा देंगी ये
हरी और काली मिर्चों का
तीखापन यदि झेल गए तो
चाहे जितना तपे जिंदगी
बिना क्रोध यदि खेल गए तो
जीवन सहज सुहाना होगा
हर किस्मत को आना होगा
डरो नहीं तुम किसी हाल में
इसीलिए तो लवण जरूरी
और हताशा कभी न घेरे
खट्टी इमली से क्या दूरी
जो है आज कसैला बेटे
कल वह मीठा हो जाएगा
हरी आमियाँ तपें धूप में
तब रसाल वन महकाएगा
अम्मा, यों तो वे सारे रस
इस विदेश में भी मिलते हैं
लेकिन एक महारस तेरे
हाथों का न कहीं मिलता है
मेरे मन में तो भारत है
बाहर कहीं नहीं दिखता है
इसीलिए तू भी उदास है
ऊपर ऊपर से हँसती है
इसीलिए मैं भी उदास हूँ
सब बेगानों की बस्ती है
तेरे चरणों में करता हूँ
इस युगादि पर पूजन-अर्चन
अपने आशीषों से कर दे
तू मेरा वंदन अभिनंदन
दूर देस में मैं बैठा हूँ
इसीलिए यह मन उदास है
तेरे हाथों षटरस चखने
की ही केवल भूख प्यास है
5 टिप्पणियां:
बहुत संवेदनशील रचना ... नववर्ष की शुभकामनायें
♥
यों तो बातें हुई फोन पर घंटों चैटिंग भी कर ली है
सोशल साइट दिखीं कई, पर मन का इक कोना खाली है
मैं डालर के लिए यहाँ पर मानव वन में भटक रहा हूँ
पर अपनी निजता को खोकरआज स्वयं को खटक रहा हूँ
अभी वेब कैम से देखा माँ यों तो खुश खुश दिखती है
पर आँखों की नमी हँसी से उस भोली से कब छिपती है
मुझको तो उपदेश रही थी अपने आँसू पोंछ रही थी
मां तो है मां , मां तो है मां
मां जैसा दुनिया में कोई कहां ...
संवेदनशील !
आदरणीय ऋषभ देव शर्मा जी
सस्नेहाभिवादन !
बहुत भावपूर्ण सुंदर रचना लिखी है आपने ...
मार्मिक !
बधाई ! साधुवाद !
~*~नवरात्रि और नव संवत्सर की बधाइयां शुभकामनाएं !~*~
शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
अति सुंदर.
नव संवत्सर पर यह कविता युगों का संचरण करती है , जिस में एक ही नहीं उन सब बेटों की वेदना और घर के प़ति ललक और माँ की ममता का महारस
मिश्रित है , जो घर से बाहर देश या विदेश में कहीं ज़िन्दगी की जंग लड़ रहे हैं ।
इस सफल कविता के लिए डा शर्मा को बधाई देता हूँ ।
बहुत सुंदर, आशा के अनुरूप! बधाई
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