समर्थक

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

असमंजस

मैंने रात से ज़िद की -
ठहर जा 
कुछ घड़ी और.
और वह चली गई
बिना ठहरे 
कुछ घड़ी पहले.

5 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

आपकी जिद, वह भी रात से बहुत सुंदर बधाई

cmpershad ने कहा…

time and tide wait for none :)

ऋषभ Rishabha ने कहा…

@ Sunil Kumar
वह रात सुख-सपनों वाली हुआ करती थी.

@cmpershad
पर हम-आप तो एक-दूजे का इंतज़ार किया करते हैं न? यह बात अलग है कि आजकल आप भी दो घड़ी पहले ही चले जाते हैं, सर जी!

gdblog9 ने कहा…

vo aap ke vaaste hee to chale gai
kuonki
svale rukne pur achha hua inkaar kar baithe
khushi ke maare mur jaate agar tum ruk gaye hote

ऋषभ Rishabha ने कहा…

@gdblog9

आ.गुरुदयाल जी,
वाकई ऐसा भी हो सकता है!