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शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

मेरा पक्ष

मैंने प्रण किया था-
तुम्हारा  साथ दूँगा
भूख के खिलाफ हर युद्ध में.
मैंने उठाई थी बंदूक-
बुर्ज पर टँगी तुम्हारी रोटी
उतार लाने को.

आज तुम्हारे हाथों में 
खून की रोटी है 
और तुम खेत में बारूद उगाने लगे हो 
अनाज की जगह.

यार मेरे , इतना तो बता -
अब मैं किसे मारूँ! 

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

गहन रचना.

cmpershad ने कहा…

`और तुम खेत में बारूद उगाने लगे हो
अनाज की जगह.'

यही तो होगा बाज़ारीकरण का परिणाम :(

डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल ने कहा…

कविता के भाव बहुत सुंदर हैं।

ऋषभ Rishabha ने कहा…

@Udan Tashtari
आभारी हूँ.

@cmpershad
पता नहीं यह बाजारीकरण का परिणाम है या कुछ और., लेकिन चिंता का विषय यह है कि जनसंघर्ष जनसंहार में बदल गया है!

@डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल
ब्लॉग पर पधारने के लिए कृतज्ञ हूँ.