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गुरुवार, 31 मई 2012

स्वप्नचित्र

मैं रचने चली थी
अपने सपनों की एक लड़की
 .
एक लड़की
जो खुद खड़ी हो
अपने पैरों पर
 ....
सारी ताकत समेट कर
अपने घुटनों में
 .
पर तुम जाने कहाँ से आ गए
उसे सहारा देने
!
दूर हटो
कम से कम सपने तो
देख लेने दो
मुझे
मेरे मन के
.

3 टिप्‍पणियां:

Vijuy Ronjan ने कहा…

rishabh prayas achha hai....par kuch rachne ke liye jaagna parta hai....aur khwab ki larki rachna chaho to brail lipi seekhni hogi....anyways,likhte raho....ye vyakti ko samarth banati hai.

Suman ने कहा…

bahut sundar ...

Vinita Sharma ने कहा…

टूट कर सपना अधूरा उन प्रसंगों से कभी जुड़ता नही है

समय है गतिमान आगे बढ गया तो लौट कर मुड़ता नही है
22 hours ago · Like.