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सोमवार, 31 जनवरी 2011

मैं सृजन की टेक धारे हूँ

तुम सदा आक्रोश में भरकर
               मिटाने पर उतारू हो;
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

o
पत्थरों में गुल खिलाए
पानियों में बिजलियाँ ढूँढीं,
रेत से मीनार चिन दी
बादलों को चूमने को,
सिंधु को मैंने मथा है
और अमृत भी निकाला.
तुम सदा से बेल विष की ही
               उगाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

o
मैं धरा को बाहुओं पर तोलता हूँ,
हर हवा में स्नेह-सौरभ घोलता हूँ;
मैं पसीना नित्य बोता हूँ,
स्वर्ण बन कर प्रकट होता हूँ;
आग के पर्वत बनाए पालतू मैंने,
हिमशिखर पर घर बना निश्चिंत सोता हूँ.

और तुम चुपचाप आकर
भूमि को थर-थर कँपाते,
भूधरों को ही नहीं,
नक्षत्र-मंडल को हिलाते.
तुम विनाशी शक्तियों के पुंज हो;
तुम कभी दावाग्नि, बड़वानल कभी;
तुम महामारी, महासंग्राम तुम.
तुम सदा से मृत्यु का जादू
                जगाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.

o
लोग रोते हैं बिलख कर
                  तो तुम्हें संतोष मिलता.
डूबती जब नाव, मरते लाख मछुआरे,
                       तुम्हें संतोष मिलता.
आदमी जब ज़िंदगी की भीख माँगे,
हादसा जब आदमी को कील टाँगे;
हर दिशा में रुदन-क्रंदन,
आदमी की शक्तियों का
                        शक्ति भर मंथन,
                 तब तुम्हें संतोष मिलता.

बालकों के आँसुओं पर मुस्कराते हो,
औरतों की मूर्च्छना पर राग गाते हो;
झोंपड़ी की डूब पर आलाप भरते हो,
लाख लाशों को गिरा शृंगार करते हो;
सोचते हो आज तुम जीते-
                      हराया आदमी को,
सोचते हो आज तम जीता -
                      हराया रोशनी को.

पर नहीं! तुम जानते हो -
मैं सदा ही राख में से जन्म लेता हूँ,
ध्वंस के सिर पर उगाता हूँ नई कलियाँ;
दर्द हैं, संवेदना, अनुभूतियाँ हैं पास मेरे,
चीर कर अंधड़, बनाता हूँ नई गलियाँ.

ओ प्रलय सागर!
तुम्हारी रूद्र लहरों को प्रणाम!
काल-जिह्वा-सी
'सुनामी' क्रुद्ध लहरों को प्रणाम!
तुम कभी नव वर्ष में भूकंप लाते हो,
तो कभी वर्षांत में तांडव मचाते हो!
तुम महा विस्तीर्ण, अपरंपार हो, निस्सीम हो!
जानता हूँ मैं कि छोटा हूँ बहुत ही तुच्छ हूँ,

पर तुम्हारे सामने
मैं सिर उठाए फिर खड़ा हूँ;
हूँ बहुत छोटा भले
पर मौत से थोड़ा बड़ा हूँ.
तुम सदा रथचक्र को उलटा
                चलाने पर उतारू हो,
मैं सृजन की टेक धारे हूँ.


-फरवरी  2005-

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

लांछित

मनुष्य नहीं हूँ मैं अब
एक गाथा  हूँ;

गाथा गूँजती है
चारमीनार से कन्नगी की प्रतिमा तक
और सुनी जा सकती है
मैरीना बीच से कोवलम तक;
गाथा कसैले संवादों की,
गाथा घिनौने प्रवादों की.

गली-गली घर-घर
चीख-चीख कर
                 जाने कितने धोबी
सुना रहे हैं मेरी करतूत,
महलों तक पहुँचा  रहे हैं आसूचना
दिशा-दिशा से
                   दुर्मुख दूत.

राम, तुम कहाँ हो ?
मुझे निर्वासित क्यों नहीं करते?
मेरे लिए तो धरती फटने से रही!

[22 /2 /2005 ]

नसीहत

कैसे कहता मैं उसे
बदनाम लोगों से बचने के लिए?

मैं कम बदनाम हूँ क्या?

आखिर कोई तो नैतिकता होगी
बुरे आदमी की भी!

[२५ फरवरी २००५].

दोहे : शरद पूर्णिमा

कालिंदी का कूल वह,
वह कदंब की डार.
मन-मधुवन में थिरकते 
अब भी बारंबार..

'राधा-राधा' टेरती 
जब वंशी की तान.
मन-पंछी तब-तब भरे 
चंदा और उड़ान.

१० अक्तूबर २००३  

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

दोहे : हंसा लहूलुहान


जीवन दर्शन और क्या , बस इतनी पहचान.
एक ज्योति को देखना, सबमें एक समान..[१८/१/२००४]


'देवी' कहकर पूजते , करते अत्याचार.
आर्यपुत्र! अब छोड़ दो, यह दुहरा व्यवहार..

अग्निपरीक्षा दे चुकी , सीता बारम्बार.
कर्तव्यों का राम के, अब तो करो विचार..

किया धूप ने जब कभी, मरुथल बीच प्रहार.
बादल बन कर छा गया, तब तब माँ का प्यार..

विषमय जीवन-समर में, हंसा लहूलुहान.
प्रिये! अमृत की धार से, छू दो तन मन प्राण.[२७/९/२००३]  

बुधवार, 26 जनवरी 2011

परी की कहानी

एक परी थी
एक मैं था
मैं क्या था
मैं तो था ही नहीं
बस एक परी थी

परी ने मुझे देखा
मैं धरती पर रेंग रहा था
परी मुस्कराई
मेरे पास आई,
जादू की छडी के अगले सिरे पर चिपके
शुक्र तारे से मुझे छू दिया
मेरी काया के तार झनझना उठे
मेरी रीढ़ में से दो सुनहरे पंख उग आए

परी ने कहा - 'उड़ो'
और मैं
सम्मोहित सा उड़ चला
देर तक उड़ता रहा
दूर तक उड़ता रहा
जब तक वह उड़ाती रही
जहाँ तक वह उड़ाती रही

वह मुझे रोज़ उड़ाती
मैं रोज़ उड़ता
आखिर मैं अच्छा उड़ाक बन गया

बादलों के शीश पर उड़ते हुए
एक दिन मैंने परी से पूछा -
'क्यों दिए तुमने मुझे ये पंख
क्यों सिखाया मुझे उड़ना '

वह हमारा पहला संवाद था
परी ने सहजता से उत्तर दिया-
'क्योंकि मुझे उड़ने वालों से नफरत है
क्योंकि मैं पंखवालों का आखेट करती हूँ'

इसके बाद परी मुस्कराई
मेरे पास आई
जादू की तलवार से धीरे धीरे मेरे पंख रेत दिए
अपनी दी हुई हर उड़ान को हलाल कर दिया

अब 'मैं' फिर धरती पर रेंग रहा है.

[कहानी का नीति पाठ :  
उड़ान के लिए जादू के नहीं सच के पंख चाहिए होते हैं!]


25 फरवरी 2004

जीवन समर में

जीवन-समर में जब गिरा मित्रों के घात से
हर घाव को सहला गए बस तेरे हाथ थे

रक्षा-कवच बना दिया आँचल की छाँव से
वरना मैं कैसे झेलता दिन-रात हादसे

पाँवों में शूल जो चुभे पलकों से चुन लिए
वनवास की हर राह में हम साथ-साथ थे

मैं रेत-रेत हर दिशा में दौड़ता फिरा
मधु गंध रूप रस बने तुम मेरे साथ थे

लहरों से लड़के आ गया इस पार चूंकि जब
मैं डूब रहा था तो तुम भी मेरे साथ थे
28 मार्च 2004 

औरत : एक गाली ?

वे हास्य का आलंबन हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.
वे आक्रमण का पात्र हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.

औरतें कुएँ में पडी हैं
क्योंकि वे औरतें हैं.

मर्दों की दुनिया में औरत होना
मनुष्य होना नहीं हैं.
वे नहीं हैं मनुष्य
क्योंकि वे औरतें हैं.

'औरत होना' एक गाली है - मर्दों की दुनिया में!

कवि हो तो क्या हुआ
तुम भी तो मर्द हो;
खूब गालियाँ दो औरत के नाम पर
और खूब तालियाँ पिटवाओ.

[औरत को गाली देने पर मेरा देश ताली पीटता है!]

अठारह जनवरी,2004

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

'आखर कलश' से साभार : सात कविताएँ



ऋषभ देव शर्मा की सात कविताएँ