ऋषभ की कविताएँ
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बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
असमंजस
मैंने रात से ज़िद की -
ठहर जा
कुछ घड़ी और.
और वह चली गई
बिना ठहरे
कुछ घड़ी पहले.
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