शाम थी कैसी कि नटखट बादलों में हम घिरे थे। सब दिशाएँ खो गई थीं, भटकते यूँ ही फिरे थे।। याद हैं फिसलन भरी क्या चीड़ की वे पत्तियाँ? एक-दूजे को संभाले दूर तक जिनसे गिरे थे।।
पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था। आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।। मैं जिसे गुस्सा समझ ताज़िंदगी डरता रहा; डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।
डर रहे बूढ़े सयाने, सब कहें 'हम क्या करें'? छिप गए सब कोटरों में, जान कर भी क्यों मरें?? चाँदनी में बाल खोले, घूमती है प्रेतनी! और बच्चे हैं कि बाहर खेलने की ज़िद करें!
खेत काटकर सड़क बना दी, सभी सुखा दीं क्यारी। मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो हैं व्यापारी।। कहीं तुम्हारी विजय कथा में, मेरा नाम नहीं है! ब्रज का सब कुछ हरण कर लिया, प्रभुता यही तुम्हारी।।
होंठ पर थे गीत मेरे, साँस में मेरी कहानी थी। उन दिनों आपको मेरी हर अदा लगती सुहानी थी।। आज बरसों बाद अपनी समझ में यह बात आई है; आपने चाहा जिसे वह मैं न था, मेरी जवानी थी।।
दुश्मन के संग वास की आदत से लाचार हूँ। वर्षा के बीच प्यास की आदत से लाचार हूँ।। मैं जानता हूँ, आज फिर तुमने झूठ कहा है; पर क्या करूँ, विश्वास की आदत से लाचार हूँ।।
कब कहा मैंने कि मुझको बाँह में अपनी भरो। कब कहा मैंने कि आहें याद में मेरी भरो।। यह तुम्हारा रूप पावन, दृष्टि को पावन करे; प्राण में गूँजा करे, बस, तान कुछ ऐसी भरो।
फिर सुहानी भोर आई, मित्रवर, तुमको नमन। ऊर्जा की धूप छाई, मित्रवर, तुमको नमन।। यह दिवस उल्लास में, आनंद में खिलता रहे; शुभकामना संदेश लाई, मित्रवर, तुमको नमन।।