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गुरुवार, 11 मई 2017

स्थितप्रज्ञ


जनता भूखी है, हुआ करे।
किसान नंगे हैं, हुआ करें।।
जवान मरते हैं, मरा करें।
सत्ता बची रहे, दुआ करें।।
24/4/2017

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वह शाम

शाम थी कैसी कि नटखट बादलों में हम घिरे थे।
सब दिशाएँ खो गई थीं, भटकते यूँ ही फिरे थे।।
याद हैं फिसलन भरी क्या चीड़ की वे पत्तियाँ?
एक-दूजे को संभाले दूर तक जिनसे गिरे थे।।

गुस्सा

पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था।
आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।।
मैं जिसे गुस्सा समझ ताज़िंदगी डरता रहा;
डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।

सम्मोहन

अमरित की कनी ज़हर में डुबाई है।
चमकती हुई तलवार निकल आई है।।
यह अलौकिक रूप नज़रें बाँध लेगा;
आज बिजली चाँदनी में नहाई है।।

भय

डर रहे बूढ़े सयाने, सब कहें 'हम क्या करें'?
छिप गए सब कोटरों में, जान कर भी क्यों मरें??
चाँदनी में बाल खोले, घूमती है प्रेतनी!
और बच्चे हैं कि बाहर खेलने की ज़िद करें!

जीवन जो जिया

झल्लाई सी सुबह, पगलाई सी शाम।
क्रोध भरी दोपहर, यों ही दिवस तमाम।।
प्रेत ठोकते द्वार, ले ले मेरा नाम!
रात भूतनी बनी, यहाँ कहाँ विश्राम।।

इतिहास बनाने वाले

खेत काटकर सड़क बना दी, सभी सुखा दीं क्यारी।
मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो हैं व्यापारी।।
कहीं तुम्हारी विजय कथा में, मेरा नाम नहीं है!
ब्रज का सब कुछ हरण कर लिया, प्रभुता यही तुम्हारी।।

दौड़

मैंने जिनके वास्ते सब छल किए।
सौ बलाएँ लीं, सदा मंगल किए।।
वक़्त का क्या फेर? सत्ता क्या गई?
वे मुझी को छोड़, आगे चल दिए।।

युद्ध

हाथ में लेकर पताका शिखर पर चढ़ता रहा।
आदमी अपनी सरहदें खींचकर लड़ता रहा।।
भूमि जिसके नाम पर खून से लथपथ पड़ी है!
सातवें आकाश पर वह बैठकर हँसता रहा।।

मानव अधिकार

मरता है कोई छात्र तो सियासत न कीजिए।
भूखों मरे किसान तो तिजारत न कीजिए।।
हैं आप बड़े बुद्धिमान, शब्दों के खिलाड़ी!
लेकिन पिशाच कर्म की वकालत न कीजिए।।

आतंक बीज

कल आपने बोई थीं गलियों में नफ़रतें।
यों आज लहलहाई हैं घर घर में दहशतें।।
नादान बालकों को वहशी बनाने वालो!
खाएँगी तुमको एक दिन तुम्हारी वहशतें।।

शुभ आगमन

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से मधुरिम पराग झरता है
तुम्हारी निगाह से धरा का रँग निखरता है
जाग उठती हैं दिशाएँ तुम्हारे आने से
तुम्हारे गाने से सूरज उड़ान भरता है

खुशबू

एक पगली छोकरी।
फूलों की टोकरी।।
खुशबू ने कर ली
उसके घर नौकरी।।

वह मैं न था

होंठ पर थे गीत मेरे, साँस में मेरी कहानी थी।
उन दिनों आपको मेरी हर अदा लगती सुहानी थी।।
आज बरसों बाद अपनी समझ में यह बात आई है;
आपने चाहा जिसे वह मैं न था, मेरी जवानी थी।।

हालचाल

मौसम का हालचाल, हमसे न पूछिए।
यारों की चाल-ढाल, हमसे न पूछिए।।
नेता की रग में पैठ के, कुर्सी के कीट ने -
क्या-क्या किया कमाल,हमसे न पूछिए।।

लाचार हूँ

दुश्मन के संग वास की आदत से लाचार हूँ।
वर्षा के बीच प्यास की आदत से लाचार हूँ।।
मैं जानता हूँ, आज फिर तुमने झूठ कहा है;
पर क्या करूँ, विश्वास की आदत से लाचार हूँ।।

रूप

कब कहा मैंने कि मुझको बाँह में अपनी भरो।
कब कहा मैंने कि आहें याद में मेरी भरो।।
यह तुम्हारा रूप पावन, दृष्टि को पावन करे;
प्राण में गूँजा करे, बस, तान कुछ ऐसी भरो।

शुभोदय

फिर सुहानी भोर आई, मित्रवर, तुमको नमन।
ऊर्जा की धूप छाई, मित्रवर, तुमको नमन।।
यह दिवस उल्लास में, आनंद में खिलता रहे;
शुभकामना संदेश लाई, मित्रवर, तुमको नमन।।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

कवि धर्म

संभव नहीं कि शक्ति हो औ' ज़्यादती न हो।
इतना करो कि ज़्यादती को ज़्यादती कहो।।
जनता के चारणो! सुनो,सत्ता के मत बनो;
तुम जागते रहो कि कहीं ज़्यादती न हो।।
6/4/2017

बंदूक

छज्जे प' चोंच लड़ाते कबूतरों को देख कर;
बस्ती के दारोगा ने कल बंदूक दाग दी।।
सरकार के फरमान से हम इस कदर डरे;
बचपन के सारे खतों को रो रो के आग दी।।

6/4/2017