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शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

अश्रद्धा

 क्यों, 

आखिर क्यों

मुझे शर्मिंदा होना चाहिए?

मैंने खुद चुनाव किया, इसलिए?

मेरा चुनाव गलत था, इसलिए?

बस इसी से हक़ मिल गया उसे

मेरे 35 टुकड़े करने का?

बस इसी से हक़ मिल गया तुम्हें

मुझे असंस्कारी सिद्ध करने का?


????


और उन हज़ारों का क्या

जिन्हें बाँधा था तुमने संस्कार की साँकल से,

फिर भी जिन्हें हर रात मिले 

केवल ज़हरीले सर्प-परिरंभ,

और निगल गए जिन्हें उन्हीं के देवता

मगरमच्छ बन कर? 000

                 (18/11/2022)

बुधवार, 26 नवंबर 2014

[शोध पत्र] ऋषभदेव शर्मा के काव्य में स्त्री विमर्श [लेखक - विजेंद्र प्रताप सिंह]


शोध पत्र
ऋषभदेव शर्मा के काव्य में स्त्री विमर्श
-     विजेंद्र प्रताप सिंह

हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के ‘डिस्कोर्स‘ शब्द के पर्याय के रूप में प्रचलित है, जिसका अर्थ है वर्ण्य विषय पर सुदीर्घ एवं गंभीर चिंतन। सामान्य रूप से कहा जाए तो विमर्श किसी समस्या अथवा स्थिति पर किसी एक कोण से विचार न करते हुए भिन्न-भिन्न दृष्टियों, मानसिकताओं, संस्कारों तथा वैचारिक प्रतिबद्धतताओं के अनुसार समेकित रूप से विचार करना ही विमर्श कहा जा सकता है। विमर्श में वर्ण्य विषय से संबंधित विविध पक्षों को समग्रता से समझने का प्रयत्न करते हुए मानवीय संदर्भों में निष्कर्ष प्राप्ति की ओर अग्रेषित हुआ जाता है। विचार मंथनोपरांत प्राप्त निष्कर्ष को अंतिम नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देशकाल और वातावरण के अनुसार पूर्व प्रस्तुत निष्कर्षों का नवीन रूप भी सामने आ सकता है। जहाँ तक प्रश्न है स्त्री विमर्श का,आज इसका समावेश साहित्य की प्रत्येक विधा में हो चुका है और समाज के प्रगति-उन्मुख होने के क्रम में स्त्री विमर्श के पूर्व निष्कर्षों तथा अवधारणाओं में भी पर्याप्त परिवर्तन परिलक्षित होने लगा है।

प्राचीन काल से ही काव्य को रसश्रेष्ठ माना गया है। यद्यपि प्राचीन कालीन काव्य परिभाषाओं और वर्तमान काव्य परिभाषाओं में वह साम्य नहीं रह गया है। अवधारणाएँ और परिभाषाएँ युगीन संदर्भों में परिवर्तित होती रहती हैं। बात यदि कविता की की जाए तो कहा जा सकता है कि जो संदेश पाठक या श्रोता तक कई पृष्ठों की कहानी या उपन्यास पहुँचा सकता है वही संदेश संप्रेषित करने में चंद पंक्तियों की कविता अधिक प्रभावी सिद्ध होती है। कारण स्पष्ट है कि आज व्यस्तताओं के दौर में साहित्य पढ़ने वालों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। व्यक्ति कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा ग्रहण करने का आग्रही हो चला है। स्त्री विमर्श के संदर्भ में भी कविताओं ने महती भूमिका निभाई है। प्रस्तुत आलेख ऋषभदेव शर्मा के अग्रलिखित कविता संग्रहों क्रमशः तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (2011), प्रेम बना रहे (2012) तथा सूँ साँ माणस गंध (2013) में प्रस्तुत स्त्री विमर्श के विविध पक्षों को विवेचित किया जा रहा है।

21वीं सदी तक आते-आते हिंदी कविता में वैश्वीकरण, पर्यावरण विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श,सांप्रदायिकता, आतंकवाद, राजनीति आदि विषय प्रमुखता से समाहित हो चुके हैं। दरअसल समकालीन परिवेश इन सभी से आच्छादित है और चूँकि सामाजिक परिवेश ही साहित्यकार के प्रेरणास्रोत के रूप में कार्य करता है; अतः कवियों द्वारा इन विषयों को काव्यवस्तु बनाया जाना स्वाभाविक है।

ऐतिहासिक रूप से साहित्य पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि स्त्रियाँ आदिकाल से ही पारंपरिक नियमों में जकड़ी हुई रही हैं। परंपरा का स्पष्ट अर्थ है रीति-रिवाजों, नियमों तथा रूढ़ियों का बिना किसी परिवर्तन के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जारी रहना। यद्यपि वैदिक युग में स्त्री शिक्षा का प्रचलन था और समाज में स्त्रियों को बहुत सम्मानित स्थान प्राप्त था परंतु परवर्ती कालों में उसकी स्थिति निम्न से निम्नतर होती गई। हिंदी साहित्य के आदिकाल में सिद्ध, जैन, रासो तथा लोकिक साहित्य प्रमुखता से रचा गया। रासो साहित्य में चंदबरदाई कृत ‘पृथ्वीराज रासो’ में नायक नायिका को प्राप्त करने हेतु संघर्ष करता हुआ दिखाया गया है। अन्य धाराओं के साहित्य में स्त्री को पुरुष उन्नति का सबसे बड़ा अवरोधक माना गया है। ये साहित्य आत्मसंयम, हठयोग और साधना वकालात करते हैं और स्त्री को पाप का मार्ग बताते हुए उसके सहचर्य से दूर रहने का पक्ष लेते हैं।

मध्यकाल अर्थात भक्तिकाल तक स्त्री जीवन अनेक विसंगतियों से परिपूर्ण हो चुका था और यही कारण रहा कि इस काल में स्त्री विमर्श सशक्त होकर रचनाओं के रचनतंत्र एवं रचना रहस्य के रूप में प्रस्तुत हुआ। इस काल के संत स्त्रियों से दूर रहने की बात करते हैं और सूफी संत स्त्री के माध्यम से ही परमतत्व की प्राप्ति पर जोर देते हैं। भक्तिकाल में कई स्त्री कवियित्रियाँ भी हुईं जिनमें उमा, पार्वती, मुक्ताबाई, रत्नावली, दयाबाई, सहजोबाई आदि का नाम उल्लेखनीय है।

मध्यकाल में स्त्री विमर्श की दृष्टि से मीराबाई का नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि वे उस काल की एकमात्र स्त्री रही जिन्होंने शोषक व्यवस्था का आमूल रूप से परिवर्तित करने के लिए पहल की। राज परिवार की झूठी शान, युवा विधवा जीवन भर बंदिनी की स्थिति का विरोध, सती करने की परंपरा तथा धर्म एवं भक्ति पर से पुरुषों के एकाधिकार को तोड़ा। ‘‘मीरा तत्कालीन प्रथा के अनुसार सती नहीं हुई क्योंकि वे स्वयं को अजर-अमर स्वामी की चिरसुहागिनी मानती थी।‘‘(डॉ. नगेंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ सं. 235)।
रीतिकाल में साहित्य का केंद्र स्त्री रही पंरतु इस काल के कवियों ने स्त्री को सिर्फ भोग-विलास की वस्तु के रूप में ही प्रस्तुत किया। परंतु जायसी के ‘पद्मावत’ में स्त्री की किशोरावस्था संबंधी सकारात्मक चिंतन एवं नागमती के रूप में पुरुष की अय्याशी के कारण उत्पन्न दुखों के वर्णन को स्त्री पक्ष में माना जाना अनुचित न होगा।

“मिलहिं रहसि सब चढहिं हिंडोरी। झूलि लेहिं सुख बारी भोरी।।
झूलि लेहु नैहर जब ताईं। फिरि नहिं झूलन देइहिं साईं ।।
पुनि सासुर लेइ राखहिं तहाँ। नैहर चाह न पाउब जहाँ ।।
कित यह धूप, कहाँ यह छाँहा। रहब सखी बिनु मंदिर माहाँ ॥
गुन पूछहि औ लाइहि दोखू। कौन उतर पाउब तहँ मोखू ॥
सासु ननद के भौंह सिकोरे। रहब सँकोचि दुवौ कर जोरे ॥
कित यह रहसि जो आउब करना। ससुरेइ अंत जनम भरना ॥
कित नैहर पुनि आउब, कित ससुरे यह खेल। 
आपु आपु कहँ होइहिं परब पंखि जस डेल ॥“
(मलिक मुम्मद जायसी, पद्मावत)

आधुनिक काल में आकर स्त्रियों को भी अपने भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता मिली। बंग महिला, उषादेवी मित्रा, कमला चौधरी, होमवती देवी, सत्यवती मलिक, शिवरानी देवी, महादेवी वर्मा, मन्नू भंडारी, कुसुम अग्रवाल, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मृणाल पांडे, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, जया जादवानी, शिवानी, उषा प्रियवंदा, मालती जोशी, शशिप्रभा शास्त्री, दीप्ति खंडेलवाल, मेहरुन्निसा परवेज, कृष्णा सोबती, इंदुमती, सूर्यबाला, राजी सेठ, सुशीला टाकभौरे,दुर्गा हाकरे, अनामिका आदि स्त्री विमर्श की प्रमुख हस्ताक्षर हैं।

लेखन क्षेत्र में स्त्रियों के पदार्पण ने पुरुषों को भी स्त्री विमर्श संबंधी लेखन की ओर रुख करने के लिए विवश किया। अब पुरुष लेखक भी न सिर्फ स्त्रियों के प्रति सहानुभूति दिखा रहे हैं बल्कि उनके अधिकारों की बात भी करते हैं।

स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव का प्रमुख कारण है मानसिक संकीर्णता। सर्वविदित है कि भारतीय जनमानस की विशेषता रही है कि वह घर के बाहर तो स्त्री पर होने वाले अत्याचारों की निंदा करता है और घर के अंदर स्वयं स्त्री पर अत्याचार करता है। घर और बाहर की दुनिया के लिए पृथक-पृथक दृष्टिकोण ही स्त्री उत्थान के लिए सर्वाधिक बाधक है। “प्रत्येक भारतीय पुरुष चाहे वह जितना भी सुशिक्षित हो, अपने पुरानी संस्कारों से इतना दूर नहीं हो सका है कि वह अपनी पत्नी को अपनी प्रदर्शनी न समझे। उसकी विधा, उसकी बुद्धि, उसका कला-कौशल और उसका सौंदर्य सब उसकी आत्मश्लाघा के साधन मात्र हैं।“ (महादेवी वर्मा, शृंखला की कडि़याँ, पृष्ठ सं. 73)।

ऋषभदेव शर्मा की उपर्युक्त छहों काव्य कृतियों में स्त्री विमर्श के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है, जिसे अग्रलिलिखित रूप में देखा जा सकता है-

भारतीय समाज में सदियों से पुरुषों की दुनिया बाहर की तथा स्त्रियों की दुनिया घर की, के रूप में बंटी रही है। पिता संरक्षक या राजा, भाई युवराज या सेनापति, स्त्रियाँ गृहणी, संरक्षिता रही हैं। कमोवेश परिस्थितियाँ आज भी वैसी ही हैं परंतु उतनी बंदिशपूर्ण नहीं हैं जितनी पहले हुआ करती थीं। ‘आज भी स्त्री : घर और बाहर’ की दुनिया की अवधारणा पर प्रहार करते हुए ऋषभदेव शर्मा कहते हैं-

“कितना मनहूस था वह दिन जब
किसी पिता ने किसी भाई ने किसी बेटे ने किसी पति ने
किसी बेटी को किसी बहन को किसी माँ को किसी पत्नी को
सुझाव दिया था घर में रहने का,
हिदायत दी थी देहरी न लाँघने की और
बँटवारा कर दिया था दुनिया का - घर और बाहर में।
बाहर की दुनिया पिता की थी - वे मालिक थे, संरक्षक थे।
भीतर की दुनिया माँ की थी - वे गृहणी थी, संरक्षिता थीं।
माँ ने कहा - मैं चलूँगी जंगल में तुम्हारे साथ;
मुझे भी आता है बर्बर पशुओं से लड़ना!!
हँसे थे पिता- तुम और जंगल? तुम और शिकार??
कोमलांगी, तुम घर को देखो, बाहर के लिए मैं हूँ न!
प्रतिवाद नहीं सुना था पिता ने और
चले गए थे सावधान रहने का निर्देश देकर
दरवाजे को उढ़काते हुए।
माँ रह गई थी बड़बड़ाते हुई...
बस तभी से बड़बड़ा रही हैं औरतें.....” ( क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें, देहरी, पृष्ठ सं. 26, 27)।

एक अन्य कविता ‘पत्नीं मनोरमां देहि‘ में भी डॉ. ऋषभ ने घर और बाहर की अवधारणा पर प्रहार किया है, यथा-

“उन्होंने ‘घर’ और ‘बाहर का बँटवारा कर दिया।
इसी के साथ बँटबारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में ‘घर’ और ‘घर का काम’ आ गया।
वे धीरे से मालिक बन गए और मैं गुलाम।“ ( पत्नीं मनोरमां देहि, देहरी, पृष्ठ सं.81)।

युवतियों के प्रति यौनहिंसा से विश्व का कोई भी कोना अछूता नहीं रह गया है। भारत में तो स्थिति दिन प्रति दिन बद से बदत्तर होती जा रही है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 43 प्रतिशत लड़कियाँ 19 वर्ष तक यौनहिंसा का शिकार हो जाती हैं।20 प्रतिशत भ्रूण या महीने भर के नवजात गर्भ के दौरान मार दी जाती हैं। 15 से 19 वर्ष की आयु की 77 प्रतिशत लड़कियाँ पति या साथी की यौनहिंसा का शिकार होती हैं। (अमर उजाला, शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014, पृष्ठ सं. 8)। अनगिनत स्त्रियाँ प्रतिदिन यौनशोषण के राहु की गिरफ्त में आकर त्राहि त्राहि करती हैं और समाज दर्शक बना देखता रहता है। यौनहिंसा कर दानव बना मानव स्वयं को किस प्रकार शाबाशी देता है, इसे व्यंग्यपूर्वक प्रस्तुत करती हैं ये पंक्तियाँ –

“मैंने अस्मत लूटी मैंने छुरा घोंप कर मारा है,
ऐसे पुण्य कमाया वैसे अपराधी मैं शातिर हूँ।
मैंने कलियों को रौंदा है मैंने फूलों को मसला,
माली की नजरों से फिर भी ओझल हूँ मैं जाहिर हूँ।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं.14)।

वर्तमान समाज में परिस्थितियान इतनी भयावह हो चुकी हैं कि स्त्रियाँ हर जगह भयाक्रांत रहती हैं। क्या घर क्या बाहर हर जगह भेडि़ये ही भेडि़ये और वे हर पल ताक में रहते हैं कि स्त्री रूपी शिकार कब दिखे और वे दबोच लें –

“क्रूर भेडि़ए छिपकर बैठे, नानी की पोशाकों में,
नन्हीं लाल चुन्नियों का दम, घुट जाने की आशंका।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं.17)।

पूँजीपतियों द्वारा जनता का शोषण कोई नई बात नहीं है। कर्ज के बोझ तले दबा परिवार तिल-तिल चिंता में मरता रहता है। यहाँ तक वह तीज त्यौहार के आने पर भी खुश नहीं हो पाता है बल्कि सेठ कर्ज वसूलने आ धमकेगा और गृहस्वामिनी, बच्चियों पर अपनी गंदी नजर डालेगा यह सोच कर घबराते रहते हैं। परिवार की स्त्री बच्चों को दुख दर्द झेलते हुए पालती है क्योंकि उसका पति शहर में काम करने गया हुआ है ताकि कर्ज उतारने के लिए पैसों का इंतजाम हो सके। उसका हरपल गंभीर चिंता में कटता है और उसका व्यथित हृदय कह उठता है कि -

“कच्ची नीम की निंबौरी, सावन अभी न अइयो रे
मेरा शहर गया होरी, सावन अभी न अइयो रे
कर्जा सेठ वसूलेगा, गाली घर आकर देगा
कड़के बीजुरी निगोरी, सावन अभी न अइयो रे
गब्बर लूट रहा बस्ती, ठाकुर मार रहा मस्ती
क्वांरी है छोटी छोरी, सावन अभी न अइयो रे।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं.29)।

कर्ज के बदले गरीबों, दलितों, आदिवासियों तथा स्त्रियों का शोषण साहूकारों का परम शौक रहा है। कर्ज एक पीढ़ी लेती है और उसे चुकाना कई पीढ़ियों को पड़ता है। कर्ज के मूल की ब्याज के रूप में अपनी पत्नी, बहन की इज्जत को लुटता देखना उनकी मजबूरी होती है और जिस्मखोर साहूकारों की पहली पसंद। पीढ़ी दर पीढ़ी कर्ज के दानव के बढ़ते आकार को अभिव्यंजित करती हैं अग्रलिखित पंक्तियाँ - 
“पुरखों ने कर्ज लिया, पीढ़ी को भरने दो
अपराधी हाथों की, जासूसी करने दो।“ (तरकश, पृष्ठ सं.28)।

समाज में सूदखोरों और तथाकथित समाज के सभ्य ठेकेदारों का शोषण के लिए सबसे सहज, सत्ता और आसानी से उपलब्ध शिकार रही है स्त्री। भूखे, नंगे और मजबूर घर की औरत को वैसे तो ये सभ्य समाज के ठेकेदार कभी देखना भी पसंद नहीं करते परंतु जैसे ही इनकी नजर उसके शारीरिक कटाव-छटांव पर जाती है वह गंदी नहीं रह जाती है और उस स्त्री का परिवार कर्जे में डूबा हो तो वह सूदखोर, जमींदार या फिर उसका मुनीम गरीब के घर की इज्जत को अपने पैरों की दासी और सबसे आसानी से उपलब्ध हो सकने वाले जिंदा मांस की दृष्टि से ही देखता है और यह तक नहीं सोचता कि जिस गरीब स्त्री के उरोजों पर उसकी गंदी निगाहें टकटकी बाँधे हुए हैं उन्हें देखकर उसका मजबूर पति, भाई या पिता के हृदय पर क्या गुजरती होगी। वे बेचारे तो सिर्फ मन में ही घुटकर रह जाते हैं परंतु उनका हृदय कह उठता है –

“भूख के उरोज पर सेठ या मुनीम
औेर ना धरें नजर भूमि की पुकार” (तेवरी, पृष्ठ सं. 77)।

देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर भारत को आजादी दिलाई। महान बलिदानियों ने क्या-क्या सोच कर संघर्ष किया होगा परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देशवासी पूर्वजों द्वारा दिखाए गए सन्मार्ग को भूल गए और उसका परिणाम हमारे समक्ष नाना प्रकार के भ्रष्टाचार के रूप में है। जहाँ बेटियाँ देवी का रूप मानकर पूज्य हैं वहीं उनका व्यापार किया जा रहा है और देश के कर्णधार बेटी बचाओ, देश बचाओ जैसे नारे सुनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ स्वयं देहव्यापार जैसे कुकृत्यों में लिप्त हो जाते हैं-

“बापू की बेटी बिकी अगर, इसमें हम क्या कर लें।
कुछ नारे नए सुझाएँगे, हम वंशज गांधी के।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं.33)।

भ्रष्टाचारी, आतंकी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं। उनका सबसे आसान शिकार स्त्रियाँ ही होती हैं। इंसान तो इंसान उन्होंने बच्चों के खिलौनों तक को नहीं बख्शा है –

‘‘धर्म ने अंधा किया कुछ इस तरह
आदमी को आदमी खाने लगा
भर दिया बारूद गुडि़या चीरकर
झुनझुनों का कंठ हकलाने लगा।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं.37)।

आज के दौर में हर व्यक्ति अपने आप में ही मस्त मग्न है। आस-पास क्या हो रहा है कोई मतलब नहीं, जिसका मामला है वही झेले। किसी को द्रौपदी की चीख सुनाई नहीं देती। अब कोई कृष्ण नहीं बनना चाहता है। लुट रही है किसी की अस्मत तो लुटती रहे, समझेगी वह जो लुट रही है या उसका परिवार। समाज बस तमाशबीन बना रहता है-

‘‘द्रौपदी ‘दुशासनों’ को नोंचती ही रह गई,
और वे शौकीन से छीना-झपट देखा किए।” (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं. 67)।

“देह किसी ने बेची, कोई बच्चे बेचे
बदले में ठोकर ही देता शहर तुम्हारा।“ (तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, पृष्ठ सं. 69)।

दहेज भारतीय समाज का वह चित्र प्रस्तुत करता है जिसमें मानव के प्रति मानव की कोई संवेदना शेष नहीं रह गई है। अपनी बेटी,दूसरे की बेटी या बहू दहेज लाने का माध्यम मात्र। सर्वाधिक सोचनीय तो यह है कि एक स्त्री को दहेज के लिए प्रताड़ित करने वाली स्त्री ही होती है। कभी सास, ननद तो कभी जेठानी के रूप में दहेज के लिए स्त्री की प्रताड़क स्त्री ही होती है। ऐसी घटनाओं से प्रत्येक दिन अखबार के पृष्ठ भरे हुए रहते हैं, कहीं किसी स्त्री को जलाया जाता है तो कहीं किसी को काटा जाता है। इन प्रताड़िताओं का कोई धर्म नहीं होता, कोई जाति नहीं होती। चुडैल, कुल्टा, रंडी, छिनार और न जाने कितनी ही संज्ञाओं से अभिहीत किया जाता है स्त्रियों को। वस्तुतः स्त्री का कोई नाम, जाति है नहीं वह बस शिषिता ही कही जा सकता है। 

“औरतों की कलपती हुई आत्माएँ
नाचती हैं चुडैल बनकर,
****
हम चुडैलें हैं
हम औरतें थीं;
हमारी भी जात-बिरादरी थी,
****
बिस्तर पर भोगा,
बाजार में बेचा,
संड़कों पर नंगा घुमाया,
मगरमच्छों को खिलाया,
तंदूर में पकाया
तब तब हमने जाना :
हमारी कोई
जात-बिरादरी न थी;
हममें कोई
ऊँच-नीच न थी;
हम औरतें थीं,
सिर्फ औरतें!” (औरतें, ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 99, 100)।

अपात्र से विवाह भारतीय समाज में आम बात है। अपात्रता कई प्रकार की होती है; उनमें से एक है लड़की का विवाह उसकी उम्र से अधिक उम्र वाले व्यक्ति के साथ कर दिया जाना। दहेज न दे पाने की स्थिति में माता-पिता इस प्रकार का निर्णय लेने के लिए विवश होते हैं। धन की कमी युवती के जीवन का जंजाल बन जाती है और उसे अपने पिता, चाचा मौसा की उम्र के व्यक्ति की सहचरी बनना पड़ता है। एक अन्य कारुणिक स्थिति यह है कि स्त्री पुरुष के प्रेम के लिए अपने माता-पिता के परिवार ही नहीं सामाजिक-धार्मिक प्रतिबंधों के प्रति भी विद्रोह से पीछे नहीं हटाती लेकिन उस समय उसका मोह भंग होना स्वाभाविक है जब वह कल तक के प्रेमी को आज पति बनते ही हिजाब और नकाब के कट्टर समर्थक उसी पुरुष के रूप में बदलते देखती है जिसके प्रतिनिधि जन्म से ही उसे स्त्री होने का दंड देते आए हैं. मजहब की ओटसे प्रकट होते इस स्त्रीविरोधी पुरुष-चरित्र का सामना होते ही प्रेमिका से गुलाम बनी हुई स्त्री का हृदय चीखकर कह उठता है -

‘‘आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी,
तुम हिजाब कहकर
मेरे ऊपर कफन डाल रहे थे.
तुम्हारी आँखों में देखा मैंने झाँककर -
ये तो मेरे पिता की आँखें हैं!
मैं देखती रह गई;
तुमने तो मुझे जिंदा कब्र में गाड़ दिया!“(इतिहासहंता मैं, देहरी, पृष्ठ सं. 16)।

कानून के रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं। यह पंरपरा भी प्राचीन है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा, बादशाहों के सिपाही जनता पर,स्त्रियों पर अत्याचार करते थे तो आधुनिक युग की पुलिस भी इसी परंपरा का बखूबी निर्वहन कर रही है। आए दिन पुलिस द्वारा स्त्रियों पर किए जा रहे अत्याचारों, कुकृत्यों के किस्से मीडिया के विभिन्न माध्यमों से सुनने को मिलते ही रहते हैं। कानून के इन्हीं पहरेदारों ने कभी किसी अबला को फूलन बनने पर मजबूर किया तो कभी किसी को जिस्म बेचने वाली। आम जनता की दृष्टि में पुलिस की छवि इतनी खराब हो चुकी है कि स्त्री अपने साथ हुए बलात्कार को छुपाकर चुप रह जाना हितकर समझती है क्योंकि उसके मन में यह बात गहरे तक बैठ चुकी है कि उसे वहाँ न्याय तो मिलेगा ही नहीं बल्कि उसकी लुटी हुई अस्मत का न जाने कितने बार किस-किस तरह से पुनः बलात्कार होगा-

‘‘नागफनियाँ हैं सिपाही खींचे लें आंचल,
लाजवंती आज डरती मेह बरसो रे।‘‘ (तेवरी, तेवरी प्रकाशन, खतौली, 1982, पृष्ठ सं. 76)।

समाज के तथाकथित ठेकेदार स्त्री उद्द्धार की लंबी चैड़ी डींगे मारते हैं। मंच पर, मीडिया के समक्ष स्त्री को पवित्रता की मूर्ति बताते हुए कितनी उपधियों से विभूषित कर देते हैं परंतु वहाँ कहा गया वहीं पर समाप्त। वास्तविकता से उसका कोई लेना देना नहीं होता, बल्कि सभाओं में मंचों से जिन स्त्रियों को वे संबोधित कर रहे होते हैं उन्हीं में से उनकी नजरें तलाश रही होती हैं एक खूबसूरत एवं मनमोहक देह। सदा ताक में रहते हैं कि न जाने उनमें से कौन सी सुंदर देहवान उनकी नजरों में समा जाए और उसके बाद क्या होता है ये कहने की आवश्यकता नहीं है। राजी से मानी तो मानी नहीं उठवा ली जाएगी वह सुंदर देह। अगले दिन कहीं किसी बोरे, बक्से या बैग में मृत सुंदर देह पड़ी सड़ रही होती है अपनी सुंदरता को कोसते हुए। कहीं किसी अस्पताल में तेजाब से जली हुई देह मुक्ति के लिए तड़प रही होती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सब कुछ देह से ही प्रारंभ होता है स्त्री के लिए और उसी देह पर समाप्त। डॉ. ऋषभ की कविता ‘देह की दहलीज’ ऐसा ही कुछ अभिव्यंजित करती है -

‘‘देह की दहलीज पर क्यों
साधनाएँ टूटती हैं?
क्यों ऋचाएँ वेद की भी
वासना में डूबती हैं?
****
भोग के आगे हमेशा
मूल्य घुटने टेक देते।” (देह की दहलीज, सूँ साँ माणस गंध, पृष्ठ सं.116)।

ऐसा नहीं है स्त्रियाँ ऐसे ठगियों की नीयत को पहचानती नहीं हैं, अब वे भी सतर्क हो गई हैं और कहती हैं –

‘‘सुनो, सुनो,
अवधूतो! सुनो,
साधुओ! सुनो,
कबीर ने आज फिर
एक अचंभा देखा है
आज फिर पानी में आग लगी है
आज फिर चींटी पहाड़ चढ़ रही है
नौ मन काजर लाय,
हाथी मार बगली में दीन्हें
ऊँट लिए लटकाय!
नहीं समझे?
अरे, देखते नहीं अकल के अंधो!
औरतों की वकालत के लिए
मर्द निकले हैं,
कुर्ते-पाजामे-धोती-टोपी वाले मर्द!
वे उन्हें उनके हक
दिलवाकर ही रहेंगे।‘‘( औरतें, ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 98)।

समाज में नारी शोषण और प्रताड़ना का प्रतीक बनी हुई है। शोषक उसके कोमल मन और प्रेम को दबाकर उसे नाना प्रकार से दबाए रखते हुए उपेक्षित करता हैं। पंरतु प्रत्येक पुरुष के जीवन में ऐसा भी क्षण आता है ज वह यह महसूस करने के लिए विवश हो जाता है कि स्त्री के प्रेम और समर्पण को न समझ उसने भारी भूल की और जो प्रेम उसे बहुत आसानी से मिल रहा था उसे वह अपने ही हाथों गँवा बैठा है। परंतु बहुत देर हो चुकी होती है-

‘‘उस दिन मैंने फूल को छुआ
सहलाया और सूँघा,
हर दिन की तरह
उसकी पंखुडि़यों को नहीं नोंचा।
उस दिन पहली बार मैंने सोचा
फूल को कैसा लगता होगा
जब हम नोंचते हैं
उसकी एक-एक पंखुड़ी।
तब मैंने फूल को
फिर छुआ
फिर सहलाया
फिर सूँघा....
और मुझे लगा
हवाएँ महक उठीं
प्यार की खुशबू से।‘‘ (प्यार, प्रेम बना रहे, अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली 2012, पृष्ठ सं.14)।

पुरुष स्त्री के साथ जीवन निर्वहन करता है और हमेशा ही उसका प्यार पाना चाहता है। कई कारणों से वह बहुत बार अपमान भी कर बैठता है फिर भी स्त्री अपने स्नेह का सागर उस पर उड़ेलती रहती है अपने आहत मन की वेदना को हृदय में छुपाए हुए। वह अपने चेहरे पर पीड़ा के भाव को आने नहीं देना चाहती है परंतु प्रकृति तो प्रकृति है हर क्रिया की प्रतिक्रिया देती ही है और एक दिन पुरुष को दिखाई दे जाती हैं उसके चेहरे की दर्द भरी झुर्रियाँ तब उसे अपनी भूल का अहसास होता है। यह और बात है कि अधिकांश पुरुष अपने दंभ के कारण उसका इजहार स्त्री के समक्ष नहीं करते हैं परंतु अहसास होता अवश्य है और उसका हृदय कह उठता है-

‘‘बहुत छूता था तुम्हें
मैं
पहले
और सोचता था
तुम पुलकित हो रहे होगे
पर उस दिन
तुम्हारे रोश की रोशनी में
दिखाई दे गए मुझे
तुम्हारी त्वचा पर पड़े हुए
असंख्य नीले निशान
तो क्या इतने दिनों
मैं
तुम्हारी त्वचा छूता रहा
तुम्हें एक बार भी नहीं छू सका।‘‘ (स्पर्श, प्रेम बना रहे, अकादमिक प्रतिभा, पृष्ठ सं. 17)।

प्रेमी को प्रेम का इजहार प्रियतमा के समक्ष यथासमय कर देना चाहिए। स्त्री अपने प्रिय के मुँह से प्रेमवाक्य सुनने के लिए सदा आतुर रहती है और जब ऐसा नहीं होता है तो वह अंदर अंदर की कुम्हला जाती है। धीरे-धीरे किसी बेल की तरह वह मुरझाते हुए अपनी लीला समाप्त कर लेती है। जब प्रियतमा दूर चली जाती है तब प्रियतम के मन में टीस उठती है, उसकी कमी खलती है तो वह सोचता है काश मैंने इजहार कर दिया होता -
‘‘हम कितने बरस साथ रहे
एक दूसरे की बोली पहचानते हुए भी चुपचाप रहे
आज जब खो गई है मेरी जुबान
****
छटपटा रहा हूँ मैं कुछ कहने को।‘‘(पछतावा, सूँ साँ माणस गंध, श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद, पृष्ठ सं.14)।
बूढ़े हो चुके माता-पिता उम्र भर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर बच्चों को पालते हैं उन्हें दुनिया में जीने लायक बनाते हैं और इतनी आशा करते हैं कि जब उम्र होने पर उनके शरीर की ऊर्जा बहुत कम रह जाएगी तब उनकी देखभाल करेंगे परंतु आज की युवा पीढ़ी द्वारा माता-पिता का तिरस्कार आम बात है। औलाद बहुत आसानी से भूल जाती है अपने माता-पिता के बलिदानों को। वृद्ध स्त्रियों की कोख उस दिन अवश्य रोती है जिस दिन उसके दो बेटे दो वक्त की रोटी के लिए उसका बँटवारा करने के लिए झगड़ते हैं –

‘‘वक्त बदल गया।
कलेजे के टुकड़ों ने
कलेजे के टुकड़े कर दिए।
जमीन का तो बँटवारा किया ही,
माँ भी बाँट ली!
जमीन के लिए लड़े दोनों
- अपने-अपने पास रखने को,
माँ के लिए लड़े दोनों
- एक दूसरे के मत्थे मढ़ने को!
बलजोर ने बलजोरी से लगवा लिया अँगूठा
तो माँ उसके काम की न रही;
बलजीत के भी तो किसी काम की न रही!
दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए,
मैं बाहर खड़ी तप रही हूँ भरी दुपहरी;
दो जवान बेटों की माँ!
जीवन भर रोटी थेपती आई।
आज भी जिसका चूल्हा झोंकूँ,
रोटी दे दे.....शायद!‘‘ (अम्मा, गरज पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी, देहरी, पृष्ठ सं. 24-25)।

स्त्री को अधिकांशतः अबला ही समझा जाता रहा है। उसके संकोची स्वभाव को उसकी कमजोरी समझा जाता है पंरतु जिस दिन वह अपना संकोच त्याग देती है उस दिन पुरुष संकोच में घिर जाता है। यही प्रतिबिंबित करती हैं अग्रलिखित पंक्तियाँ -

‘‘आज अभी तो ऐसा दीखा,
जबरन ओढ़ी केंचुल कोई
तुमने स्वयं नोंच डाली है,
सारी कोमलता को अपनी
खुली हवा में खोल दिया है,
भला हवाओं से क्या डरना
झंझाओं से शक्ति मिलेगी -
दीपक का विश्वास नया यह
शब्द-शब्द में दीपित दीखा।‘‘ (अवाक्, प्रेम बना रहे, पृष्ठ सं. 19)।

एक समय था जब स्त्री स्वयं को केवल भोग्या ही मान बैठी थी। उसे बचपन से ही किसी न किसी रूप में भोग्या बनने के संस्कार दिए जाते थे और वह स्वयं को मानसिक एवं शारीरिक रूप से इसी के लिए तैयार करती थी। परंतु उसका अंतर्मन प्रेम के बदले प्रेम पाने के लिए तरसता रहता था और उसकी यह अभिलाषा जीवन भर चिंता के रूप में चिता के साथ दफन हो जाती थी। उसका मन रोता था –

‘‘मेरा अंग अंग रोता रहा
एक स्पर्श के लिए
और तुम
रौंदते रहे मुझे
मिट्टी समझकर।‘‘ (मर्दिता, देहरी, पृष्ठ सं. 35)।

पर आज की आधुनिक स्त्री अपने आप को सिर्फ भोग्या के रूप में उपयोग में लाए जाते हुए नहीं देखना चाहती है। वह भी प्रेम,समर्पण और निष्ठा चाहती है और उसे जब वह नहीं मिलता है तो कहती है –

‘‘तुमने मुझे नहीं
मेरी देह को चाहा
पर मैं देह होकर भी
देह भर नहीं थी।“ (लाज न आवत आपको, देहरी, पृष्ठ सं.38)।

स्त्री को अपने बंधनों में रखना पुरुष वर्ग की चिरप्राचीन आदत है और जब कोई स्त्री उसके बंधनों को न माने तो उसे पुरुष न जाने कितने ही नाम दे डालता है पर आज की स्त्री ने पुरुष के दंभ पर चोट करना सीख लिया है और कहती है जब उसकी किसी को परवाह नहीं तो उसे भी किसी की परवाह नहीं। वह स्पष्ट घोषणा करते हुए कहती है –

‘‘हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ।
उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा की उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पलट दिया/,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!‘‘( स्वेच्छाचार, देहरी, पृष्ठ सं. 41)।

आज की स्त्री अन्याय को देखकर या सहकर चुप बैठने वाली नहीं है। वह उसके विरुद्ध आवाज उठाने लगी है –

‘‘बहुत दिन
सहा मैंने,
सुनती रही चुपचाप,
झेलती रही,
मारकाट सारी,
पर तुम तो उतारू हो गए,
मेरी पहचान मिटाने पर;
चिल्लाओ मत,
बहरी नहीं हूँ मैं;
और आज से
गूँगी भी नहीं।‘‘ (बहरापन, सूँ साँ माणस गंध, पृष्ठ सं. 103)।

आज की युवती उड़ना चाहती है। अपने सपनों को साकार करना चहती है। इसलिए वह माँग करती है कि -

‘‘मैंने किताबे माँगी
मुझे चूल्हा मिला,
मैंने दोस्त माँगा
मुझे दूल्हा मिला।
मैंने सपने माँगे
मुझे प्रतिबंध मिले,
मैंने संबंध माँगे,
मुझे अनुबंध मिले।
कल मैंने धरती माँगी थी
मुझे समाधि मिली थी,
आज मैं आकाश माँगती हूँ
मुझे पंख दोगे?‘‘ (मुझे पंख दोगे?, देहरी, पृष्ठ सं. 19)।

स्त्री के प्रति समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा, उसकी गरिमा, अस्मिता और महत्व को समझते हुए आने वाली पीढ़ियों के संजोना होगा। पुरुष को खुद को हरा कर उसे जिताना होगा, क्योंकि –

‘‘औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें!
औरत के जीतने का अर्थ है
संस्कृति को जीतना
सभ्यता को जीतना;
औरत को हराने का अर्थ है
मनुष्यता को हराना;
औरत को कुचलने का अर्थ है
कुचलना देवत्व की संभावनाओं को।‘‘ ( औरतें औरतें नहीं हैं, देहरी, पृष्ठ सं. 93)।

निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि ऋषभदेव शर्मा ने अपनी काव्यकृतियों में जहाँ समाज की अन्य परिस्थितियों को उकेरा है वहीं स्त्री विमर्श से संबंधित बिंदुओं पर भी बहुत तीखी अभिव्यक्तियाँ की हैं। उनका ‘देहरी‘ काव्य संग्रह तो स्त्रियों को ही समर्पित है। इस काव्य संग्रह में उन्होंने स्त्रियों से संबंधित प्राचीन संदर्भों से लेकर उत्तरआधुनिक चेतना तक के सभी आयामों का सघनता के साथ प्रस्तुत किया है। उनका यह प्रयास अन्य पुरुष लेखकों, कवियों के लिए अनुकरणीय है। जिस संवेदनात्मक ढंग से उन्होंने स्त्री प्रश्नों को अपनी कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है उससे लगता है कि वे स्त्रियों से संबंधित पहलूओं पर पूर्ण मनोयोग से न सिर्फ चिंतन करते हैं बल्कि स्त्रियों के चहुँमुखी विकास एवं उन्नयन के भी प्रबल समर्थक हैं।


संदर्भ:-
1. डॉ. नगेंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, 2003
2. मलिक मुम्मद जायसी, मानसरोदक खंड, पद्मावत
3. महादेवी वर्मा, शृंखला की कडि़याँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2010
4. ऋषभदेव शर्मा, तेवरी, तेवरी प्रकाशन, खतौली, 1982
5. ऋषभदेव शर्मा, तरकश, तेवरी प्रकाशन, खतौली, 1996
6. ऋषभदेव शर्मा, ताकि सनद रहे, तेवरी प्रकाशन, हैदराबाद, 2002
7. ऋषभदेव शर्मा, देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ), लेखनी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011
8. ऋषभदेव शर्मा, प्रेम बना रहे, अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली, 2012
9. ऋषभदेव शर्मा, सूँ साँ माणस गंध, श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद, 2013


- सहायक प्रोफेसर (हिंदी)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
जलेसर, एटा, उत्तर प्रदेश
मोबाइल - 07500573935

ईमेल-vickysingh4675@gmail.com



सोमवार, 20 अगस्त 2012

Parampara .. Tradition (परंपरा)


Parampara .. Tradition
( 'परंपरा' का अंग्रेज़ी अनुवाद ) 
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * अंग्रेज़ी अनुवाद - एलिजाबेथ कुरियन 'मोना'


They are Earth- bear everything, remain silent
They are cows – provide milk, give calves too,
For their sake, we wage wars,
Then auction them at the crossroads:
We are not ashamed of this
This  is our tradition,
Our time honored tradition.

Since time immemorial,
They followed us
To suffer, put up with exile
To lead life in anonymity
And bear every curse;
Sometimes becoming Janaki,
Sometimes Draupadi, sometimes Shaivya ,
After all it is their duty.

And our duty?
What is our duty?
Do we have a duty?
  
When they are heavy with child,
We keep abandoning them in forests,
At the mercy of the five elements,
While we climb the stairs to heaven,
Holding  dog’s chain in our hands ,
Leaving them to melt in ice, part by part;
And when they bring the corpses of our children
Draped in half torn sarees,
We, as the cemetery’s custodians
Extracted full tax from them claiming
Also  the portion of their sarees remaining.

And we are not in the least ashamed
We have even auctioned even our queens
In the crossroads of Benaras
In the garb of the honest Harishchandra .
We have sold many princess Chandanbalas of Champa
In the market places of Kaushambi
In the role of the rich lord nagarseth.

At no time, either at a sale or an auction
Did anyone raise any objection;
No throne shook,
No authority spoke up
Nor a question raised in any  Parliament ;
Then why are you kicking up a row now?
We have not done anything new
We have merely auctioned a few girls,
Some women (some land, some cows)
In the markets of Eluru
अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2011/  INR 250/=
आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.
In the shops of villages in Andhra.

What’s new in this?
Why do you make so much noise?
Why raise a questioning voice?
We are not ashamed for this,
This is our tradition,
Our honored tradition.


परंपरा

वे पृथ्वी हैं-
         सब सहती हैं
         चुप रहती हैं,
वे गाय हैं-
         दूध देती हैं
         बछड़े भी देती हैं,
हम युद्ध करते हैं
उनकी खातिर
और फिर
लगाते हैं चौराहों पर
उनकी बोली।
         हम इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यह तो हमारी परंपरा है-
                          गौरवशाली परंपरा!

वे सदा से
चलती आई हैं
         हमारे साथ
झेलने के लिए
हर देश-निकाला,
हर एक अज्ञातवास
और हर एक अभिशाप-
         कभी जानकी बनकर,
         कभी द्रौपदी बनकर
         तो कभी शैव्या बनकर।
आखिर यही तो
         उनका धर्म है न !

और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या है हमारा धर्म???

छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें
बियाबान में
पंचतत्वों के हवाले,
         गर्भवती होने पर।
चढ़े चले जाते हैं हम
कुत्तों की ज़ंजीर थामे
स्वर्ग के सोपान पर,
छोड़कर उनके एक एक अंग को
         बर्फ में गलता हुआ।
और जब वे आती हैं
आधी साडी़ में लपेटे हुए
हमारे अपने बच्चों की लाश को,
वसूलते रहे हैं हम
पूरा पूरा टैक्स
मसान के पहरेदार बनकर
बची खुची आधी साड़ी से।

और हम
         इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,
          आखिर यह हमारी परंपरा है-
                                 गौरवशाली परंपरा!

नीलाम किया है हमने
अपनी रानियों तक को
बनारस के चौराहों पर
         सत्यवादी हरिश्चंद्र बनकर।
बोली लगाई है हमने
चंपा की राजपुत्री चंदनबालाओं तक की
कौशांबी के बाज़ारों में
         धनपति नगरसेठ बनकर।
कभी.......
किसी नीलामी पर
किसी बोली पर
         किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ,
         कोई आसन नहीं डोला,
         कोई शासन नहीं बोला, 
         और न ही कभी
         एक भी सवाल उठा-
                   किसी संसद में।

फिर अब क्यों बवाल उठाते हो?

कुछ नया तो नहीं किया हमने ;
कुछ लड़कियों, कुछ औरतों को-
(कुछ ज़मीनों, कुछ गायों को)-
         नीलाम भर ही तो किया है
         एलूरु के बाज़ारों में,
         आंध्र के गाँवों की हाटों में।

इसमें नया क्या है?
क्यों बवाल मचाते हो??
क्यों सवाल उठाते हो???
         हम तो इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यही तो हमारी परंपरा है-
                           गौरवशाली परंपरा!
http://bit.ly/K5HUpx

('देहरी', पृष्ठ 77)

शनिवार, 11 अगस्त 2012

Many a name did they give me (कई नाम दिए उन्होंने मुझे)



Many a name did they give me 
'कई नाम दिए उन्होंने मुझे' का अंग्रेज़ी अनुवाद )    
              हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा   *  अंग्रेज़ी अनुवाद -  एलिजाबेथ कुरियन 'मोना'


They gave me a name – Mother
And secured for themselves many liberties
To till me like the earth
Then to abandon me.

They gave me a second name - Sister
And secured for  themselves the right
To seize my rights
Then to abandon me.

The third name was – Wife
They secured for themselves
A set of powers and dominations
To capture all I had
Then to abandon me .

The fourth name  - Daughter
They  secured for themselves
The steps to heaven , having done kanyadaan
Tying me to an alien stump, helpless.

One more name they gave me – Whore
And secured for themselves titles- 
Purifier, reformer and savior
And kept pushing me time and again
Into hell of their own lust.


 कई नाम दिए उन्होंने मुझे

 

उन्होंने मुझे
एक नाम दिया - माँ
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
बहुत सारी स्वतंत्रताएं
दुहने की ज़मीन की तरह मुझे 
और उपेक्षित छोड़ देने की.

 उन्होंने मुझे
दूसरा नाम दिया - बहन
और अपने लिए सुरक्षित कर लिए
बहुत सारे अधिकार
मेरा अधिकार हड़पने के
और उपेक्षित छोड़ देने के .

  उन्होंने मुझे
तीसरा नाम दिया - पत्नी
और अपने लिए सुरक्षित कर लिया
दुनिया भर का प्रभुत्व और वर्चस्व
मेरा सर्वस्व हरण करने को
और उपेक्षित छोड़ देने को. 

 उन्होंने मुझे
चौथा नाम दिया - बेटी
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
स्वर्ग की सीढियां , करके कन्यादान
बाँध कर पराये खूंटे पर अरक्षित मुझे. 

 उन्होंने मुझे
एक और नाम दिया - वेश्या
और आरक्षित कर ली अपने लिए
भूमिका पतितपावन , उद्धारक और मसीहा की
धकेलते रहने को बार बार मुझे
उनकी अपनी वासना के नरक में .......

('देहरी', पृष्ठ 31)

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

भगवती, पत्‍नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ (पत्नीं मनोरमां देहि)



भगवती, पत्नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ
('पत्नीं मनोरमां देहि' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  *  मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति



* व्यवस्था जरुरी थिक समाज के सुचारु संचालनकहेतु। ए॓हि हेतु
ओ ’घर’ आओर ’बाहर’ बँटवारा कयलनि

एकरा संगे-संगेबाँटि देलन्हि श्रम के।
जन्मना स्त्री होयबाक कारण, हमरा हिस्सा में ’घर’ आओर ’घर’ काज
आबि गेल।
ओ शै‌नेः शै‌नेः मालिक बनइत गेलाह आओर हम गुलाम।
हम चाहियोक अपन दायरा नहि बद‌इल सकलहूँ।
सेवा कयनाइ आब हमर भाग्य बनि चूकल छल।
 

* मालिक त मालिक होइत अछि।
गुलाम ओकरा लेल मेहनत आ उत्पादन करैत अछि।
हम औरत सब मिलक बुझि पर‌‍इत अछि जेना, अपन मेहनत आओर उत्पादन
मालिकक नाऊ क देल्हूँ।
घर बनयलहूँ हम- बसयलहूँ हम।
मालिक भ गेलाह ओ।
हमर मालिक त छलाह पहिलहि सँ, आब घरक मालिक सेहो भ गेलाह।
आओर त आओर हमर, धिया-पुता सेहो हमर नहि रहल।
उत्पादक स्‍त्री, उत्पादन स्‍त्रीक; उत्पाद मालिकक।
हमर परिश्रमक फल, हमर सृजनक फल- दुनु हमर नहि भेल।।
 

* देह सँ हम श्रम कयलहुँ आओर सृजन।
उत्पादन आओर पुनरुत्पादन- दुनु हमर मेहनत हमर भक हमर
नहि अछि।
नहि देह पर नहि घर-द्वार पर हमर अधिकार अछि।
अपना लेल, अपना शरीरक लेल, अपना घरक लेल, अपना
धिया-पुताक लेल- किछु फैसला करबाक अधिकार नहि अछि हमरा हाथ में।
सब फैसला कर लगलाह ओ- कहियो पिता ब‍इनक त कहियो
पति ब‍इनक।
ओ दिन सेहो आबि गेल जखन ओ फैसला लेब‍अ लगलाह,
स्‍त्री के जन्म लेबाक चाही वा नहि।
पुरुख विधाता बनि चुकल छल।
बुझि पर‍इत अछि विधाता केओ पुरुखे रहल हेताह- कखनो वा कहियो॥

* सब निर्णय हुनका हिस्सा में आबि गेल।
आओर हमरा हिस्सा में परल अनुकरण,अनुगमन,अनुपालन,अनुसरण।
बेशक ओ हमरा देवी बनाक पुजल‌इथ सेहो।
मुदा कतेक चलाकी सँ हमर अजादीक बंधक-पत्र पर दस्खत करवा लेलैथ।
भक्‍त बनि हमरा सामने अयलाह; आओर हाथ जोड़िक विनती कयलाह-
"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृतानुसारिणी/
तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम।"
हँ ! ओ हमरा पत्नी बना लेलाह-हमरा हुनकर आज्ञाक जरे-जरे
हुनकर मानसिक आ अप्रकट इच्छाक अनुसरण सेहो करअ परत।
अपन कुलीनता आ पवित्रताक बल पर, हुनका पाप‍अक दुर्गम
संसार सागर सँ बेड़ा पार सेहो लगावअ पड़त।
हम त साधन छी, हम माध्यम छी - मात्र हुनकर मुक्‍तिक लेल॥

* आओर हमर मुक्‍ति?

[हमर देहक मुक्‍ति, हमर मनक मुक्‍ति, हमर आत्माक मुक्‍ति ??
हमर व्यक्‍तिक मुक्‍ति, सामाजिक मुक्‍ति- आर्थिक मुक्‍ति आओर आध्‍यात्मिक मुक्‍ति ???
नहि हमर मुक्‍तिक कोई अर्थ नहि अछि -जखन तक हम परछाईं छी।
परछाईं कहियो मुक्‍त नहि हो‍इत अछि।
हम...परछाईं छी हम...चिरबद्ध परछाईं।
स्‍त्री नहि छी हम ?] 

पत्नीं मनोरमां देहि

* व्यवस्था ज़रूरी है समाज के सुचारू संचालन के लिए। इसलिए 
उन्होंने 'घर' और 'बाहर' का बंटवारा कर दिया।


इसी के साथ बंटवारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में 'घर' और 'घर का काम' आ गया।
वे धीरे-धीरे मालिक बन गए और मैं गुलाम।
मैं चाहकर भी अपना क्षेत्र नहीं बदल सकती थी।
सेवा करना ही अब मेरी नियति थी !


  • मालिक तो मालिक है।
गुलाम उसके लिए मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं।
हम औरतों ने भी अपनी मेहनत और अपना उत्पादन सब जैसे मालिक के नाम कर दिया।
घर बनाया हमने - बसाया हमने।
मालिक वे हो गए।
होते ही.
हमारे मालिक थे, तो हमारे घर के भी मालिक थे।
हमें बहलाना भी उन्हें खूब आता था।
वस्तुओं पर हमारे नाम अंकित कर दिए गए।
हम खुश।
पर सच तो यही था कि नाम भले हमारे लिखे गए हों, सब कुछ था मालिक का ही।
और तो और, हमारे बच्चे भी हमारे न थे।
उत्पादक स्त्री, उत्पादन स्त्री का; उत्पाद मालिक का।
हमारे श्रम का फल, हमारे सृजन का फल - दोनों ही हमारे न हुए.


  • देह से हमने श्रम भी किया और सृजन भी।
उत्पादन और पुनरुत्पादन - दोनों क्षमताएँ हमारी होकर भी हमारी न रहीं।
न देह और न घर - पर हमारा नियंत्रण रहा।
अपने बारे में, अपने शरीर के बारे में, अपने घर के बारे में, अपनी संतान के बारे में - कोई फैसला करने का हक हमारे पास नहीं रहा।
सारे फैसले हमारे लिए वे करने लगे - कभी पिता बनकर, तो कभी पति बनकर।
वह दिन भी आ गया जब स्त्री को जन्म लेना है या नहीं, यह भी वे ही तय करने लगे।
पुरूष विधाता बन गया।
शायद विधाता कोई पुरूष ही होगा - अगर कहीं हो, या कभी रहा हो।

  • सारे निर्णय उनके हिस्से में आए।
और मेरे हिस्से में आया अनुकरण, अनुगमन, अनुपालन, अनुसरण।
बेशक, उन्होंने मुझे देवी बनाकर पूजा भी।
पर कितनी चालाकी से मुझसे मेरी आजादी के बंधक-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए।
भक्त बनकर आए वे मेरे सामने; और हाथ जोड़कर याचना की -"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणी/तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम। "
हंह!उन्होंने मुझे पत्नी बना लिया - मुझे उनकी आज्ञाओं का ही नहीं, मानसिक और अप्रकट इच्छाओं का भी अनुसरण करना होगा,
अपनी कुलीनता औ पवित्रता के बल पर मैं उन्हें पापों के दुर्गम संसार सागर के पार ले जाऊं।
मैं तो साधन हूँ, माध्यम भर हूँ - उनकी मुक्ति के लिए।

  • और मेरी मुक्ति?

[मेरी देह की मुक्ति, मेरे मन की मुक्ति, मेरी आत्मा की मुक्ति??
मेरी वैयक्तिक मुक्ति, मेरी सामाजिक - आर्थिक मुक्ति, मेरी आध्यात्मिक मुक्ति???
नहीं, शायद मेरी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं - जब तक मैं छाया हूँ।
छाया कहीं कभी मुक्त होती है?
तो...छाया हूँ मैं...चिर बद्ध छाया?

स्त्री नहीं हूँ मैं?]

('देहरी', पृष्ठ 81)

हम छी मनमौजी (स्वेच्छाचार)



हम छी मनमौजी 
('स्वेच्छाचार' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  *  मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति   


 हँ, हम छी मनमौजी.

ओ हमरा हर में जोतअ चाहलैथ
हम जुआ गिरा देल्हूँ.
ओ हमरा पर सवारी लादअ चाहलैथ
हम हौदा उलइट देल्हूँ.
ओ हमर माथ रौंद चाहलैथ
हम कुंडली लपेटि पट‌इक देल्हूँ.
ओ हमरा जंजीर में बान्ह चाहलैथ
हम पग घूँघरु बान्हि सड़क पर आबि गेल्हूँ!

आब ओ हमरा सँ कर‍इत छथि घृणा,
हम छी महा ठगनी कह‍इत छथि,
हमर परछाईं तक सँ दूर भाग‍इत छथि,
बेचारा परछा‍ईं सँ भअ चूकल छथि आन्हर,
हिरण्मय आलोक कोना झेलताह।

हँ हम छी मनमौजी!

हम अपन गिरिधर सँ प्रीत कयलहूँ,
हुनका वरण कयलहूँ,
गल्ली गल्ली ढिंढोरा पीटलहूँ
जिनकर माथ पर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

हमर पियाअक सेज सूली पर,
अति मन भावन,
हम एकरा स्वयं चुन्लहूँ।



स्वेच्छाचार

                                                                                                                              हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.

उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया ,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!

अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!

हाँ,मैं हूँ स्वेच्छाचारी!

मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की-
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!

मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!

('देहरी', पृष्ठ 41)