ऋषभ की कविताएँ
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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010
मेरा पक्ष
मैंने प्रण किया था-
तुम्हारा साथ दूँगा
भूख के खिलाफ हर युद्ध में.
मैंने उठाई थी बंदूक-
बुर्ज पर टँगी तुम्हारी रोटी
उतार लाने को.
आज तुम्हारे हाथों में
खून की रोटी है
और तुम खेत में बारूद उगाने लगे हो
अनाज की जगह.
यार मेरे , इतना तो बता -
अब मैं किसे मारूँ!
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