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मंगलवार, 25 मार्च 2014
मंगलवार, 3 दिसंबर 2013
प्रेम बना रहे : मनोदशाओं की समग्र अभिव्यंजना - सुस्मिता घोष
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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प्रेम बना रहे : मनोदशाओं की समग्र अभिव्यंजना
हिंदी साहित्य जगत को समर्पित डॉ. ॠषभ देव शर्मा (1957) द्वारा रचित काव्य कृति ‘प्रेम बना रहे’ (2012) अनेक कारणों से प्रशंसनीय है। इस काव्य कृति में केवल प्रेम का चित्रण ही नहीं है बल्कि इसमें मन के भाव–अनुभावों, तर्क–वितर्क, धारणा–अवधारणाओं का भी चित्रण है। ऐसी भी मनोदशाओं का इसमें अंकन है कि जब कोई किसी से अत्यधिक प्रेम करता है तब उसे यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने प्रियतम को समझता है, प्रेमी मन अपने ही विचारों के जाल में उलझा रहता है, भावनाओं के आवेग में प्रियतम की भावनाओं को समझ नहीं पाता और अपने साथी को ही दुख दे बैठता है। तत्पश्चात अपने साथी को दुख में देखता है तब वह स्वयं ही पश्चात्ताप करता है। दूसरी ओर प्रेमी और प्रेमपात्र की एकप्राणता भी पूरी शिद्धत के साथ उभरकर आई दीखती है। ‘संगम’ कविता में मन के मिलन का अद्भुत वर्णन किया गया है –
घुल गया
तुम्हारे गौर वर्ण में
मेरे कंठ का सारा नीलापन
उतर गया
हमारे भीतर आकाश का विस्तार
और समा गया
समुद्र की गहराई में। (पृ सं 9)
प्रियतम अपनी प्रियतमा की तुलना नदी से करता है कि वह उद्दाम, चंचल, बहती, बिखरती जब समुद्र से मिलने के बाद शांत, शीतल और पूर्ण नज़र आती है। वह अपने प्रियतम को जितना समझने की कोशिश करता है, उसके अंदर झाँकने की कोशिश करता है, उतना ही वह अपने को अनजान पाता है। ‘अवाक’ शीर्षक में प्रेमी के विस्मय का अद्भुत चित्रण है –
मैं अवाक हो
सिर्फ ताकता रह जाता हूँ
कभी चित्र को
कभी चित्र में तुम दिखते हो
कभी चित्र तुममें दिखता है
आज अभी तो ऐसा दीखा
जबरन ओढी केचुल कोई
तुमने स्वयं नोंच डाली है। (पृ सं 18,19)
वहीं ‘प्रमाद’ कविता में प्रेमिका को पाने के लिए जतन करता प्रेमी है। प्रियतमा के प्रेम को अपनी मुट्ठी में बंद करना चाहता है परंतु उसका अभिमान टूट कर बिखर जाता है। अभिमान के टूटने पर उसे यह अहसास होता है कि प्रेम अधिकतर नहीं समर्पण है -
मिट्टी का मिथ्या अभिमान
तुम्हारी दिव्यता के प्रसाद को
समझ लिया था प्रेम। (पृ सं 22)
समर्पण व त्याग की परिभाषा से परे एक दूसरे के साथ जीवन काटते-काटते एक दूसरे का साथ ही मन को रास आने लगता है। एक जब अपनी उडान आकश में भरता है तो दूसरा उसकी हौसला अफज़ाई करता है। अपने सपनों का त्याग कर अपने साथी की सफलता में खुश होता है। ‘आकाश’ कविता में समर्पण का चित्रण बड़े ही सुंदर ढंग से किया गया है -
मानस के राजहंस ने
अपने सुनहरे पंख
साँप की केंचुल जैसे
छोड़ दिए
तुम्हारी झोली में
मेरे पंख
तुम्हें मिल ये - जैसे इनका होना
सार्थक हो गया।
मेरे पास
पंख नहीं हैं, न हों,
पर तुम तो हो-
*** कितना सुख है
इस अनुभूति में
कि-
तुम्हीं मेरे पंख हो
तुम्हीं मेरी उडान,
तुम्हीं मेरा आकाश,
और यह सारा आकाश
मेरी बाँहो में सिमटा है
मेरे होठों से चिपका है
मेरी आँखों में अँज गया है (पृ सं 33,34,35)
दोनों एक दूसरे के सपनों को जीते हैं। प्रेमी भी अपने सपनों को देकर अपने प्रिय को पा लिया है। यही दोनों उनका स्वाभिमान और विश्वास है। जीवन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना लेकर दोनों जीवन पथ पर चले थे। उसे पूरा करने के लिए किसी गलत तरिके का सहारा न लेंगे, इनका यह संकल्प था। ‘आग को जिंदा रखना’ कविता में संकल्प की प्रचेष्टा देखी जा सकती है -
आग को जिंदा रखना
ऐसा न हो
कि गीली सीली लकड़ियाँ
आग को धुएँ में तब्दील कर दें या फिर
फायर ब्रिगेड का हमला
यह सारी तपन पी जाए
याद रखना
आग को जिंदा रखना
एक विज्ञान है
जिसकी तकनीक
तुम्हारे हाथों में है। (पृ सं 37)
मनुष्यों का जीवन परिवर्तनशील है। इसके साथ मशीनों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। हाड मांस के शरीर के अंदर बसने वाला मन बड़ा ही चंचल होता है। जब दो मन एक साथ जीवन यापन करने का निश्चय करते हैं तो ऐसा कभी नहीं होता कि उनकी भावनाएँ आपस में न टकराएँ। ऐसा भी संभव नहीं कि एक कहे और दूसरा उसकी बात बिना शर्त मानता जाए। यदि ऐसा होता है तो वह साथी नहीं गुलाम होगा। जीवन साथी वही होते हैं जो एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें तथा एक दूसरे के दुख तकलीफ़ में साथ दें। दोनों के सुख-दुख एक ही हों।
कई बार ऐसा महसूस होता है कि जीवन एक अंधा कुआँ है जो किसी भी परिवर्तन से निर्विकार है। परंतु यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सच है? रचनाकार ने अपने शब्दों में जीवन के इस सत्य को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। यदि जीवन को एक अंधा कुआँ मान भी लें तो अंधे कुएँ की गहराई से आती प्रति ध्वनियाँ बिजली जैसी कौंधती हैं। बिजली के फूल की तरह चमकती हैं और रोशनी देती हैं जो जीवन को प्रकाशित करती है। सूरज ढलने का भ्रम देता है पर ढलता नहीं इसका एहसास हमें अंधेरे में ही होता है। ‘अंधा कुआँ’ शीर्षक में यह द्रष्टव्य है -
देखो।
अंधा कुआँ होना भी
कोई दुर्भाग्य नहीं
गहराई में से
आती हुई प्रतिध्वनियाँ
माध्यम बनती हैं
****
सूरज -
जो ढलने का
भ्रम देता है
पर कभी ढलता नहीं। (पृ सं 40 41)
‘गोपिका मैं’ शीर्षक में जीवन साथी के मन में एक दूसरे के प्रति गोपियों जैसा दीवानापन है। हर आहट अपने प्रेमी के आने का भ्रम देता है। इसमें प्रेम का आध्यात्मिक स्वरूप झलकता है। ‘वसीयत’ कविता में समर्पण के भाव को देखा जा सकता है। यहाँ प्रेमी स्वयं को ही ‘हव्य सामग्री‘ के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ यह द्रष्टव्य है-
सुनो
मैंने
अपने दोंनो हाथ
तुम्हारे नाम
वसीयत/
कर दिए हैं।
***
अगर तुम्हें
कभी ऊष्मा की ज़रूरत हो
तो
मेरे दोनों बेडौल हाथ
चूल्हे में झोंक देना
ये मैंने
तुम्हारे नाम
वसीयत
कर दिए हैं। (पृ सं.45, 46)
‘सौंदर्य’ शीर्षक कविता में कवि ने सौंदर्य व प्रयोजन के बीच सुंदर तालमेल बैठाया है। जीवन में सुंदरता ही सब कुछ नहीं होती बल्कि उपयोगिता का महत्त्व होता है। किसी चीज की सार्थकता ही उसकी सुंदरता होती है। इन पंक्तियों में यह स्पष्ट है -
प्रश्न
सुडौल और बेडौल
होने का नहीं
जुझारू और
सक्रिय होने का है
सुंदरता से आगे
उपयोगिता का है
ऊर्जस्विता का है। (पृ सं 47)
‘प्रिय चारुशीले’ शीर्षक कविता में प्रेमी की तुलना ऐसे भ्रमर से की है जो वह जितनी बार अपने प्रेम को प्रेयसी के समक्ष प्रस्तुत करता है उतनी बार उसे प्रेयसी से उपेक्षा ही प्राप्त होती है। वह अपराधी की तरह प्रत्येक दंड के लिए प्रस्तुत रहता है ताकि अपनी प्रियतमा की रुष्टता को कम कर सके। इन पंक्तियों में इन भावों का चित्रण मिलता है-
प्रिये चारुशीले।
तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने नतमस्तक है
आज यह भी हो जाने दो
ठुकराओ, राधा ठकुरानी। (पृ सं 59)
‘रोपता हूँ बीज तुम में’ शीर्षक कविता में दोनों जीवन के प्रति आशावादी हैं। वे इस नश्वर जीवन में अपने प्रेम को अमर बनाने को व्याकुल हैं तथा एक नवीन सृष्टि की कामना करते हुए कल्पवृक्ष लगाना चाहते हैं तथा ऐसी संतति को जन्म देना चाहते हैं जो सृष्टि के अंत का कारण न बने बल्कि सृष्टि को पुष्ट करे और प्रलय को रोके।
इन काव्य शृंखलाओं में नायिका का रूठना–मनाना, घृणा-प्रेम, तिरस्कार-स्वीकार भावों का वर्णन सुंदर ढंग से वर्णन किया गया है। नायिका गोपन की अपनी तमाम चेष्टाओं के बाद भी अपने प्रेम को छिपा नहीं पाती है। प्रेमी को पूर्ण समर्पण का अहसास करा जाती है। प्रेमी भी उसके प्रेम में सराबोर हो जाता है। ‘निवेदन’, ‘मन किसी का’, ‘मत गिराओ बिजलियाँ’, ‘तृप्ति की अप्सरा’ और ‘आज मेरा गीत’ में परिपक्व प्रेम भावना को अनुभव किया जा सकता है।
‘जितना प्यार दिया है तुमने’ शीर्षक गीत में कवि ने प्रेमी के तृप्त मन को दर्शाया है। प्रेमी कृतज्ञता बोध, आभार व्यक्त करते हुए कहता है कि -
जो आभार किया है तुमने मैं तो इसके योग्य नहीं था
जो अधिकार दिया है तुमने मैं तो इसके योग्य नहीं था (पृ सं 101)
‘जीवन समर में’ शीर्षक गजल में दर्शित है कि जीवन के संधर्ष में जब सभी मित्र शत्रु बन जाते है, तब भी जीवन संगिनी साथ नहीं छोडती। वह ढाल बनकर न केवल रक्षा करती है बल्कि जीवन में फिर से उठ खड़े होकर आगे बढ़ने की हिम्मत भी देती है –
जीवन – समर में जब गिरा मित्रों के घात से
हर घाव को सहला गए बस तेरे हाथ थे। (पृसं117)
सारांशत: इस काव्य कृति में कवि ने प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है्। पुरुषप्रधान समाज में जहाँ स्त्री व स्त्री की भावना पुरुषों की जागीर है, वहाँ इस कवि ने स्त्री की भावनाओं को उचित मान दिया है। विषय के अनुसार भाव, भाषा, विचार, उपमेय, उपमान और लयात्मकता की दृष्टि एक श्रेष्ठ कृति है - हिंदी काव्य जगत को एक सुंदर उपहार है – ‘प्रेम बना रहे’!
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
प्रिये चारुशीले (प्रिये चारुशीले)
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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('प्रिये चारुशीले' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा
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तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
*
तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
ప్రియే చారు శీలే
(ప్రియే చారుశీలే ముంచ మయి మానమనిదానమ్
సపది మదనానలో దహతి మమ మానసమ్
దేహి ముఖకమల మధుపానమ్ !
– గీతగోవింద, దశమ సర్గ)
ప్రియే చారుశీలే
జనాలంత నేనొక - భ్రమరాన్నంటున్నారు
నీక్కూడా ఆ మాటే -నిక్కమై తోచింది
నా మమతల మధురిమ-ఎంతగ నీవేరిగినా
త్యజించావు నన్ను నీవు - తీవరించి తురితంగా
నీ చెంతకు చేరాలని - నేనెంతగానొ తపించాను
చేతి సంజ్ఞ తొడనే - నను చేరకుండ చేశావు
నిను తాకాలని ఎంతెంతో - తహతహలాడా నేను
చూపువేలు చూపించి - చలించమంటు చండికవై
తరిమి తరిమి పంపావు -దేశాన్నుంచే నన్ను
వెలుగుల రారాజి ప్పుడు -వెనుతిరిగాడింక చూడు
నేనగ్గిలోన మగ్గుతూ -రోజంతా నిలబడ్డా
నీ కను సైగ ల కోసమనే - నిరీక్షిస్తు నిల్చున్నా
ఐనా నీవొక పరైన - పిలువలేదు నన్ను
మండే కోపంతోటి -రోజంతా ఎండావు
నీ కోపపు దావాగ్ని-దహిస్తోంది చూడు నిన్ను
వెలుగుల రారాజింకా -వెళ్లిపోయాడుకదా !
కినుకల తాపాన్నింకా - తీరుచుకోరాదా
క్రోధపు జ్వాల లోనీవు -జ్వలించిపోతుంటే
దగ్ధమైపోతోందా - మానసపు సరోవరం
ద్రవిస్తోంది చూడదిగో -హిమ శ్రుంగపు సోయగం
మదనునివల్లే కాలా -మంచుకొండ కరిగించుట
నీ రోసపు రశ్మికది - అవలీలే అయ్యింది
నీ ముఖ పద్మం చిందే - మాధుర్యాపు దానం తో
నీ ఆగ్రహ అనలాన్ని- అమృతంగ మలచుకో
నా హృదయపు రారాజ్ఞీ -ప్రియే చారు శీలే !
విను కొంచెం నా మాటిటు
నిర్దోషిని నేనంటూ -నిగదించను నేను
దోషిని నేనుకుంటే -నిక్కముగా నే దోషినే
దండన పొందాలి నేను -దండించే హక్కు నీది
రమణీ ఓ రాజేశీ !
నరులను భక్షించే - ఒక నిట్రిల్లిన సింహాన్ని
నాపై కెగబ్రాకుటకు - నింకారగ నీదేశించు
నుడితేలిన నఖాలతో -నున్నని నా వక్ష తలం
ఆక్రమించి చీల్చి చీల్చి - చిందరవందర చెయనీ
శరాలంటి దంతాలతో - బహువులని జఘనాలని
చీల్చి చీల్చి చండాడి - గుచ్చి గుచ్చి పొడవనీ
బహుశా ఈ లాగునైన - నీ ప్రతిఘాతం తీరితే
నా వడలెల్లా నిండిన -నీ భ్రమపూరిత కళంకాలు
కరిగి పోతాఏమోనని - నే కలలు కంటున్నాను
నన్ను నమ్ము నిక్కమిదే , నా ప్రియే చారు శీలే !
ఆ వసంత రాతిరిలో - నువు మినహా ఇంకెవరూ
నా దరిదాపుల్లో కూడా -చేరలేదు ,దూరలేదు
నీవు కాక ఆన్యులెవరు-నా నీడనైన చేరలేరు
నా లోపల ,నా వెలుపల -నాలుదిశలా నన్నంతా
అణువణువును ఆక్రమించి -అక్కున చేరే అందం
నీవుకాక ఇంకెవరే- ముద్దుల నా రాధా
ఇంకొక్క నిముషమైనా -నేనోర్వలేను నీ రోషం
కారణమే లేకుండా పుట్టిన ఆ ద్వేషం
రమణీ నా హృదయ రాజ్ఞి !-ప్రియే చారు శీలే
కల్లా కపటం ఎరుగని - కులుకుల కుసుమం నువ్వు
ఎరగవు నీవెన్నడూ- నా ఎదలో నీ స్థానం
నా శృంగారపు దేవేరివి - నీవే నా రాధికా !
మాటలిన్ని చెప్పనెల - నా సుందర మల్లికా
ఒక ముక్కలొ చెబుతున్నా -నా జీవ ధార నీవని
తెలుసా నీకొరకె నేను -ఎన్ని జన్మలెత్తానో
సుడులుగొన్న సముద్రాన్ని -ఎంతెంతగ చిలికానో
వెతుకులాడుతూ నిన్ను -ఎచెటేచ టోతిరిగాను
కాల గమన ప్రవాహాన -ఆసి నుండి,అనంతానికి
అందరిపాలిట నేను -దారిద్ర్యన్నైతే ,
వారందరికీ నీవు -శిరులోలికే శ్రీ లక్ష్మివి
దుర్లభ మరకత మణీ-ప్రియే చారుశీలే
నీ అందపు ఆగ్రహం -ప్రేమకదే సంకేతం
నీహృదిలో నా హృదయం -మమేకమైపోయింది
నా శృంగారపు దేవేరివి నీవే నా రాధికా
ఓ మమతల మరకతమా -నా జీవధరవీవు
నీ మమతల కమ్మతనం -విదితమేను నాకు
నా ప్రేమ మాధుర్యం -ఎరిగింది కూడా నీవే
గుప్పెడంత నీ గుండెను -ఇప్పుడింక తెరువుమా
వెలుగుల రారాజు కూడా -వెనుతిరిగాడిక చూడు
సంగమించి పోనీ -ఇక నా హృది లొ నీ హృదయం
నాఆ హృదయపు సామ్రాజ్ఞీ-ప్రియే చారు శీలే
నీలోత్పలాలు బోలు -నీ కాటుక కన్నులు
కసి తో నిలువెల్ల నిండి -రక్తోత్పలలై నాయి
మానస కొలనెండిపోయి- నిస్పృహమైపో తోంది
పువ్వుల బాణం కాదు -మాధవుడ్ని జయించింది
వాస్తవమాలోచిస్తే -నీవేనే రాధికా
నీ చూపులొ వాడి ఐన -బాణాలున్నాయి
అడ్డగించ వీలు కాని -ప్రేమ పాశమూ వుంది
నీ వాడిఐన బాణాలు -గాయాపరచాయి నన్ను
ప్రేమ పాశాలెమో-నీ బందీ గా చేశాయి
నా హృదయపు దేవేరీ-ప్రియే చారుశీలే
అలుకలింకా మాని నువ్వు -చిరునగవులు చిందించు
నీ ఎదుటనే ఉన్నాడు -అందికలో నీ దోషి
నువు కోరే కృష్ణుడు -రాధికా లోలుడు
నీ ఆజ్ఞలు పాటించును -గాయ పడ్డ నీ ఖైదీ
ఆగ్రహాలు ఇప్పుడింక - తిరుగు ముఖం పట్టించు
అనుమానాలన్నీ ఇక -అందలానికంపేసెయ్
మెడలోనీ హారాన్ని -ఇటూ అటూ కదలనీ
నడుముకున్న మువ్వలన్ని - రవళించనియ్యి కొంచెంగా
నీ సుమ సదృశ పాదం - కొంచెం నావైపు చాపు
చిరకాలంగా ఒక కోరిక -కలవరపెడుతోంది నన్ను
సొగసుల నీ పదానికి -ఎర్రని పారాణి దిద్ది
అబ్బుపడి తబ్బిబ్బయ్-కరిగిపోవాలన్న
నా కామితమీడేర్చవా -యీరోజే త్వరితంగా
నా హృదయపు దేవేరీ !ప్రియే చారు శీలే !
నీ దోషి నీ ఎదుటే -నిల్చుని ఉన్నాడు
ఈరోజీ పనికూడా -చెయ్యవే నా చలియా
తన్ను నన్ను తమకం తో-రమ్యా నా రాధికా
నా శిరసున తదేకంగ -తాండవమే చెయ్యి
నీ పాదపు పారాణి తడి-నన్ను చేయునశోకునిగ
అప్పుడు నా శిరస్సు పైన -వికాశించును చూడు
నీ ప్రేమలో తడసిన -సహస్రదళపద్మాలు
నా హృదయపు సామ్రాజ్ఞీ- ప్రియే చారు శీలే
నీ మమతల అమృతము -అద్భుతమూ ,అఖండమ్
దహిస్తుంది దాని శక్తి -నాలోపలి వాసనలు
నవ పల్లవాల మించిన -నీ కోమల పాదాల చెంత
ఉంచా నా శిరస్సును -ప్రేమ మీర నా ప్రియా!
శాంతించిందిప్పుడు -దారుణ దావనలమ్
వెలుగుల రారాజిప్పుడు వెనుతిరిగి పోయాడు
కురిపించవె నా చెలియా నీ -చిరునగవుల కౌముదీ !!
प्रिये चारुशीले
(प्रिये चारुशीले मुंच मयि मानमनिदानम्
सपदि मदनानलो दहति मम मानसम्
देहि मुखकमल मधुपानम् !
– गीतगोविंद, दशम सर्ग)
प्रिये चारुशीले
जनालंत नेनॊक - भ्रमरान्नंटुन्नारु
नीक्कूडा आ माटे -निक्कमै तोचिंदि
ना ममतल मधुरिम-ऎंतग नीवेरिगिना
त्यजिंचावु नन्नु नीवु - तीवरिंचि तुरितंगा
नी चॆंतकु चेरालनि - नेनॆंतगानॊ तपिंचानु
चेति संज्ञ तॊडने - ननु चेरकुंड चेशावु
निनु ताकालनि ऎंतॆंतो - तहतहलाडा नेनु
चूपुवेलु चूपिंचि - चलिंचमंटु चंडिकवै
तरिमि तरिमि पंपावु -देशान्नुंचे नन्नु
वॆलुगुल राराजि प्पुडु -वॆनुतिरिगाडिंक चूडु
नेनग्गिलोन मग्गुतू -रोजंता निलबड्डा
नी कनु सैग ल कोसमने - निरीक्षिस्तु निल्चुन्ना
ऐना नीवॊक परैन - पिलुवलेदु नन्नु
मंडे कोपंतोटि -रोजंता ऎंडावु
नी कोपपु दावाग्नि-दहिस्तोंदि चूडु निन्नु
वॆलुगुल राराजिंका -वॆळ्लिपोयाडुकदा !
किनुकल तापान्निंका - तीरुचुकोरादा
क्रोधपु ज्वाल लोनीवु -ज्वलिंचिपोतुंटे
दग्धमैपोतोंदा - मानसपु सरोवरं
द्रविस्तोंदि चूडदिगो -हिम श्रुंगपु सोयगं
मदनुनिवल्ले काला -मंचुकॊंड करिगिंचुट
नी रोसपु रश्मिकदि - अवलीले अय्यिंदि
नी मुख पद्मं चिंदे - माधुर्यापु दानं तो
नी आग्रह अनलान्नि- अमृतंग मलचुको
ना हृदयपु राराज्ञी -प्रिये चारु शीले !
विनु कॊंचॆं ना माटिटु
निर्दोषिनि नेनंटू -निगदिंचनु नेनु
दोषिनि नेनुकुंटे -निक्कमुगा ने दोषिने
दंडन पॊंदालि नेनु -दंडिंचे हक्कु नीदि
रमणी ओ राजेशी !
नरुलनु भक्षिंचे - ऒक निट्रिल्लिन सिंहान्नि
नापै कॆगब्राकुटकु - निंकारग नीदेशिंचु
नुडितेलिन नखालतो -नुन्ननि ना वक्ष तलं
आक्रमिंचि चील्चि चील्चि - चिंदरवंदर चॆयनी
शरालंटि दंतालतो - बहुवुलनि जघनालनि
चील्चि चील्चि चंडाडि - गुच्चि गुच्चि पॊडवनी
बहुशा ई लागुनैन - नी प्रतिघातं तीरिते
ना वडलॆल्ला निंडिन -नी भ्रमपूरित कळंकालु
करिगि पोताएमोननि - ने कललु कंटुन्नानु
नन्नु नम्मु निक्कमिदे , ना प्रिये चारु शीले !
आ वसंत रातिरिलो - नुवु मिनहा इंकॆवरू
ना दरिदापुल्लो कूडा -चेरलेदु ,दूरलेदु
नीवु काक आन्युलॆवरु-ना नीडनैन चेरलेरु
ना लोपल ,ना वॆलुपल -नालुदिशला नन्नंता
अणुवणुवुनु आक्रमिंचि -अक्कुन चेरे अंदं
नीवुकाक इंकॆवरे- मुद्दुल ना राधा
इंकॊक्क निमुषमैना -नेनोर्वलेनु नी रोषं
कारणमे लेकुंडा पुट्टिन आ द्वेषं
रमणी ना हृदय राज्ञि !-प्रिये चारु शीले
कल्ला कपटं ऎरुगनि - कुलुकुल कुसुमं नुव्वु
ऎरगवु नीवॆन्नडू- ना ऎदलो नी स्थानं
ना शृंगारपु देवेरिवि - नीवे ना राधिका !
माटलिन्नि चॆप्पनॆल - ना सुंदर मल्लिका
ऒक मुक्कलॊ चॆबुतुन्ना -ना जीव धार नीवनि
तॆलुसा नीकॊरकॆ नेनु -ऎन्नि जन्मलॆत्तानो
सुडुलुगॊन्न समुद्रान्नि -ऎंतॆंतग चिलिकानो
वॆतुकुलाडुतू निन्नु -ऎचॆटेच टोतिरिगानु
काल गमन प्रवाहान -आसि नुंडि,अनंतानिकि
अंदरिपालिट नेनु -दारिद्र्यन्नैते ,
वारंदरिकी नीवु -शिरुलोलिके श्री लक्ष्मिवि
दुर्लभ मरकत मणी-प्रिये चारुशीले
नी अंदपु आग्रहं -प्रेमकदे संकेतं
नीहृदिलो ना हृदयं -ममेकमैपोयिंदि
ना शृंगारपु देवेरिवि नीवे ना राधिका
ओ ममतल मरकतमा -ना जीवधरवीवु
नी ममतल कम्मतनं -विदितमेनु नाकु
ना प्रेम माधुर्यं -ऎरिगिंदि कूडा नीवे
गुप्पॆडंत नी गुंडॆनु -इप्पुडिंक तॆरुवुमा
वॆलुगुल राराजु कूडा -वॆनुतिरिगाडिक चूडु
संगमिंचि पोनी -इक ना हृदि लॊ नी हृदयं
नाआ हृदयपु साम्राज्ञी-प्रिये चारु शीले
नीलोत्पलालु बोलु -नी काटुक कन्नुलु
कसि तो निलुवॆल्ल निंडि -रक्तोत्पललै नायि
मानस कॊलनॆंडिपोयि- निस्पृहमैपो तोंदि
पुव्वुल बाणं कादु -माधवुड्नि जयिंचिंदि
वास्तवमालोचिस्ते -नीवेने राधिका
नी चूपुलॊ वाडि ऐन -बाणालुन्नायि
अड्डगिंच वीलु कानि -प्रेम पाशमू वुंदि
नी वाडिऐन बाणालु -गायापरचायि नन्नु
प्रेम पाशालॆमो-नी बंदी गा चेशायि
ना हृदयपु देवेरी-प्रिये चारुशीले
अलुकलिंका मानि नुव्वु -चिरुनगवुलु चिंदिंचु
नी ऎदुटने उन्नाडु -अंदिकलो नी दोषि
नुवु कोरे कृष्णुडु -राधिका लोलुडु
नी आज्ञलु पाटिंचुनु -गाय पड्ड नी खैदी
आग्रहालु इप्पुडिंक - तिरुगु मुखं पट्टिंचु
अनुमानालन्नी इक -अंदलानिकंपेसॆय्
मॆडलोनी हारान्नि -इटू अटू कदलनी
नडुमुकुन्न मुव्वलन्नि - रवळिंचनिय्यि कॊंचॆंगा
नी सुम सदृश पादं - कॊंचॆं नावैपु चापु
चिरकालंगा ऒक कोरिक -कलवरपॆडुतोंदि नन्नु
सॊगसुल नी पदानिकि -ऎर्रनि पाराणि दिद्दि
अब्बुपडि तब्बिब्बय्-करिगिपोवालन्न
ना कामितमीडेर्चवा -यीरोजे त्वरितंगा
ना हृदयपु देवेरी !प्रिये चारु शीले !
नी दोषि नी ऎदुटे -निल्चुनि उन्नाडु
ईरोजी पनिकूडा -चॆय्यवे ना चलिया
तन्नु नन्नु तमकं तो-रम्या ना राधिका
ना शिरसुन तदेकंग -तांडवमे चॆय्यि
नी पादपु पाराणि तडि-नन्नु चेयुनशोकुनिग
अप्पुडु ना शिरस्सु पैन -विकाशिंचुनु चूडु
नी प्रेमलो तडसिन -सहस्रदळपद्मालु
ना हृदयपु साम्राज्ञी- प्रिये चारु शीले
नी ममतल अमृतमु -अद्भुतमू ,अखंडम्
दहिस्तुंदि दानि शक्ति -नालोपलि वासनलु
नव पल्लवाल मिंचिन -नी कोमल पादाल चॆंत
उंचा ना शिरस्सुनु -प्रेम मीर ना प्रिया!
शांतिंचिंदिप्पुडु -दारुण दावनलम्
वॆलुगुल राराजिप्पुडु वॆनुतिरिगि पोयाडु
कुरिपिंचवॆ ना चॆलिया नी -चिरुनगवुल कौमुदी !!
प्रिये चारुशीले
(प्रिये चारुशीले मुंच मयि मानमनिदानम्
सपदि मदनानलो दहति मम मानसम्
देहि मुखकमल मधुपानम् !
– गीतगोविंद, दशम सर्ग)
प्रिये चारुशीले !
उन्होंने मुझे भ्रमर कहा
और तुमने मान लिया,
मेरे प्रेम को जानते हुए भी
मुझे त्याग दिया।
पास आना चाहा
तो रोक दिया हाथ के इशारे से।
छूना चाहा
तो दे दिया देश-निकाला
तर्जनी उठाकर।
देखो, अब तो सूरज ढल गया,
मैं दिन भर धूप में खड़ा रहा
तुम्हारे संकेत की प्रतीक्षा करता,
पर बुलाया नहीं तुमने।
दिन भर सुलगती रहीं तुम भी तो,
दहकती रहीं अपनी ही आँच में।
देखो, अब तो सूरज ढल गया
ढल जाने दो इस ताप को भी।
दहक तुम रही हो
सुलग तुम रही हो
और जल रहा है मानसरोवर
पिघल रहा है हिमालय।
जो मन्मथ के किए न हुआ,
मानिनी! तुम्हारे रोष ने कर दिया।
इस आग को अमृत बना दो
मुख-कमल की माधुरी के दान से।
*
प्रिये चारुशीले !
सुनो तो –
मुझे कुछ नहीं कहना है
अपनी सफाई में।
जब तुमने
दोषी मान ही लिया मुझे,
तो हाँ, मैं हूँ दोषी;
दंड का अधिकारी।
राजराजेश्वरी !
भूखे आदमखोर शेर छोड़ दो मेरे ऊपर –
चिर जाने दो नाखूनों से मेरा वक्षस्थल,
क्षत-विक्षत हो जाने दो पैने दाँतों से
मेरी बाँहों और जंघाओं को।
शायद इस तरह
तृप्त हो तुम्हारी प्रतिहिंसा
और मिट जाएँ मेरे अंग-अंग पर लगे
मिथ्या लांछन।
सच मानो,
उस वासंती रात में कोई भी तो नहीं था मेरे पास,
सिवा तुम्हारे।
मेरे पास
कभी कोई हो भी कैसे सकता है
सिवा तुम्हारे?
एक तुम ही तो व्यापती हो, राधा !
मेरे भीतर –
- बाहर
- चहुँदिश;
बस यों ही सहा नहीं जाता
यह तुम्हारा अकारण रोष !
*
प्रिये चारुशीले !
बहुत भोली हो तुम।
नहीं जानतीं, तुम क्या हो मेरे लिए.
राधिके ! तुम मेरा शृंगार हो,
मेरा जीवन हो तुम।
जाने कितने जन्म लिए मैंने,
मथ डाले समुद्र जाने कितने,
जाने कहाँ-कहाँ खोजता फिरा तुम्हें
काल के प्रवाह में अनादि से अनंत तक।
मैं सदा का दरिद्र,
और तुम –
सदा की लक्ष्मी
- दुर्लभ रत्न सरीखी !
तुम्हारा कोप भी प्रेम ही है तुम्हारा।
मेरा हृदय तुम्हारा हृदय हो गया है।
राधिके ! शृंगार हो तुम मेरा,
दुर्लभ रत्न हो –
मेरा जीवन
हो;
मेरा हृदय
हो तुम !
तुम्हारे प्रेम को जानता हूँ मैं,
मेरे प्रेम से परिचित हो तुम
अब खुल जाने दो हृदय को।
देखो, अब तो सूरज ढल गया,
ढल जाने दो हृदय में हृदय को।
*
प्रिये चारुशीले !
रक्त कमल-सी दहक रही हैं तुम्हारी कजरारी आँखें
और पछाड़ें खा रहा है मानसरोवर तप-तपकर.
पुष्पधन्वा ने नहीं, तुमने
पराजित किया है कृष्ण को।
तुम्हारी दृष्टि में प्रखर शर भी हैं
और दुर्निवार पाश भी।
लो, मैं घायल भी हुआ
और बँध भी गया !
*
प्रिये चारुशीले !
अब मुस्करा दो,
प्रस्तुत है तुम्हारा अपराधी,
तुम्हारा कृष्ण।
तुम्हारे हर आदेश का पालन करेगा
तुम्हारा यह घायल कैदी।
अब क्रोध को जाने भी दो,
जाने दो संकोच को भी;
हिलने दो हृदय के हार को,
बजने दो करधनी के घुँघरुओं को।
उठाओ तो सही अपने कोमल चरण;
कब की इच्छा थी –
इन तलुओं को सरस महावर से रँगने की !
पूरी हो जाने दो आज वह चाह !
*
प्रिये चारुशीले !
तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने नतमस्तक है।
आज यह भी हो जाने दो –
ठुकराओ, राधा ठकुरानी!
मेरे मस्तक को ठुकराओ |
गीले महावर में रचे तुम्हारे चरण
मुझे अशोक कर देंगे
और मेरे मस्तक पर खिल उठेंगे
तुम्हारी प्रीति के सहस्रों कमल !
*
प्रिये चारुशीले !
तुम्हारी प्रीति अमृत है,
वासना के विष को काटती है।
नव पल्लव से सुकोमल इन चरणों में
रख दिया है मैंने अपना सिर;
लो देखो, शांत हो गई सारी दारुण ज्वाला !
*
सूरज कब का ढल चुका,
अब तो मुस्कान की चाँदनी बरसा दो !
('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 55)
मळ्ळीजन्मिंचा (पुनर्जन्म)
मळ्ळीजन्मिंचा
('पुनर्जन्म' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
మళ్ళీజన్మించా
జరిగిన ఈనాటి ఘటన -సముచిత మనిపించింది
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
|
చదరిన ఆ రేకులన్ని -తమ పరిమళ సౌరభాన
అభిషేకించాయి ఈ -మలయానిల సమగతిని
మరణించీ నేనపుడు -చావనూ లేదు
ఇసుమంత కూడ చెక్కైనా -చెదరానూ లేదు
మరల నేను జీవించా -
నీ శ్వాసల లయ గతి లో !
मळ्ळीजन्मिंचा
जरिगिन ईनाटि घटन -समुचित मनिपिंचिंदि
रंगुल ना रेकुलन्नि चॆल्ला चेदुरायनु
चदरिन आ रेकुलन्नि -तम परिमळ सौरभान
अभिषेकिंचायि ई -मलयानिल समगतिनि
मरणिंची नेनपुडु -चावनू लेदु
इसुमंत कूड चॆक्कैना -चॆदरानू लेदु
मरल नेनु जीविंचा -
नी श्वासल लय गति लो !
पुनर्जन्म
ठीक
ही हुआ
बिखर गईं मेरी पंखुड़ियाँ।
नहला गईं हवाओं को
अपनी खुशबू से।
मर कर भी
मैं मरा नहीं,
मिटा नहीं।
फिर से जी उठा
बिखर गईं मेरी पंखुड़ियाँ।
नहला गईं हवाओं को
अपनी खुशबू से।
मर कर भी
मैं मरा नहीं,
मिटा नहीं।
फिर से जी उठा
तुम्हारी
साँसों में।
असमंजसं (असमंजस )
असमंजसं
('असमंजस' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
అసమంజసం
ఇంకొన్ని ఘడియలు ఆగవా అని
రాత్రి తో నే
పట్టుపట్టా
నిమసమైనా
నిలవకుండా
ఆగమన్నా ఆగకుండా
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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కొన్ని ఘడియల ముందరే
తను నిష్క్రమించింది !!
असमंजसं
इंकॊन्नि घडियलु आगवा अनि
रात्रि तो ने
पट्टुपट्टा
निमसमैना
निलवकुंडा
आगमन्ना आगकुंडा
कॊन्नि घडियल मुंदरे
तनु निष्क्रमिंचिंदि !!
असमंजस
मैंने रात
से ज़िद की –
ठहर जा
कुछ घड़ी और।
और
वह चली
गई
बिना
ठहरे
कुछ
घड़ी पहले।
('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 15)
स्पर्श (स्पर्श)
स्पर्श
('स्पर्श' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा * तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
స్పర్శ
స్పృశించను నిన్ను
నేను
మరల మరల మోదం గా
ఆ స్పర్శలో నీవెంతో
పులకించావనుకున్నా
ఇంతలోనే పరికించా
నీ రోషపు రోషాగ్నిని
ఆ అనలపు వెలుతురులో
అగుపించిన ఆనవాళ్ళు
ఒరిపే నీ ఒడలెల్ల
నీలి రంగు గురుతులు
ఇన్నాళ్లుగ మరి
నేను
తారశించి తాకుతోంది - తళుకుల నీ తనువునే ,
తాకలేదు ఒకపరైన నీ తనువులోని తత్వాన్ని !!
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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स्पृशिंचनु निन्नु
नेनु
मरल मरल मोदं गा
आ स्पर्शलो नीवॆंतो
पुलकिंचावनुकुन्ना
इंतलोने परिकिंचा
नी रोषपु रोषाग्निनि
आ अनलपु वॆलुतुरुलो
अगुपिंचिन आनवाळ्ळु
ऒरिपे नी ऒडलॆल्ल
नीलि रंगु गुरुतुलु
इन्नाळ्लुग मरि
नेनु
तारशिंचि ताकुतोंदि - तळुकुल नी तनुवुने ,
ताकलेदु ऒकपरैन नी तनुवुलोनि तत्वान्नि !!
स्पर्श
बहुत
छूता था तुम्हें
मैं
पहले
और
सोचता था
तुम
पुलकित हो रहे होगे।
पर
उस दिन
तुम्हारे
रोष की रोशनी में
दिखाई
दिए मुझे
तुम्हारी
त्वचा पर पड़े हुए
असंख्य
नीले निशान।
तो
क्या इतने दिनों
मैं
तुम्हारी
केवल त्वचा छूता रहा
तुम्हें
एक बार भी नहीं छू सका !
('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 17)
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