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रविवार, 25 सितंबर 2011

अंबर की किरणें सतरंगी लेकिन धरती मटियाली है

अंबर की किरणें सतरंगी
लेकिन धरती मटियाली है
दिया बुझ गया उस खोली का
तुमने कंदीलें बाली हैं

पीले फूलों के भीतर से
झाँक सकोगे क्या जीवन तुम
दूर दूर तक मरुथल फैले
यहाँ ज़रा सी हरियाली है

इसी गली के नुक्कड़ पर तो
पंखों को रेहान धर तितली
कहीं पेट भरने की खातिर
सजा रही तन की थाली है

रतिपति ऋतुपति कहीं और जा
मधुऋतु   की बातें कर लेना
हर शंकर की हथेलियों पर
धरी हुई विष की प्याली है

अमलतास संन्यासी सहमा
सरसों का संसार सिहरता
गुलमोहर बंदूक लिए है
हर कीकर लिए दुनाली है

19 /12 /1981  


शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

तू कच्ची कचनार

तू कच्ची कचनार राधिके! तू कच्ची कचनार
तू पागल बटमार कन्हैया! तू पागल बटमार

चंदा जैसा मुखड़ा तेरा , कोयल जैसे बोल
जा तू अपनी राह बटोही, करे न और मखौल
तू कोमल सुकुमार राधिके! तू कोमल सुकुमार 
तू है ठेठ गँवार कन्हैया! तू है ठेठ गँवार  

नागिन सी बलखाय किशोरी! हिरनी जैसी चाल 
साँझ भई अब मधुवन मोहे मत रोके नंदलाल!
सुन मेरी मनुहार राधिके! सुन मेरी मनुहार 
तू तो भया लबार कन्हैया! तू तो भया लबार 

चंद्र  किरण सा रूप सलोना, सोने जैसा गात 
मन को मोहे वंशीवाले! तेरी मीठी बात  
तू सुंदर सिंगार राधिके! तू सुंदर सिंगार 
तू चंचल बजमार! कन्हैया!! तू चंचल बजमार !!!

27 नवंबर 1981   


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

कट रहे हैं हाथ मेरे

आँख पर पट्टी बँधी है, काटता है विश्व फेरी!

उड़ रहा तो है कबूतर, पाँव में धागे बँधे हैं.
आँख ताके है शिकारी , कर गुलेलों के सधे हैं.
हैं धरी गिरवी तुम्ही पर सब उड़ानें हाय मेरी!

होंठ मेरे खुद सिलाकर, कान अपने खोलते हो.
जब युधिष्ठिर सत्य बोले, शोर नभ में घोलते हो.
द्रोण विश्वासी हुआ है, छल रही है नीति तेरी!

कट रहे हैं हाथ मेरे, लेखनी फिर फिर उठाते.
क़त्ल कर वे बच रहे हैं, जो तुम्हें सिज़्दे झुकाते.
हो न पाएगी उषा तो, पर तिमिर की क्रीत चेरी!

16 /10 /1981 .