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बुधवार, 2 मई 2012

बातों ही बातों में अरे, यह क्या हुआ, ऋषभ?

बातों ही बातों में अरे यह क्या हुआ ऋषभ
खिलता हुआ गुलाब अँगारा हुआ ऋषभ

कल तक था जिनकि आँख का तारा हुआ ऋषभ
उनकी हि आज आँख का काँटा हुआ ऋषभ

कोई न साथ दे सका इस प्रेम पंथ में
तलवार-धार पर सदा चलना हुआ ऋषभ

किरणों के रंग फर्श प' गिर कर चटक गए
ज्यों इंद्रधनुष काँच का टूटा हुआ ऋषभ

पल पल धुएँ में दोस्तो! तब्दील हो रहा
बचपन के प्रेमपत्र-सा जलता हुआ ऋषभ

छू जाएँ तेरे होंठ कभी भूल से कहीं
इस चाह में तन त्याग के प्याला हुआ ऋषभ

लहरों प' प्यार-प्यार-प्यार-प्यार लिख रहा
कहते हैं लोग-बाग दीवाना हुआ ऋषभ

पूर्णकुंभ- अगस्त 2002 - आवरण पृष्ठ 

मंगलवार, 1 मई 2012

याद आए तो नहीं आँसू बहाना

याद आए तो,  नहीं आँसू बहाना
क्यारियों को सींचना, गुलशन सजाना

चित्र तो मैंने जला डाले सभी अब
पत्र सारे तुम नदी में फेंक आना

लोग हाथों में लिए पत्थर खड़े हों
किंतु तुम निश्चिंत हो हँसना हँसाना

फूल-सा बच्चा कहीं सोता दिखे तो
चूम लेना भाल, लेकिन मत जगाना

यह नहीं इच्छा कि मुझको याद रक्खो
मित्र,  पर अपराध मेरे भूल जाना

पूर्णकुंभ - जून  2001- आवरण पृष्ठ 

बुधवार, 26 जनवरी 2011

जीवन समर में

जीवन-समर में जब गिरा मित्रों के घात से
हर घाव को सहला गए बस तेरे हाथ थे

रक्षा-कवच बना दिया आँचल की छाँव से
वरना मैं कैसे झेलता दिन-रात हादसे

पाँवों में शूल जो चुभे पलकों से चुन लिए
वनवास की हर राह में हम साथ-साथ थे

मैं रेत-रेत हर दिशा में दौड़ता फिरा
मधु गंध रूप रस बने तुम मेरे साथ थे

लहरों से लड़के आ गया इस पार चूंकि जब
मैं डूब रहा था तो तुम भी मेरे साथ थे
28 मार्च 2004 

रविवार, 20 दिसंबर 2009

मैं झूठ हूँ

मैं झूठ हूँ

मैं झूठ हूँ , फरेब हूँ . पाखंड बड़ा हूँ
लेकिन तुम्हारे सत्य के पैरों में पड़ा हूँ
हीरा भी नहीं हूँ खरा मोती भी नहीं हूँ
फिर भी तुम्हारी स्वर्ण की मुंदरी में जड़ा हूँ

सब चूडियों को भाग्य से मेरे जलन हुई
मैं आपकी कोमल कलाइयों का कड़ा हूँ
दुनिया तो लड़ी द्वेष से ,नफरत से ,क्रोध से
मैं जब भी लड़ा तुमसे मुहब्बत से लड़ा हूँ
काँटा हूँ ,दर्द ही सदा देता हूं मैं तुम्हें.
मैं जानता हूँ, मैं तुम्हारे दिल में गड़ा हूँ
.......................................१७/११/१९९५ .............