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सोमवार, 22 जुलाई 2013

विस्मरण

वह खाली आँखों से मुझे देख रही थी निर्निमेष
पहचानने की कोशिश करती हुई

मैंने अपनी पहचान बताई
वह सुन न सकी,
दोनों कानों के परदे ध्वस्त हो चुके थे

मैं पास जा बैठा सटकर
उसकी उँगलियाँ सहलाईं
गाल छुए
वह वैसे ही देखती रही - कोई पहचान नहीं!
मुझे देख रही थी या मेरे पार; आज तक पता नहीं

मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया
दुनिया की सबसे गरम सेज अभी ठंडी नहीं हुई थी!
मैंने धीरे से पुकारा - माँ....
उसकी पुतलियाँ घूमीं - स्मृति लौट रही थी!
उसने होंठ खोले - आवाज़ जा चुकी थी!

कडुआती आँखें मींच लीं मैंने आँसू गटकने को
अहह! उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं ;
मैंने आँखें खोलीं - वह मुझे पहचान रही थी!
आँखों में आँखें डाल कर मैंने काँपते स्वर में कहा - माँ, राम राम;
माँ के होंठ फडफडाए- जीभ नहीं उठी
आवाज़ नहीं निकली - पर असीसती उँगलियाँ बोल रही थीं

माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी!



रविवार, 21 जुलाई 2013

क्षणिक

इंद्र के वज्र सा मेरा अस्तित्व

अभी कौंधा
और
लो, विलीन हो चला

पलक झपकते हो गई प्रलय



बुधवार, 12 सितंबर 2012

जिजीविषा

पंख जल गए, विवश पखेरू फिर भी खिसक रहा है
इच्छाएँ गिर गईं, प्राण पर अब भी सिसक रहा है
देह जूझती है अंतिम रण साँस-साँस तिल-तिल भर
रोम-रोम में धँसा केकड़े का नख कसक रहा है

12/9/2012 : 22-45.

रविवार, 12 अगस्त 2012

मृत्यु आती है


मृत्यु आती है
रोज़,
हर पल
अलग अलग भेस में
अलग अलग अंदाज़ में,
खेलती शिकार
करती आखेट.

उस बार वह आई थी
अलस्सुबह.
पेड की कटी शाख से
कूद पड़ी थी बूढ़े सफ़ेद वेताल की तरह
बीच रास्ते
और लाद कर ले गई थी कंधे पर विक्रम को.
लोग कहते रह गए
बस नाक से खून गिरा था,
और तो कोई चोट नहीं.

अगली बार जब वह आई
चुपचाप दबे पाँव पीछे खडी हो गई ठिठुरती सी
ठेलती रही तिल तिल भर धूप की ओर;
और अचानक लगा गई छलांग
पहाड़ी के छज्जे से गहरी खाई में,
बिल्ली ने दांतों में दबोच ली थी गरदन.

अगले दिन वह फिर आई
शेर की तरह ठहरी रही चट्टान पर
कई पहर,
और फिर टूट पड़ी कहर सी ,
एक ही पंजे में नोच ली रगे-जाँ;
एक-एक साँस निचोड़ ली थी पछाड़ पछाड़ कर.

उसका खेल रुकता थोड़े है.
उसने फिर भेस बदला,
साँप की तरह रेंगती हुई आई और
सरक गई खून की नालियों में.
पता तो तब चला जब देह लहराई
और सारी नसें तड़तडाकर फटने लगीं.
उसे क्या; वह तो रक्त में स्नान कर अट्टहास करती है
और अचानक चुपचाप ताकने लगती है
अगले शिकार को पगलाई आँखों से.

वह देखो; उसने फिर भेस बदला.
समुद्रतट की रेत को गुदगुदाते हैं अनेक दानवाकार केकड़े
और जकड लेते हैं बहते पानी तक को
रौरव नरक जैसी अपनी कुरूप टांगों में.
उछालें मारता है समुद्र,
चीत्कार करती हैं लहरें;
बडवानल के उदर में घुसते चले जाते हैं
केकड़ों के विषैले नाखून,
और वह करती है ज्वार भाटे के सीने पर
उन्माद से परिपूर्ण तांडव नृत्य
मथती हुई दसों दिशाओं को.

पर वह थकती नहीं,
वह छकती भी नहीं;
फिर आती है,
फिर फिर आती है.
अभी उस शाम वह फिर आई थी
बहुत शांत
बहुत शालीन.
कोने में ठहरी रही
प्यार से मुस्कराती;

इतने ही प्यार से आई हो उतर कर
तो स्वागत है तुम्हारा.
मैं बाँहें पसार कर आवाहन करता हूँ
अपने पिता और पितामह की तरह.
आओ, हे मृत्यु, आओ;
मुझे अपनी गोदी में समा लो -
चिर शांत क्रोड़ में;
और मुक्त कर दो!
तुम्ही तो माँ हो
मुझे फिर फिर जनोगी!!

सोमवार, 22 नवंबर 2010

चूहे की मौत

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है 
मैं बहुत फुर्तीला था 
बहुत तेज़ दौड़ता था 
बहुत  उछल कूद करता था 

तुमसे देखी नहीं गई
               मेरी यह जीवंतता
और तुम ले आए 
एक खूबसूरत सा 
खूब मज़बूत सा 
               पिंजरा 
सजा दिए उसमें
कई तरह के खाद्य पदार्थ 
               चिकने और कोमल 
               सुगंधित और नशीले 
महक से जिनकी 
फूल उठे मेरे नथुने 
फड़कने लगीं मूँछें
खिंचने लगा पूरा शरीर 
               काले जादू में बँधा सा 

जाल अकाट्य था तुम्हारा 
मुझे फँसना ही था 
               मैं फँस गया 

तुम्हारी सजाई चीज़ें 
मैंने जी भरकर खाईं
परवाह नहीं की 
क़ैद हो जाने की 

सोचा - पिंजरा है तो क्या 
               स्वाद भी तो है 
               स्वाद ही तो रस है 
               रस ही आनंद 
               'रसो वै सः' 

उदरस्थ करते ही स्वाद को 
मेरी पूरी दुनिया ही उलट गई 
यह तो मैंने सोचा भी न था 
झूठ थी चिकनाई 
झूठ थी कोमलता 
झूठ थी सुगंध 
और झूठ था नशा 

सच था केवल ज़हर 
               केवल विष 
जो तुमने मिला दिया था 
               हर रस में 

और अब 
तुम देख ही रहे हो
मैं किस तरह छटपटा रहा हूँ 


सुस्ती में बदल गई है मेरी फुर्ती 
पटकनी खा रही है मेरी दौड़ 
मूर्छित हो रही है मेरी उछल कूद 

मैं धीरे धीरे मर रहा हूँ 

तुम्हारे चेहरे पर 
उभर रही है एक क्रूर मुस्कान 
तुम देख रहे हो 
               एक चूहे का 
               अंतिम नृत्य 

बस कुछ ही क्षण में 
मैं ठंडा पड़ जाऊँगा

पूँछ से पकड़कर तुम 
फेंक दोगे मुझे 
बाहर चीखते कव्वों की 
               दावत के लिए!  


<21 सितंबर  2003>