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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

पहले तीन दीवे

सुनो!
एक दीवा  दरवाज़े पर ज़रूर रख देना.

और हाँ,
एक दीवा  रास्ते के अंधे मोड़ पर भी.

तब तक मैं
आकाशदीप बाल आता हूँ.

!!ज्योतिपर्व मंगलमय हो!!




सोमवार, 1 नवंबर 2010

प्रेतानुभूति

अभी उस रात मैं मर गया 

घूमते घामते फिर अपने नगर गया 

मेरा सबसे प्रिय मित्र सुख की नींद सोया था, 
मुझे अच्छा लगा 
मुझे शांति मिली 

धूप  चढ़े मेरी खिड़की में चावल चुगने आता कबूतर 
बहुत बेचैन दिखा 
चोंच घायल कर ली थी तस्वीर से टकरा कर,  
मुझे बहुत खराब लगा 
मुझे कभी शांति नहीं मिलेगी 

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

मेरा पक्ष

मैंने प्रण किया था-
तुम्हारा  साथ दूँगा
भूख के खिलाफ हर युद्ध में.
मैंने उठाई थी बंदूक-
बुर्ज पर टँगी तुम्हारी रोटी
उतार लाने को.

आज तुम्हारे हाथों में 
खून की रोटी है 
और तुम खेत में बारूद उगाने लगे हो 
अनाज की जगह.

यार मेरे , इतना तो बता -
अब मैं किसे मारूँ! 

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

कंगारू

मैं कंगारू हूँ.
मेरी छाती में एक जेब है,
जेब में एक बच्चा.
बच्चे को हर हाल में बचाना है मुझे.

वे मुझे बंदर समझते हैं
और मेरे बच्चे को लाश.
कैसे सौंप दूँ उन्हें? 
बच्चे को हर हाल में बचाना है मुझे!

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

सोमवार, 27 सितंबर 2010

आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का सम्मान समारोह संपन्न

ऋषभ देव शर्मा को आंध्र अकादमी का पुरस्कार प्राप्त 

आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद [आंध्र प्रदेश] ने  हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर अकादमी भवन में हिंदी उत्सव का आयोजन किया और अच्छी धूमधाम से २०१० के हिंदी पुरस्कार सम्मानित हिंदीसेवियों तथा साहित्यकारों को समर्पित किए. एक लाख रुपए का पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार अष्टावधान    विधा को लोकप्रिय बनाने के उपलक्ष्य में डॉ. चेबोलु शेषगिरि राव को प्रदान किया गया. तेलुगुभाषी उत्तम हिंदी अनुवादक और युवा लेखक के रूप में इस वर्ष क्रमशः वाई सी पी वेंकट रेड्डी और डॉ.सत्य लता को सम्मानित किय गया. डॉ. किशोरी लाल व्यास को दक्षिण भारतीय भाषेतर हिंदी लेखक पुरस्कार प्राप्त हुआ तथा विगत दो दशक  से दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा के उपलक्ष्य में डॉ.ऋषभ देव शर्मा को बतौर हिंदीभाषी लेखक पुरस्कृत किया गया. इन चारों श्रेणियों में पुरस्कृत प्रत्येक लेखक को पच्चीस हज़ार रुपए तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया.    
पुरस्कृत लेखकों ने ये सभी पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शीर्षस्थ साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. सी.नारायण रेड्डी के करकमलों से अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ.यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद , आंध्र प्रदेश के भारी सिंचाई मंत्री पोन्नाला लक्ष्मय्या तथा माध्यमिक शिक्षा मंत्री माणिक्य वरप्रसाद राव  के सान्निध्य में ग्रहण किए. 
इस अवसर पर बधाई देते हुए  डॉ. सी नारायण रेड्डी ने साहित्यकारों का आह्वान किया कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देशविदेश के हिंदी  पाठकों के समक्ष प्रभावी रूप में प्रस्तुत करें. डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद ने भी ध्यान दिलाया कि अकादमी का उद्देश्य केवल हिंदी को प्रोत्साहित करना भर नहीं  बल्कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के प्रदेय से शेष भारत और विश्व को परिचित कराना है.
सम्मान के क्रम में सबसे पहले डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने पुष्पगुच्छ दिया.
और फिर प्रशस्तिपत्र, स्मृतिचिह्न एवं सम्मानराशि प्रदान की गई.
सम्मान ग्रहण करते हुए कवि-समीक्षक ऋषभ देव शर्मा .
भारी वर्षा के बावजूद इस आयोजन में भारी संख्या में हिंदीप्रेमी  उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए.
डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने अपनी हिंदी ग़ज़ल भी सुनाई  -'बादल का दिल पिघल गया तो सावन बनता है.' 
सरकारी आयोजन था.सो, मीडिया वाले भी कतारबद्ध थे. अगले दिन हिंदी, तेलुगु और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में तो छपा ही, चैनलों पर भी दिखाया गया.  
आंध्र के हिंदीपरिवार की एकसूत्रता और  आत्मीयता  पूरे आयोजन में दृष्टिगोचर हुई.
इस बहाने कुछ क्षण मिलजुलकर हँसने-मुस्कराने के भी मिले. 

मंगलवार, 4 मई 2010

लाज न आवत आपको


तुम्हें चबाने को हड्डी चाहिए थी
खाने को गर्म गोश्त
चाटने को गोरी चमड़ी
चाकरी को सेविका
और साथ सोने को रमणी.


तुमने मुझे नहीं
मेरी देह को चाहा.
पर मैं देह होकर भी
देह भर नहीं थी.


मैं औरत थी!
मुझे लोकलाज थी!


तरसती थी मैं भी - तुम्हारे संग को
तड़पती थी मैं भी - राग रंग को
पर मुझे लोकलाज थी.


तुम क्या जानो लोकलाज?
बस दौड़े चले आए साथ साथ!


न तुमने रात देखी न बारिश
न तुमने नाव देखी न नदी
तुम्हें लाश भी दिखाई नहीं दी
साँप तो क्या ही दीखता?
तुम लाश पर चढ़े चले आए!
तुम साँप से खिंचे चले आए!
न था तुम्हें कोई भय
न थी लोकलाज.


तुम पुरुष थे
सर्वसमर्थ .


और समर्थ को कैसा दोष?


मैं औरत थी
पूर्ण पराधीन.


और पराधीन को कैसा सुख?


तुम आए
मैंने सोचा-
प्रलय की रात में मेरा प्यार आ गया.
पर नहीं
यह तो कोई और था.
इसे तो
हड्डी चाहिए थी चबाने को
गर्म गोश्त खाने को
गोरी चमड़ी चाटने को
और रमणी साथ सोने को!


पर मैं औरत थी
लोकलाज की मारी औरत!


तुम्हें बता बैठी तुम्हारा सच
और तुम लौट गए उलटे पैरों
कभी न आने को!

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

स्वेच्छाचार

हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.
उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया ,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!

अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!

हाँ,मैं हूँ स्वेच्छाचारी!
मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की-
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!

मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!