होंठ पर थे गीत मेरे, साँस में मेरी कहानी थी। उन दिनों आपको मेरी हर अदा लगती सुहानी थी।। आज बरसों बाद अपनी समझ में यह बात आई है; आपने चाहा जिसे वह मैं न था, मेरी जवानी थी।।
दुश्मन के संग वास की आदत से लाचार हूँ। वर्षा के बीच प्यास की आदत से लाचार हूँ।। मैं जानता हूँ, आज फिर तुमने झूठ कहा है; पर क्या करूँ, विश्वास की आदत से लाचार हूँ।।
कब कहा मैंने कि मुझको बाँह में अपनी भरो। कब कहा मैंने कि आहें याद में मेरी भरो।। यह तुम्हारा रूप पावन, दृष्टि को पावन करे; प्राण में गूँजा करे, बस, तान कुछ ऐसी भरो।
फिर सुहानी भोर आई, मित्रवर, तुमको नमन। ऊर्जा की धूप छाई, मित्रवर, तुमको नमन।। यह दिवस उल्लास में, आनंद में खिलता रहे; शुभकामना संदेश लाई, मित्रवर, तुमको नमन।।
बदज़ुबानों की सभा की, क्या सदारत कीजिए? क्यों किसी पर सच जताने, की हिमाकत कीजिए?? मौन ही रहना उचित है, इस नए माहौल में; प्यार की बातें न करिए, बस सियासत कीजिए!!