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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

खुशबू

एक पगली छोकरी।
फूलों की टोकरी।।
खुशबू ने कर ली
उसके घर नौकरी।।

रासायनिक बम

दम तोड़ने से पहले सपने नीले पड़ गए थे,
होंठ ऐंठ गए थे सफेद फेन उगलते-उगलते;
अच्छा हुआ, नींद में ही तड़क गई थीं नसें,
दम टूट गया; नींद नहीं टूटी!

जल्लाद! तुम सचमुच कितने दयालु हो!!

वह मैं न था

होंठ पर थे गीत मेरे, साँस में मेरी कहानी थी।
उन दिनों आपको मेरी हर अदा लगती सुहानी थी।।
आज बरसों बाद अपनी समझ में यह बात आई है;
आपने चाहा जिसे वह मैं न था, मेरी जवानी थी।।

हालचाल

मौसम का हालचाल, हमसे न पूछिए।
यारों की चाल-ढाल, हमसे न पूछिए।।
नेता की रग में पैठ के, कुर्सी के कीट ने -
क्या-क्या किया कमाल,हमसे न पूछिए।।

लाचार हूँ

दुश्मन के संग वास की आदत से लाचार हूँ।
वर्षा के बीच प्यास की आदत से लाचार हूँ।।
मैं जानता हूँ, आज फिर तुमने झूठ कहा है;
पर क्या करूँ, विश्वास की आदत से लाचार हूँ।।

रूप

कब कहा मैंने कि मुझको बाँह में अपनी भरो।
कब कहा मैंने कि आहें याद में मेरी भरो।।
यह तुम्हारा रूप पावन, दृष्टि को पावन करे;
प्राण में गूँजा करे, बस, तान कुछ ऐसी भरो।

शुभोदय

फिर सुहानी भोर आई, मित्रवर, तुमको नमन।
ऊर्जा की धूप छाई, मित्रवर, तुमको नमन।।
यह दिवस उल्लास में, आनंद में खिलता रहे;
शुभकामना संदेश लाई, मित्रवर, तुमको नमन।।

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

कवि धर्म

संभव नहीं कि शक्ति हो औ' ज़्यादती न हो।
इतना करो कि ज़्यादती को ज़्यादती कहो।।
जनता के चारणो! सुनो,सत्ता के मत बनो;
तुम जागते रहो कि कहीं ज़्यादती न हो।।
6/4/2017

बंदूक

छज्जे प' चोंच लड़ाते कबूतरों को देख कर;
बस्ती के दारोगा ने कल बंदूक दाग दी।।
सरकार के फरमान से हम इस कदर डरे;
बचपन के सारे खतों को रो रो के आग दी।।

6/4/2017

औचित्य का प्रश्न

बदज़ुबानों की सभा की, क्या सदारत कीजिए?
क्यों किसी पर सच जताने, की हिमाकत कीजिए??
मौन ही रहना उचित है, इस नए माहौल में;
प्यार की बातें न करिए, बस सियासत कीजिए!!

6/4/2017