फ़ॉलोअर

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

गुस्सा

पुतलियों में तैरता जो स्वप्न का संसार था।
आपका वर्चस्व था बस आपका अधिकार था।।
मैं जिसे गुस्सा समझ ताज़िंदगी डरता रहा;
डायरी ने राज़ खोला, आपका वह प्यार था।।

सम्मोहन

अमरित की कनी ज़हर में डुबाई है।
चमकती हुई तलवार निकल आई है।।
यह अलौकिक रूप नज़रें बाँध लेगा;
आज बिजली चाँदनी में नहाई है।।

भय

डर रहे बूढ़े सयाने, सब कहें 'हम क्या करें'?
छिप गए सब कोटरों में, जान कर भी क्यों मरें??
चाँदनी में बाल खोले, घूमती है प्रेतनी!
और बच्चे हैं कि बाहर खेलने की ज़िद करें!

जीवन जो जिया

झल्लाई सी सुबह, पगलाई सी शाम।
क्रोध भरी दोपहर, यों ही दिवस तमाम।।
प्रेत ठोकते द्वार, ले ले मेरा नाम!
रात भूतनी बनी, यहाँ कहाँ विश्राम।।

इतिहास बनाने वाले

खेत काटकर सड़क बना दी, सभी सुखा दीं क्यारी।
मथुरा का बाज़ार फैलता, ऊधो हैं व्यापारी।।
कहीं तुम्हारी विजय कथा में, मेरा नाम नहीं है!
ब्रज का सब कुछ हरण कर लिया, प्रभुता यही तुम्हारी।।

दौड़

मैंने जिनके वास्ते सब छल किए।
सौ बलाएँ लीं, सदा मंगल किए।।
वक़्त का क्या फेर? सत्ता क्या गई?
वे मुझी को छोड़, आगे चल दिए।।

युद्ध

हाथ में लेकर पताका शिखर पर चढ़ता रहा।
आदमी अपनी सरहदें खींचकर लड़ता रहा।।
भूमि जिसके नाम पर खून से लथपथ पड़ी है!
सातवें आकाश पर वह बैठकर हँसता रहा।।

मानव अधिकार

मरता है कोई छात्र तो सियासत न कीजिए।
भूखों मरे किसान तो तिजारत न कीजिए।।
हैं आप बड़े बुद्धिमान, शब्दों के खिलाड़ी!
लेकिन पिशाच कर्म की वकालत न कीजिए।।

आतंक बीज

कल आपने बोई थीं गलियों में नफ़रतें।
यों आज लहलहाई हैं घर घर में दहशतें।।
नादान बालकों को वहशी बनाने वालो!
खाएँगी तुमको एक दिन तुम्हारी वहशतें।।

शुभ आगमन

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों से मधुरिम पराग झरता है
तुम्हारी निगाह से धरा का रँग निखरता है
जाग उठती हैं दिशाएँ तुम्हारे आने से
तुम्हारे गाने से सूरज उड़ान भरता है