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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

स्वेच्छाचार

हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.
उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहा
मैंने जुआ गिरा दिया ,
उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाही
मैंने हौदा ही उलट दिया,
उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहा
मैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,
उन्होंने मुझे जंजीरों में बाँधना चाहा
मैं पग घुँघरू बाँध सड़क पर आ गई!

अब वे मुझसे घृणा करते हैं
माया महाठगनी कहते हैं
मेरी छाया से भी दूर रहते हैं.
बेचारे परछाई से ही अंधे हो गए
हिरण्मय आलोक कैसे झेल पाते!

हाँ,मैं हूँ स्वेच्छाचारी!
मैंने अपने गिरिधर को चाहा
उसी का वरण किया
गली गली घोषणा की-
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई!

मेरे पति की सेज सूली के ऊपर है,री!
मुझे बहुत भाती है,
मैंने खुद जो चुनी है!!

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

खसम हमारे की गली, लाल किले के पार।


दोहे : 15 अगस्त

0 सहसा बादल फट गया, जल बरसा घनघोर!
इसी प्रलय की राह में, रोए थे क्या मोर?!

0 चिडिया उडने को चली, छूने को आकाश।
तनी शीश पर काँच की, छत, कैसा अवकाश ?!

0 कहना तो आसान है, "लो, तुम हो आजाद'!
सहना लेकिन कठिन है, "वह' जब हो आजाद!!

0 कटी-फटी आजादियाँ, नुचे-खुचे अधिकार।
तुम कहते जनतंत्र है, मैं कहता धिक्कार!!

0 रहबर! तुझको कह सकूँ, कैसे अपना यार?
तेरे-मेरे बीच में, शीशे की दीवार!!

0 मैं तो मिलने को गई, कर सोलह सिंगार।
बख्तर कसकर आ गया, मेरा कायर यार॥

0 खसम हमारे की गली, लाल किले के पार।
लिए तिरंगा मैं खडी, वह ले कर हथियार॥

0 षष्ठिपूर्ति पर आपसे, मिले खूब उपहार।
लाठी, गोली, हथकडी, नारों की बौछार॥

0 ऐसे तो पहले कभी, नहीं डरे थे आप?
आजादी के दर पडी, किस चुड़ैल की थाप??

0 अपराधी नेता बने, पकडो इनके केश।
जाति धर्म के नाम पर, बाँट रहे ये देश॥

0 कैसा काला पड गया, लोकतंत्र का रंग।
अब ऐसे बरसो पिया, भीजे सारा अंग॥


15 अगस्त, 2007 

रविवार, 20 दिसंबर 2009

निवेदन


निवेदन



जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लम्बी है तकरार!
और न खींचो रार!!

यूँ भी हम तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में.


जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोकलाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?


कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुम्बन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार!
वह अनहद उपहार!!


केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के.


सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने.


मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चन्दा
चौमुख दियना बार!
गूंजे मंगलचार!!


भोर हुए
हम शंख बन गए,
सांझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली.


स्वाति-बूँद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचम्पई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी .


आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार!
मुखर मौन मनुहार!!




स्रोत: ताकि सनद रहे(कविता संग्रह) -२००२

नवसंवत्सर की शुभकामनाएँ !



"तेज़ धार का कर्मठ पानी,
चट्टानों के ऊपर चढ़कर,
मार रहा है
घूँसे कस कर
तोड़ रहा है तट चट्टानी !"
(केदारनाथ अग्रवाल). 

रूप की, गुण की,
निरंतर
कर्म की जय हो !!
नया वर्ष मंगलमय हो !!!
 

क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें






क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें






नहीं मालूम कि अपने आप से बतियाना कैसी आदत है। नहीं मालूम, लोग ऐसे आदमी को कैसी नज़र से देखते होंगे.. फिर भी अच्छा लगता है अपने आप से बतियाना। कभी कभी अपने आप से गुँथ जाना - फल की अपेक्षा के बिना।

मैं ख़ुद से मुखातिब हुआ तो
लगा किसी ने कहा हो - बड़बड : आप ही आप ; औरतों की तरह. क्यों बडबडाती हैं औरतें ! नहीं, अब कहाँ बडबडाती हैं औरतें !अब तो वे खूब बोलती हैं. जाने कब से चुप थीं !!

जाने कब से चुप थी मैं!
शायद तब से जब पहली बार मुझसे मेरा मैं छीन लिया गया था .
 छीन लिया गया था मुझसे मेरा जंगल, मेरा खेत, मेरा शिकार, मेरी ताकत. कल तक सारी धरती सबकी साझी थी, घर भी साझा था।

कितना मनहूस था वह दिन जब किसी पिता ने किसी भाई ने किसी बेटे ने किसी पति ने किसी बेटी को
किसी बहन को
किसी मां को 
किसी पत्नी को सुझाव दिया था घर में रहने का, हिदायत दी थी देहरी न लांघने की और बंटवारा कर दिया था दुनिया का - घर और बाहर में.
बाहर की दुनिया पिता की थी - वे मालिक थे, संरक्षक थे.
 भीतर की दुनिया माँ की थी - वे गृहिणी थीं संरक्षिता थीं. माँ ने कहा था - मैं चलूंगी जंगल में तुम्हारे साथ; मुझे भी आता है बर्बर पशुओं से लड़ना !! हँसे थे पिता -तुम और जंगल? तुम और शिकार ??कोमलांगी, तुम घर को देखो. बाहर के लिए मैं हूँ न ! प्रतिवाद नहीं सुना था पिता ने और चले गए थे सावधान रहने का निर्देश देकर दरवाजे को उढकाते हुए. माँ रह गयी थी बड़बड़ाती हुई ........

बस तभी से बड़बड़ा रही हैं औरतें ............


पत्नीं मनोरमां देहि


पत्नीं मनोरमां देहि




* व्यवस्था ज़रूरी है समाज के सुचारू संचालन के लिए। इसलिए उन्होंने 'घर' और 'बाहर' का बंटवारा कर दिया


इसी के साथ बंटवारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में 'घर' और 'घर का काम' आ गया।
वे धीरे-धीरे मालिक बन गए और मैं गुलाम।
मैं चाहकर भी अपना क्षेत्र नहीं बदल सकती थी।
सेवा करना ही अब मेरी नियति थी !


  • मालिक तो मालिक है।
गुलाम उसके लिए मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं।
हम औरतों ने भी अपनी मेहनत और अपना उत्पादन सब जैसे मालिक के नाम कर दिया।
घर बनाया हमने - बसाया हमने।
मालिक वे हो गए।
होते ही.
हमारे मालिक थे, तो हमारे घर के भी मालिक थे।
हमें बहलाना भी उन्हें खूब आता था।
वस्तुओं पर हमारे नाम अंकित कर दिए गए।
हम खुश।
पर सच तो यही था कि नाम भले हमारे लिखे गए हों, सब कुछ था मालिक का ही।
और तो और, हमारे बच्चे भी हमारे न थे।
उत्पादक स्त्री, उत्पादन स्त्री का; उत्पाद मालिक का।
हमारे श्रम का फल, हमारे सृजन का फल - दोनों ही हमारे न हुए.


  • देह से हमने श्रम भी किया और सृजन भी।
उत्पादन और पुनरुत्पादन - दोनों क्षमताएँ हमारी होकर भी हमारी न रहीं।
न देह और न घर - पर हमारा नियंत्रण रहा।
अपने बारे में, अपने शरीर के बारे में, अपने घर के बारे में, अपनी संतान के बारे में - कोई फैसला करने का हक हमारे पास नहीं रहा।
सारे फैसले हमारे लिए वे करने लगे - कभी पिता बनकर, तो कभी पति बनकर।
वह दिन भी आ गया जब स्त्री को जन्म लेना है या नहीं, यह भी वे ही तय करने लगे।
पुरूष विधाता बन गया।
शायद विधाता कोई पुरूष ही होगा - अगर कहीं हो, या कभी रहा हो।

  • सारे निर्णय उनके हिस्से में आए।
और मेरे हिस्से में आया अनुकरण, अनुगमन, अनुपालन, अनुसरण।
बेशक, उन्होंने मुझे देवी बनाकर पूजा भी।
पर कितनी चालाकी से मुझसे मेरी आजादी के बंधक-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए।
भक्त बनकर आए वे मेरे सामने; और हाथ जोड़कर याचना की -"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणी/तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम। "
हंह!उन्होंने मुझे पत्नी बना लिया - मुझे उनकी आज्ञाओं का ही नहीं, मानसिक और अप्रकट इच्छाओं का भी अनुसरण करना होगा,
अपनी कुलीनता औ पवित्रता के बल पर मैं उन्हें पापों के दुर्गम संसार सागर के पार ले जाऊं।
मैं तो साधन हूँ, माध्यम भर हूँ - उनकी मुक्ति के लिए।

  • और मेरी मुक्ति?
मेरी देह की मुक्ति, मेरे मन की मुक्ति, मेरी आत्मा की मुक्ति??
मेरी वैयक्तिक मुक्ति, मेरी सामाजिक - आर्थिक मुक्ति, मेरी आध्यात्मिक मुक्ति???
नहीं, शायद मेरी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं - जब तक मैं छाया हूँ।
छाया कहीं कभी मुक्त होती है?
तो...छाया हूँ मैं...चिर बद्ध छाया?



स्त्री नहीं हूँ मैं?

जितने बंधन, उतनी मुक्ति


जितने बंधन, उतनी मुक्ति







मेरे पिताजी संस्कृत के अध्यापक थे।
आचार्य थे, ज्योतिषी थे.
अनेक शिष्य थे उनके , पुरूष भी, महिलाएं भी।
सभी उनके चरण स्पर्श करते थे आदर से॥
पर महिलाओं को - लड़कियों को - वे मना कर देते थे चरण छूने से।
सदा कहते - स्त्रियों को किसी के चरण नहीं छूने चाहिए - पति और ससुराल पक्ष के वरिष्ठों के अलावा।
कभी किसी ने पूछ लिया - गुरु जी के चरण स्पर्श में कैसी आपत्ति?
आपत्ति है, बेटा। मैं नहीं हूँ आपका गुरु. स्त्री का गुरु है उसका पति.-कहा था उन्होंने
बार बार याद आती है वह बात ; स्त्री का गुरु है उसका पति !!
मन ही मन कई बार पूछा पिताजी से - यह कैसा न्याय है आपका?
पति चुनने का अधिकार तो आपके समाज ने स्त्री से पहले ही छीन लिया था,
आपने गुरु चुनने का अधिकार भी छीन लिया?
आपने तो अपनी ओर से सम्मान दिया स्त्री जातक को, स्त्री जाति को
- चाहे वह किसी भी आयु की हो चरण छूने से रोक दिया; आशीर्वाद दिया, शुभ कामनाएँ दीं ।
अच्छा किया।
पर पति को गुरु घोषित करके कहीं स्त्री के लिए विद्या,ज्ञान और साधना द्वार पर एक स्थायी पहरेदार तो नहीं खड़ा कर दिया ?
वह जिज्ञासा मन में रही - बाल मन की जिज्ञासा थी।
पर आज भी जब कोई छात्रा चरण स्पर्श के लिए झुकती है तो उस आचरण का संस्कार द्विविधा में डाल देता है मुझे।
नहीं, नहीं; लड़कियाँ पैर नहीं छूतीं हमारे यहाँ
- सहज ही मुंह से निकल जाता है उन्हें बरजता यह वाक्य.
कई बार समझाना भी पड़ा है -
मैं आपकी श्रद्धा को समझता हूँ, लेकिन स्त्री पूजनीय है हमारे लिए;
अरे, हम तो कन्या के चरण स्पर्श करते हैं।
[कई बार अपने को टटोला तो यह भी लगा कि दम्भी हूँ - शायद इस तरह अपनी छवि बनाता होऊँगा।]कई बार सोचता हूँ - कैसा दोहरा व्यवहार है हमारा!
एक और हम उनके चरण स्पर्श करते हैं और दूसरी और आज भी पैर की जूती समझते हैं।
गृह लक्ष्मियों की जूतों से पूजा आज भी हो रही है- गाँव ही नहीं, शहर में भी; अशिक्षित घरों में ही नहीं, उच्च शिक्षित घरानों में भी।
जब तक अपना गुरु, अपना मार्ग, अपना मुक्ति पथ स्वयं चुनने की अनुमति नहीं, तब तक इस घरेलू हिंसा से बचना कैसे सम्भव है?
कहते हैं , एक समय की बात है
लोग भगवान बुद्ध के पास पहुंचे और शिकायत की कि यदि स्त्रियाँ बौद्ध भिक्षु बन जायेंगी तो हमारे घर कैसे चलेंगे ?
और तब महिलाओं के सम्बन्ध में तथागत ने यह व्यवस्था दी कि स्त्रियों को पिता,पति और पुत्र के आदेश से चलना चाहिए और उनकी अनुमति से ही संघ में सम्मिलित होना चाहिए।
यानि, मुक्ति पथ है स्त्रियों के लिए भी - पर सशर्त !
जब तक पुरूष न चाहे तब तक स्त्री को बंधन में रहना ही है!
ऊपर से यह सवाल कि कैसी मुक्ति?
किससे मुक्ति??
कितनी मुक्ति???
नहीं, व्याख्या की ज़रूरत नहीं।
मुक्ति चाहिए वहाँ वहाँ, जहाँ जहाँ बंधन हैं !!!
किसी के हाथ बंधे हों, पैर भी मुंह भी, आँख नाक कान भी।
और कोई किसी एक बंधन की कोई एक गाँठ खोलकर पूछे -
और कितनी गांठें खोलनी हूँगी?
मसीहा बनने चले हो तो सारी गांठें खोलो न !
एक भी गाँठ कहीं बंधी रह गई तो मुक्ति तो अधूरी रहेगी न?



मैं नीलकंठ नहीं हुई


मैं नीलकंठ नहीं हुई






वे आए और रेखाएं खींच गए
मेरे चारों ओर
मेरे ऊपर नीचे
सब तरफ़ रेखाएँ ही रेखाएँ
.
मेरे हँसने पर पाबंदी
मेरे बोलने पर पाबंदी
मेरे सोचने पर पाबंदी
.
हँसी, तो सभा में उघाड़ी गई
बोली, तो धरती में समाना पडा
सोचा, तो आत्मदाह का दंड भोगा
.
फिर भी मैंने कहा
मैं हँसूँगी
मैं बोलूँगी
मैं सोचूँगी
.
मैंने पैरों में घुंघरू बाँध लिए
और अपने साँवरे के लिए
नाचने लगी
.
नाचती रही
नाचती रही
.
उन्होंने मुझे पागलखाने में डाल दिया
कुलनाशी और कुलटा कहा
साँपों की पिटारी में धर दिया
.

मेरे अंग-अंग से साँप लिपटते रहे
दिन दिन भर
रात-रात भर
मेरे पोर-पोर को डंसते रहे
चूर-चूर हो गयीं
नाग फाँस में मेरी हड्डियां
.

फिर भी
मैं नाचती रही
नाचती रही
नाचती रही
अपने साँवरे के लिए
.
उन्होंने विष का प्याला भेजा
मेरा नाच रुक जाए
मेरी साँस रुक जाए
.

मैंने पी लिया
विष का प्याला
सचमुच पी लिया
कंठ में नहीं रोक कर रखा
.

मैं नीलकंठ नहीं हुई
सारी नीली हो गई
साँवरी हो गयी
साँवरे का रंग जो था
.

मैं हँसती रही
मैं नाचती रही
.

मैं रोती रही
आँसुओं से सींचकर
प्रेम की बेल बोती रही.
.

जाने कब से हँस रही हूँ
जाने कब से नाच रही हूँ
जाने कब से रो रही हूँ
अकेली
.

कभी तो आनंद फल लगेगा
कभी तो अमृत फल उगेगा
*