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सोमवार, 6 अगस्त 2012

संगममु (संगम)

संगममु
('संगम' का तेलुगु अनुवाद )
              हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा   * तेलुगु अनुवाद -  डॉ. भागवतुल हेमलता 


पदम पदम कलुपुकुनी 
पद पद पयनिद्दामनी
पालू नीरू 
चंदंगा नेडु मनम कलवालनी 
नीवन्ना  आ समयम  गुरुतुकोस्तुन्नदी
कलिसामाक्षणम मनम गंगा -यमुनलतो 
प्रवहिंचामोक पायगा  मुंदुमुंदु करुगुतू. 

येर्रनी नी पगड़ा कांति 
ना कंठपु नीलम तो 
करिगिन आ  शुभ क्षणान
विस्तरींचिन विनीलाकासम
दिगोच्चिनदी मनलोपलिकि
चेरम  घड़ियन मनमु 
घोषिंचे  समुद्रम लोकि

लोलोतुलु  वेतुकूतू
समुद्रम  लो समसामु
प्रवहिंचे पाय काका 
नीरधि लो नीरय्यामु 
नामम  गोत्रम लेदु 
गात्रम गट्टू लेदु 
इटुचूडू अटुचूडू
एटुचूसिना नीटी मयम 
नीरधि लो नीरू मनम 
नीरय्याम नीरधिलो 

इल्लु लेनी ओल्लु लेनी 
नीरधि ओ नीरू मनम 
नीवु लेवु नेनु लेनु
नीरधि लो नीरू मनम 
नीरधि लो नीरय्याम 

संगम

याद आता है समय 
तुमने कहा जब 
लो, चलो, हम आज मिलते हैं 
दो पानियों जैसे, 


और हम तुम मिल गए 
गंगो-जमन से; 
एक धारा बन गए थे। 

घुल गया 
तुम्हारे गौर वर्ण में 
मेरे कंठ का सारा नीलापन, 
उतर आया 
हमारे भीतर आकाश का विस्तार 
और समा गया 
समुद्र की गहराई में। 

अब हम धारा नहीं रहे थे, 
समुद्र थे – 
पानी ही पानी, 
नाम-गोत्र से हीन पानी; 
न घट, न तट – 
बस पानी ही पानी, 

न देह, न गेह – 
बस पानी ही पानी, 
न तुम, न मैं, 
पानी ही पानी !


प्रेमा ('प्यार')


प्रेमा
 ('प्यार' का तेलुगु अनुवाद )
              हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा   * तेलुगु अनुवाद -  डॉ. भागवतुल हेमलता 

                                                         

नुसिमे नीलाब्जान्नी, स्पृशिन्चानु नेनु
अनुनयम तो नुलुमुतू, अंदालाघ्रानिंचा
तन रेकुल सोयागम, नलिबिली चेयमंटुन्ना .
नूकलेदु नेडु नेनु नुनुलेता रेक्कालनि.

तोलिसारिगा योचिंचा नीलाब्जपू मानसं
कदिले ना कराललो, कमिले तन रेक्कलु
आ क्षणान तन मनान प्रमोदमो, निर्वेदमो
अंतु पट्टलेदु नाकु अंतरंग भावमु .

तिरिगी
नेनु स्पृशिन्चानु मुग्ध गुंडे लोतुलु
एमो नाकनिपिंचेनु
तनेमो  नाकनिपिंचेनु  ....

तनु  ना मनसु उसुलाडिनट्टु

तन प्रेमा सौरभाना
गालि परिमलिंचिनट्टु


उस दिन मैंने फूल को छुआ
सहलाया और सूँघा,
हर दिन की तरह
उसकी पंखुडियों को नहीं नोंचा।

उस दिन पहली बार मैंने सोचा
फूल को कैसा लगता होगा
जब हम नोंचते हैं 
उसकी एक-एक पंखुड़ी।

तब मैंने फूल को
फिर छुआ
फिर सहलाया
फिर सूँघा...

और मुझे लगा

हवाएं महक उठीं
प्यार की खुशबू से।

   ('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 14)

मेखला कन्यका (नदी)


 मेखला कन्यका 
('नदी' का तेलुगु अनुवाद )

हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा  * तेलुगु अनुवाद -  डॉ. भागवतुल हेमलता 

                                           

गलगला पारुतु गलिबिली चेस्तु
निंडुतनम तो उरकलु वेस्तु
उद्रेकं तो एगसी पडेटि 
मेखला कन्यका नीवे नीवे. 


चेट्टु चेमलु चील्चुकुनि
कोंडा शिखरलू कूल्चुकुनि
पृथ्वी पुशितमु पेकलिंचे
प्रफुल्ल गमनवु नीवे नीवे.


उल्लासम तो उत्साहम तो
पोंगारेटी पोंकमु तोटी
प्रमोदमंदुतु परवडि त्रोक्के
मुग्ध मुदितवु नीवे नीवे.


कानन भूमुलु, मरुस्थलम्मुलु
दाटुतु उरुकुतु जलनिधि चेंतकु
मदि निंडिन नी कोरिक तीरगा
निंडु प्रेमतो चेरे नीवु .

गलगला पारे मेखलवु .




नदी

तुम नदी
छलछलाती
आवेग में उद्दाम !

चट्टानों को फोड़ दिया
काट दिए पर्वतों के शिखर
तराश दिया
धरती का सीना;
पानी की धार !
उमंग से,
उल्लास से,
आनंद से भरपूर !

फलांगती जंगल
लांघती मरुथल
आ गईं समुद्र तक
समा गईं प्यार से,
हुईं पूर्ण काम !

तुम नदी
आवेग में
छलछलाती उद्दाम ! 

('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 13)

सोमवार, 16 जुलाई 2012

ने वाडिन नेलवंकला ( मै बुझे चाँद सा)

ने वाडिन नेलवंकला 

('मै बुझे चाँद सा' का तेलुगु अनुवाद )

हिंदी मूल -  डॉ. ऋषभ देव शर्मा * तेलुगु अनुवाद -  डॉ. भागवतुल हेमलता 


वाडिन नेलवंकला नेनु
निदुरिंचा निसीधि ओडिलो
प्रलय कालपु प्रणय स्वरम लो 
ओदिगाया  रागरागीनुलु
दूराना तीराना उप्पोंगे सिन्धुजलम लो
चिरु दिव्वेवै नुवु मेल्कांचावु
रवलिंचे  मुरली नादं 
चेदिन्चेनु चीकटि चर्यलु 
सप्त  वर्नाला सुन्दर ध्वनुलु

नर्तींचेनु सप्तस्वरालै
आरिन नेलवंका रूपुना 
मरला चेरे कललु  ओकटोक्कटिगा   

मै बुझे चाँद सा

मै बुझे चाँद सा
अंधेरे में छिपा हुआ बैठा था
सब रागिनियाँ डूब चुकी थीं
प्रलय निशा में 
तभी जगे तुम
दूर सिंधु के जल में झलमल
और बांसुरी ऐसी फूंकी
अन्धकार को फाँ क फाँक में चीर चीर कर
सातों सुर बज उठे
सात रंगों वाले 
बुझे चाँद में एक एक कर
सभी कलाए थिरक उठीं

शनिवार, 23 जून 2012

प्रेम बना रहे : ऋषभ देव शर्मा की 68 प्रेम कविताएँ



प्रेम बना रहे : ऋषभ देव शर्मा की 68 प्रेम कविताएँ


अरसे से मन में था कि एक किताब अपनी सहधर्मिणी डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी को समर्पित करूँ , पर यह संकोच भी था कि पता नहीं उन्हें कैसा लगे - प्रेम को प्रदर्शित करने में सदा कंजूसी बरतने की अपनी फिलासफी के अनुरूप इसे भी प्रदर्शन और बडबोलापन न मान लें. फिर भी साहस करके गत चार मई 2012 को विवाह की 28वीं वर्षगाँठ पर  बेटे-बेटी से गुपचुप परामर्श करके ''प्रेम बना रहे'' की टंकित पांडुलिपि श्रीमतीजी के सामने धर दी. और सौभाग्यवश उन्होंने न तो रोष जताया और न ही उपहास किया ('प्रेम बना रहे' मेरा तकियाकलाम है न कुछ वर्षों से!). अर्थात प्रकाशन की स्वीकृति मिल गई. और अब वह कविता-संग्रह छप कर आ गया है, प्रकाशित हो गया है.

''प्रेम बना रहे'' में मेरी 68 प्रेम कविताएँ हैं; या कहें कि प्रेम पर केंद्रित कविताएँ हैं. ये कविताएँ अलग अलग समय पर लिखी गई हैं - अलग अलग काव्यरूपों में. यों तो इनमें से कुछ कविताएँ अंतरंग गोष्ठियों में और मित्रों के बीच पसंद की गई हैं, कुछेक यत्र तत्र छपी भी हैं - परंतु अधिकतर ऐसी हैं जो डायरी के पन्नों से पहली बार बाहर आई हैं. अवलोकनार्थ विवरण के अलावा ऑनलाइन संस्करण का लिंक यहाँ सहेज रहा हूँ.

पुस्तक का शीर्षक -   प्रेम बना रहे 
विधा - काव्य [प्रेम कविताएँ]

प्रकाशक -
 अकादमिक प्रतिभा, सरस्वती निवास,
 यू-9, सुभाष पार्क, नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, 
नई दिल्ली - 100 059.  फोन : +91 9811892244.

प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.

प्रथम संस्करण : 2012.
पृष्ठ संख्या -120 .
मूल्य - :INR  250/=

आई एस बी एन : 978-93-80042-59-6.

रविवार, 17 जून 2012

खाला का घर



खाला का घर ही
आखिर प्रेम का घर निकला.
बेशर्त उन्मुक्त पंछी सी आवाजाही.
किसी कुर्बानी की माँग नहीं.

चले आओ, पुत्तर, तुम्हारा अपना घर है.
इतना क्यों भटकाया रे कबीरे!
मेरे लाल को?

रविवार, 3 जून 2012

देहरी : ऋषभ देव शर्मा की 35 स्त्रीपक्षीय कविताएँ


देहरी [स्त्रीपक्षीय कविताएँ]
कवि : ऋषभ देव शर्मा
प्रकाशक : लेखनी, सरस्वती निवास, यू - ९, सुभाष पार्क,
नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली - 110059.
[फोन : 011-25333263/64]
संस्करण : 2011
मूल्य : 250 रुपए 

पुस्तक का ऑनलाइन लिंक : ''देहरी''

संवेदना यदि कविता का उत्स है तो ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ संवेदनापरक अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाएँगी. कुछ कविताओं में संवेदना की स्मृतिजन्य उपस्थिति में भावुकता भी दिखलाई पड़ती है. यह ख़ास इसलिए है कि भावुकता प्रकट करने वाली भाषिक अभिव्यंजना आज की कविता से क्रमशः दूर होती जा रही है. 

कहने को तो ये कविताएँ स्त्रीवादी कविताएँ हैं; और अपनी विषयवस्तु में हैं भी. लेकिन ये स्त्री के इर्द गिर्द आकर ही ठहर नहीं गई हैं. इनमें पारिवारिक संरचना के बदलते स्वरूप की परख है, सामाजिक ढाँचे और मूल्यों के विघटन की आवाज़ है. पुराकथाओं के जरिये पुरुष-स्त्री संबंधों की, और स्त्री की, यातनागाथा की अभिव्यक्ति जैसे घटक भी इस तरह मिलाए हुए हैं कि इनमें स्त्री एक अलग इकाई की तरह नहीं बल्कि धुरी की तरह चित्रित है गोकि उसकी शोषणक्रिया के अनुष्ठान कम ही बदल पाए हैं. कविताएँ इन्हें बदलना चाहती हैं. जो कविताएँ स्त्री की ओर से प्रथमपुरुष में लिखी गई हैं, उनमें बदलाव की यह तड़प अधिक मुखर है. 

स्त्री की अनेक छवियाँ इन कविताओं में उभरी हैं. आदिवासी से लेकर घर परिवार की, महानगरों की, गाँवों-कस्बों की स्त्रियों की - घुटन, भीतर भीतर पक रही अनपूरी चाहें जब उनकी ललकार और चुनौती में बदलती हैं तो यह अलग-अलग कविताओं का संग्रह प्रबंध काव्य का गठन पाता सा लगता है. 

कवि ने अनुभूत ही लिखा है इसलिए हर कविता सच्ची है. झूठ इनमें इतना ही है जितना आए बिना कोई अच्छी कविता बनती भी नहीं. 

'देहरी' संग्रह की कविताएँ देहरी के भीतर वाली स्त्री के अनेक रूपों का चित्र खींचती हैं और देहरी के बाहर निकल सकने की उसकी इच्छाओं और इसके बावज़ूद नागपाश की तरह जो सामजिक रूढ़ियाँ उसे जकड़े हुए हैं उन्हें तोड़ने की और देहरी के भीतर जाने और फिर बाहर न निकल पाने की एकतरफा आमद को इस संग्रह की कविताएँ दृढ़ता से नकारती हैं. (पुस्तक के फ्लैप पर प्रकाशित वक्तव्य).
  
-प्रो. दिलीप सिंह
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,चेन्नै-600 017


यह पुस्तक पीडीएफ फॉर्मेट में निम्नलिखित लिंक पर  सहेजी गई है - 

गुरुवार, 31 मई 2012

स्वप्नचित्र

मैं रचने चली थी
अपने सपनों की एक लड़की
 .
एक लड़की
जो खुद खड़ी हो
अपने पैरों पर
 ....
सारी ताकत समेट कर
अपने घुटनों में
 .
पर तुम जाने कहाँ से आ गए
उसे सहारा देने
!
दूर हटो
कम से कम सपने तो
देख लेने दो
मुझे
मेरे मन के
.

नरपिशाच मैं

वह मेरे पास आया
बैठ गया

हम दोनों बैठे रहे
देर तक बस यूँ ही
बिना कुछ कहे
.
एक बेमुस्कान सी मुस्कान थी
दोनों के चेहरे पर

एक शांति की छाया सी .

मैंने अपना हाथ बढ़ाया उसकी ओर
उसने रख दिया अपना हाथ मेरी हथेली पर

मैंने दूसरे हाथ की तर्जनी का नाखून
गड़ा दिया उसकी कोमल कलाई में

नस कट गई

खून हो गया

रक्तपान कर
मैं
बन गया हूँ पिशाच
लटका अंधकूप में उल्टा

अब शव भक्षण की बारी है

[कुमार लव की ''आदमखोर'' सिरीज़ की प्रेरणा से]

शुक्रवार, 25 मई 2012

परंपरा


वे पृथ्वी हैं-
         सब सहती हैं
         चुप रहती हैं,
वे गाय हैं-
         दूध देती हैं
         बछड़े भी देती हैं,
हम युद्ध करते हैं
उनकी खातिर
और फिर
लगाते हैं चौराहों पर
उनकी बोली।
         हम इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यह तो हमारी परंपरा है-
                          गौरवशाली परंपरा!


वे सदा से
चलती आई हैं
         हमारे साथ
झेलने के लिए
हर देश-निकाला,
हर एक अज्ञातवास
और हर एक अभिशाप-
         कभी जानकी बनकर,
         कभी द्रौपदी बनकर
         तो कभी शैव्या बनकर।
आखिर यही तो
         उनका धर्म है न !


और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या है हमारा धर्म???


छोड़ आते रहे हैं हम उन्हें
बियाबान में
पंचतत्वों के हवाले,
         गर्भवती होने पर।
चढ़े चले जाते हैं हम
कुत्तों की ज़ंजीर थामे
स्वर्ग के सोपान पर,
छोड़कर उनके एक एक अंग को
         बर्फ में गलता हुआ।
और जब वे आती हैं
आधी साडी़ में लपेटे हुए
हमारे अपने बच्चों की लाश को,
वसूलते रहे हैं हम
पूरा पूरा टैक्स
मसान के पहरेदार बनकर
बची खुची आधी साड़ी से।


और हम
         इसके लिए कतई शर्मिंदा नहीं हैं,
          आखिर यह हमारी परंपरा है-
                                 गौरवशाली परंपरा!


नीलाम किया है हमने
अपनी रानियों तक को
बनारस के चौराहों पर
         सत्यवादी हरिश्चंद्र बनकर।
बोली लगाई है हमने
चंपा की राजपुत्री चंदनबालाओं तक की
कौशांबी के बाज़ारों में
         धनपति नगरसेठ बनकर।
कभी.......
किसी नीलामी पर
किसी बोली पर
         किसी को ऐतराज़ नहीं हुआ,
         कोई आसन नहीं डोला,
         कोई शासन नहीं बोला, 
         और न ही कभी
         एक भी सवाल उठा-
                   किसी संसद में।


फिर अब क्यों बवाल उठाते हो?


कुछ नया तो नहीं किया हमने ;
कुछ लड़कियों, कुछ औरतों को-
(कुछ ज़मीनों, कुछ गायों को)-
         नीलाम भर ही तो किया है
         एलूरु के बाज़ारों में,
         आंध्र के गाँवों की हाटों में।


इसमें नया क्या है?
क्यों बवाल मचाते हो??
क्यों सवाल उठाते हो???
         हम तो इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं,
         यही तो हमारी परंपरा है-
                           गौरवशाली परंपरा!
http://bit.ly/K5HUpx