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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013
बुधवार, 28 अगस्त 2013
बुधवार, 21 अगस्त 2013
बोम्मै-पसु-अडिमै = गुड़िया-गाय-गुलाम
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2011/ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.
कल तुमने मुझे
अपने खूँटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की.
आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ
नहीं!
मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!!
(देहरी: 2011: पृष्ठ1)
तमिल अनुवाद (नीरजा)
ரொம்ப காலமாய நீ ஏந்நை
சத்தமபோடும் பொம்மை என்று நிநைத்து
தீரையில நிர்லாக்ஷ்யமாஈ விஸிரிநாய
காலால மிதைத்தாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.
நேட்ரு நீ ஏந்நை
உந கம்புக்கு கட்டிய பஸு என்று நிநைத்து
ஏந காலில கயிரை மாட்ரீநாய
ஏந பால மடியை கரைத்திநாய ஆநாலும நாந வாய் அஸைக்யவில்லை.
இன்று நீ என்னை
உன் அடிமை என்று நினைத்து
ஏன் நாக்கை இரும்பு ஈட்டியால் ஸுட்ரிவிட்டாய ஆனாலும் நீ நினைக்கிறா
நான் வாய் அசைக்யமாட்டேன் என்று!
இல்லை!
நான் பொம்மை இல்லை!
நான் பசுவும் இல்லை!!
நான் அடிமை இல்லை!!!
हिंदी लिप्यंतरण
रोंभ कालमाय नी एन्नै
चत्तमपोडुम बोम्मै एंड्रु निनैत्तु
तिरैयिल निर्लाक्ष्यमाई विसिरिनाय
कालाल मिदैत्ताय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै.
नेट्रु नी एन्नै
उन कम्बुक्कु कट्टिय पसु एंड्रू निनैत्तु
एन कालिल कयिरै माट्रीनाय
एन पाल मडियै करैत्तिनाय आनालुम नान वाई असैक्यविल्लै.
इंद्रु नी एन्नै
उन अडिमै एंड्रु निनैत्तु
एन नक्कै इरुम्बु ईट्टीयाल सुट्रिविट्टाय आनालुम नी निनैक्कराया
नान वाई असैक्यमाटेन एंड्रू !
इल्लै !
नान बोम्मै इल्लै !
नान पसुवुम इल्लै !!
नान अडिमै इल्लै !!!
सोमवार, 22 जुलाई 2013
लोकनिद्रा
अरी ओ चिरैया!
ज़रा उषा की अगवानी के गीत तो गाओ.
जनता को जगाना है
अरी ओ कलियो!
ज़रा चटक कर खुशबू बिखेरो न
जनता को जगाना है
अजी ओ सूरज दादा!
जमे हिम खंड पिघला दो अपनी धूप से
जनता को जगाना है
अरी ओ हवाओ!
सहलाओ मत, जोर से हिलाओ, झकझोरो
जनता को जगाना है
अरे ओ बादलो!
उमडो घुमडो गरजो बरसो, बिजली चमकाओ
जनता को जगाना है
अरी ओ धरती!
फट नहीं पड़ना! थोड़ा और धीर धरो!!
जनता जाग रही है!!!
ज़रा उषा की अगवानी के गीत तो गाओ.
जनता को जगाना है
अरी ओ कलियो!
ज़रा चटक कर खुशबू बिखेरो न
जनता को जगाना है
अजी ओ सूरज दादा!
जमे हिम खंड पिघला दो अपनी धूप से
जनता को जगाना है
अरी ओ हवाओ!
सहलाओ मत, जोर से हिलाओ, झकझोरो
जनता को जगाना है
अरे ओ बादलो!
उमडो घुमडो गरजो बरसो, बिजली चमकाओ
जनता को जगाना है
अरी ओ धरती!
फट नहीं पड़ना! थोड़ा और धीर धरो!!
जनता जाग रही है!!!
विस्मरण
वह खाली आँखों से मुझे देख रही थी निर्निमेष
पहचानने की कोशिश करती हुई
मैंने अपनी पहचान बताई
वह सुन न सकी,
दोनों कानों के परदे ध्वस्त हो चुके थे
मैं पास जा बैठा सटकर
उसकी उँगलियाँ सहलाईं
गाल छुए
वह वैसे ही देखती रही - कोई पहचान नहीं!
मुझे देख रही थी या मेरे पार; आज तक पता नहीं
मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया
दुनिया की सबसे गरम सेज अभी ठंडी नहीं हुई थी!
मैंने धीरे से पुकारा - माँ....
उसकी पुतलियाँ घूमीं - स्मृति लौट रही थी!
उसने होंठ खोले - आवाज़ जा चुकी थी!
कडुआती आँखें मींच लीं मैंने आँसू गटकने को
अहह! उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं ;
मैंने आँखें खोलीं - वह मुझे पहचान रही थी!
आँखों में आँखें डाल कर मैंने काँपते स्वर में कहा - माँ, राम राम;
माँ के होंठ फडफडाए- जीभ नहीं उठी
आवाज़ नहीं निकली - पर असीसती उँगलियाँ बोल रही थीं
माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी!
पहचानने की कोशिश करती हुई
मैंने अपनी पहचान बताई
वह सुन न सकी,
दोनों कानों के परदे ध्वस्त हो चुके थे
मैं पास जा बैठा सटकर
उसकी उँगलियाँ सहलाईं
गाल छुए
वह वैसे ही देखती रही - कोई पहचान नहीं!
मुझे देख रही थी या मेरे पार; आज तक पता नहीं
मैंने उसकी गोद में सिर रख दिया
दुनिया की सबसे गरम सेज अभी ठंडी नहीं हुई थी!
मैंने धीरे से पुकारा - माँ....
उसकी पुतलियाँ घूमीं - स्मृति लौट रही थी!
उसने होंठ खोले - आवाज़ जा चुकी थी!
कडुआती आँखें मींच लीं मैंने आँसू गटकने को
अहह! उसने मेरे बालों में उँगलियाँ फिराईं ;
मैंने आँखें खोलीं - वह मुझे पहचान रही थी!
आँखों में आँखें डाल कर मैंने काँपते स्वर में कहा - माँ, राम राम;
माँ के होंठ फडफडाए- जीभ नहीं उठी
आवाज़ नहीं निकली - पर असीसती उँगलियाँ बोल रही थीं
माँ अंतिम क्षण की प्रतीक्षा में थी
मुझे ट्रेन पकडनी थी!
रविवार, 21 जुलाई 2013
गलगोड्डा[1]
कई बरस
पहले हमारे पुरखे
इस गाँव
में ले आए थे
एक
विचित्र प्राणी
कहने को
चौपाया
पर थीं
तीन ही टांगें – तीनों घायल,
चौथी टांग
अदृश्य
घिसट घिसट
कर चलता
मौके
बेमौके सींग और पूँछ चलाता
जोर से
डकारता
हमने उसके
गले में भ्रष्टाचार की ईंटें बाँध दी हैं
अदृश्य
टांग की जगह रोप दिया है ऐरावत का घंटा
अब वह
चलता नहीं खड़ा खड़ा हिलता है
सोमवार, 15 अप्रैल 2013
कुत्ता-गति
प्रभो!
तुम्हारे कुत्तों ने बहुत सताया है मुझे
जाने कहाँ से निकल कर चुपचाप
चलने लगते हैं बचपन से ही
मेरे साथ साथ
कभी आगे कभी पीछे
मेरी पद चाप
मेरी देह गंध
इन तक दूर से पहुँच जाती रही है
और ये झपटते रहे हैं मुझ पर अचानक घात लगाकर
गली खेत गाँव घर शहर ही नहीं
सारे धरम करम भरम में भी
सपनों तक में
मुझे इनकी आवाजे अकेला नहीं होने देतीं
सुरक्षित नहीं महसूसने देतीं
और तुम कहते हो ये मेरी सुरक्षा के लिए हैं
घोर अंधेरी रात में
आवाजें उनकी बहुत दूर लगती रहती हैं
पर वे झपट पड़ते हैं अचानक बहुत नज़दीक से
मैं कूद पड़ता हूँ पर्वत शिखर से गहरी नदी में
मुझे तैरना नहीं आता
पानी भरता चला जाता है मेरे मुँह में
नाक कान आँख में
मेरे भीतर भौंकने लगते हैं हज़ारों कुत्ते एक साथ
यही कुत्ता-गति होनी थी मेरी
तो मुझे मानुष-देह क्यों दी थी भला ?
सोमवार, 19 नवंबर 2012
दस दोहे : संदर्भ दीपावली का
१.
विरह अमावस साँपनी
रही साँस को लील
तुम छू लो तो जल उठे
प्राणों का कंदील
होंठ फुलझड़ी हो गए
आँखें हुईं अनार
पोर पोर दीपावली
जगमग यह शृंगार
छुआ ललक से आपने
जिस पल मेरा गात
झलमल झलमल मैं हुई
दीपों भरी परात
आओ अब मिल लो गले
करो क्रोध का त्याग
जले प्रेम का दीप फिर
जगे ज्योति का राग
राजमहल में माँ जली
पूरे चौदह साल
सोच सोच कैसे कहाँ
जलता मेरा लाल
विरह अमावस साँपनी
रही साँस को लील
तुम छू लो तो जल उठे
प्राणों का कंदील
२.३.
डर लगता अँधियार में
आओ तनिक समीप
रोम रोम में बल उठें
पिया! प्रेम के दीप
होंठ फुलझड़ी हो गए
आँखें हुईं अनार
पोर पोर दीपावली
जगमग यह शृंगार
४.५.
मैं जलता दीवा बनी
निशि दिन देखूँ राह
पाहुन! आओ तो कभी
गहो हमारी बाँह
छुआ ललक से आपने
जिस पल मेरा गात
झलमल झलमल मैं हुई
दीपों भरी परात
६.७.
इसी अमावस जगेंगे
मेरे सोए भाग
मैं पगली नचती फिरूँ
धरे हथेली आग
आओ अब मिल लो गले
करो क्रोध का त्याग
जले प्रेम का दीप फिर
जगे ज्योति का राग
८.९.
चौदह बरसों से पड़ा
सूना घर का द्वार
आज उतारूँ आरती
चौमुख दियना बार
राजमहल में माँ जली
पूरे चौदह साल
सोच सोच कैसे कहाँ
जलता मेरा लाल
१०.हैदराबाद, १८ नवंबर २०१२
भटका चौदह साल तक
लौटा तेरे द्वार
माँ ने माथा चूम कर
मिटा दिया अँधियार .
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
प्रिये चारुशीले (प्रिये चारुशीले)
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अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली - 100 059
2012./ आईएसबीएन : 978-93-80042-59-6.
प्राप्ति स्थान -
डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 .
फोन : +91 8121435033.
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('प्रिये चारुशीले' का तेलुगु अनुवाद )
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा
*
तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
*
तेलुगु अनुवाद - डॉ. भागवतुल हेमलता
ప్రియే చారు శీలే
(ప్రియే చారుశీలే ముంచ మయి మానమనిదానమ్
సపది మదనానలో దహతి మమ మానసమ్
దేహి ముఖకమల మధుపానమ్ !
– గీతగోవింద, దశమ సర్గ)
ప్రియే చారుశీలే
జనాలంత నేనొక - భ్రమరాన్నంటున్నారు
నీక్కూడా ఆ మాటే -నిక్కమై తోచింది
నా మమతల మధురిమ-ఎంతగ నీవేరిగినా
త్యజించావు నన్ను నీవు - తీవరించి తురితంగా
నీ చెంతకు చేరాలని - నేనెంతగానొ తపించాను
చేతి సంజ్ఞ తొడనే - నను చేరకుండ చేశావు
నిను తాకాలని ఎంతెంతో - తహతహలాడా నేను
చూపువేలు చూపించి - చలించమంటు చండికవై
తరిమి తరిమి పంపావు -దేశాన్నుంచే నన్ను
వెలుగుల రారాజి ప్పుడు -వెనుతిరిగాడింక చూడు
నేనగ్గిలోన మగ్గుతూ -రోజంతా నిలబడ్డా
నీ కను సైగ ల కోసమనే - నిరీక్షిస్తు నిల్చున్నా
ఐనా నీవొక పరైన - పిలువలేదు నన్ను
మండే కోపంతోటి -రోజంతా ఎండావు
నీ కోపపు దావాగ్ని-దహిస్తోంది చూడు నిన్ను
వెలుగుల రారాజింకా -వెళ్లిపోయాడుకదా !
కినుకల తాపాన్నింకా - తీరుచుకోరాదా
క్రోధపు జ్వాల లోనీవు -జ్వలించిపోతుంటే
దగ్ధమైపోతోందా - మానసపు సరోవరం
ద్రవిస్తోంది చూడదిగో -హిమ శ్రుంగపు సోయగం
మదనునివల్లే కాలా -మంచుకొండ కరిగించుట
నీ రోసపు రశ్మికది - అవలీలే అయ్యింది
నీ ముఖ పద్మం చిందే - మాధుర్యాపు దానం తో
నీ ఆగ్రహ అనలాన్ని- అమృతంగ మలచుకో
నా హృదయపు రారాజ్ఞీ -ప్రియే చారు శీలే !
విను కొంచెం నా మాటిటు
నిర్దోషిని నేనంటూ -నిగదించను నేను
దోషిని నేనుకుంటే -నిక్కముగా నే దోషినే
దండన పొందాలి నేను -దండించే హక్కు నీది
రమణీ ఓ రాజేశీ !
నరులను భక్షించే - ఒక నిట్రిల్లిన సింహాన్ని
నాపై కెగబ్రాకుటకు - నింకారగ నీదేశించు
నుడితేలిన నఖాలతో -నున్నని నా వక్ష తలం
ఆక్రమించి చీల్చి చీల్చి - చిందరవందర చెయనీ
శరాలంటి దంతాలతో - బహువులని జఘనాలని
చీల్చి చీల్చి చండాడి - గుచ్చి గుచ్చి పొడవనీ
బహుశా ఈ లాగునైన - నీ ప్రతిఘాతం తీరితే
నా వడలెల్లా నిండిన -నీ భ్రమపూరిత కళంకాలు
కరిగి పోతాఏమోనని - నే కలలు కంటున్నాను
నన్ను నమ్ము నిక్కమిదే , నా ప్రియే చారు శీలే !
ఆ వసంత రాతిరిలో - నువు మినహా ఇంకెవరూ
నా దరిదాపుల్లో కూడా -చేరలేదు ,దూరలేదు
నీవు కాక ఆన్యులెవరు-నా నీడనైన చేరలేరు
నా లోపల ,నా వెలుపల -నాలుదిశలా నన్నంతా
అణువణువును ఆక్రమించి -అక్కున చేరే అందం
నీవుకాక ఇంకెవరే- ముద్దుల నా రాధా
ఇంకొక్క నిముషమైనా -నేనోర్వలేను నీ రోషం
కారణమే లేకుండా పుట్టిన ఆ ద్వేషం
రమణీ నా హృదయ రాజ్ఞి !-ప్రియే చారు శీలే
కల్లా కపటం ఎరుగని - కులుకుల కుసుమం నువ్వు
ఎరగవు నీవెన్నడూ- నా ఎదలో నీ స్థానం
నా శృంగారపు దేవేరివి - నీవే నా రాధికా !
మాటలిన్ని చెప్పనెల - నా సుందర మల్లికా
ఒక ముక్కలొ చెబుతున్నా -నా జీవ ధార నీవని
తెలుసా నీకొరకె నేను -ఎన్ని జన్మలెత్తానో
సుడులుగొన్న సముద్రాన్ని -ఎంతెంతగ చిలికానో
వెతుకులాడుతూ నిన్ను -ఎచెటేచ టోతిరిగాను
కాల గమన ప్రవాహాన -ఆసి నుండి,అనంతానికి
అందరిపాలిట నేను -దారిద్ర్యన్నైతే ,
వారందరికీ నీవు -శిరులోలికే శ్రీ లక్ష్మివి
దుర్లభ మరకత మణీ-ప్రియే చారుశీలే
నీ అందపు ఆగ్రహం -ప్రేమకదే సంకేతం
నీహృదిలో నా హృదయం -మమేకమైపోయింది
నా శృంగారపు దేవేరివి నీవే నా రాధికా
ఓ మమతల మరకతమా -నా జీవధరవీవు
నీ మమతల కమ్మతనం -విదితమేను నాకు
నా ప్రేమ మాధుర్యం -ఎరిగింది కూడా నీవే
గుప్పెడంత నీ గుండెను -ఇప్పుడింక తెరువుమా
వెలుగుల రారాజు కూడా -వెనుతిరిగాడిక చూడు
సంగమించి పోనీ -ఇక నా హృది లొ నీ హృదయం
నాఆ హృదయపు సామ్రాజ్ఞీ-ప్రియే చారు శీలే
నీలోత్పలాలు బోలు -నీ కాటుక కన్నులు
కసి తో నిలువెల్ల నిండి -రక్తోత్పలలై నాయి
మానస కొలనెండిపోయి- నిస్పృహమైపో తోంది
పువ్వుల బాణం కాదు -మాధవుడ్ని జయించింది
వాస్తవమాలోచిస్తే -నీవేనే రాధికా
నీ చూపులొ వాడి ఐన -బాణాలున్నాయి
అడ్డగించ వీలు కాని -ప్రేమ పాశమూ వుంది
నీ వాడిఐన బాణాలు -గాయాపరచాయి నన్ను
ప్రేమ పాశాలెమో-నీ బందీ గా చేశాయి
నా హృదయపు దేవేరీ-ప్రియే చారుశీలే
అలుకలింకా మాని నువ్వు -చిరునగవులు చిందించు
నీ ఎదుటనే ఉన్నాడు -అందికలో నీ దోషి
నువు కోరే కృష్ణుడు -రాధికా లోలుడు
నీ ఆజ్ఞలు పాటించును -గాయ పడ్డ నీ ఖైదీ
ఆగ్రహాలు ఇప్పుడింక - తిరుగు ముఖం పట్టించు
అనుమానాలన్నీ ఇక -అందలానికంపేసెయ్
మెడలోనీ హారాన్ని -ఇటూ అటూ కదలనీ
నడుముకున్న మువ్వలన్ని - రవళించనియ్యి కొంచెంగా
నీ సుమ సదృశ పాదం - కొంచెం నావైపు చాపు
చిరకాలంగా ఒక కోరిక -కలవరపెడుతోంది నన్ను
సొగసుల నీ పదానికి -ఎర్రని పారాణి దిద్ది
అబ్బుపడి తబ్బిబ్బయ్-కరిగిపోవాలన్న
నా కామితమీడేర్చవా -యీరోజే త్వరితంగా
నా హృదయపు దేవేరీ !ప్రియే చారు శీలే !
నీ దోషి నీ ఎదుటే -నిల్చుని ఉన్నాడు
ఈరోజీ పనికూడా -చెయ్యవే నా చలియా
తన్ను నన్ను తమకం తో-రమ్యా నా రాధికా
నా శిరసున తదేకంగ -తాండవమే చెయ్యి
నీ పాదపు పారాణి తడి-నన్ను చేయునశోకునిగ
అప్పుడు నా శిరస్సు పైన -వికాశించును చూడు
నీ ప్రేమలో తడసిన -సహస్రదళపద్మాలు
నా హృదయపు సామ్రాజ్ఞీ- ప్రియే చారు శీలే
నీ మమతల అమృతము -అద్భుతమూ ,అఖండమ్
దహిస్తుంది దాని శక్తి -నాలోపలి వాసనలు
నవ పల్లవాల మించిన -నీ కోమల పాదాల చెంత
ఉంచా నా శిరస్సును -ప్రేమ మీర నా ప్రియా!
శాంతించిందిప్పుడు -దారుణ దావనలమ్
వెలుగుల రారాజిప్పుడు వెనుతిరిగి పోయాడు
కురిపించవె నా చెలియా నీ -చిరునగవుల కౌముదీ !!
प्रिये चारुशीले
(प्रिये चारुशीले मुंच मयि मानमनिदानम्
सपदि मदनानलो दहति मम मानसम्
देहि मुखकमल मधुपानम् !
– गीतगोविंद, दशम सर्ग)
प्रिये चारुशीले
जनालंत नेनॊक - भ्रमरान्नंटुन्नारु
नीक्कूडा आ माटे -निक्कमै तोचिंदि
ना ममतल मधुरिम-ऎंतग नीवेरिगिना
त्यजिंचावु नन्नु नीवु - तीवरिंचि तुरितंगा
नी चॆंतकु चेरालनि - नेनॆंतगानॊ तपिंचानु
चेति संज्ञ तॊडने - ननु चेरकुंड चेशावु
निनु ताकालनि ऎंतॆंतो - तहतहलाडा नेनु
चूपुवेलु चूपिंचि - चलिंचमंटु चंडिकवै
तरिमि तरिमि पंपावु -देशान्नुंचे नन्नु
वॆलुगुल राराजि प्पुडु -वॆनुतिरिगाडिंक चूडु
नेनग्गिलोन मग्गुतू -रोजंता निलबड्डा
नी कनु सैग ल कोसमने - निरीक्षिस्तु निल्चुन्ना
ऐना नीवॊक परैन - पिलुवलेदु नन्नु
मंडे कोपंतोटि -रोजंता ऎंडावु
नी कोपपु दावाग्नि-दहिस्तोंदि चूडु निन्नु
वॆलुगुल राराजिंका -वॆळ्लिपोयाडुकदा !
किनुकल तापान्निंका - तीरुचुकोरादा
क्रोधपु ज्वाल लोनीवु -ज्वलिंचिपोतुंटे
दग्धमैपोतोंदा - मानसपु सरोवरं
द्रविस्तोंदि चूडदिगो -हिम श्रुंगपु सोयगं
मदनुनिवल्ले काला -मंचुकॊंड करिगिंचुट
नी रोसपु रश्मिकदि - अवलीले अय्यिंदि
नी मुख पद्मं चिंदे - माधुर्यापु दानं तो
नी आग्रह अनलान्नि- अमृतंग मलचुको
ना हृदयपु राराज्ञी -प्रिये चारु शीले !
विनु कॊंचॆं ना माटिटु
निर्दोषिनि नेनंटू -निगदिंचनु नेनु
दोषिनि नेनुकुंटे -निक्कमुगा ने दोषिने
दंडन पॊंदालि नेनु -दंडिंचे हक्कु नीदि
रमणी ओ राजेशी !
नरुलनु भक्षिंचे - ऒक निट्रिल्लिन सिंहान्नि
नापै कॆगब्राकुटकु - निंकारग नीदेशिंचु
नुडितेलिन नखालतो -नुन्ननि ना वक्ष तलं
आक्रमिंचि चील्चि चील्चि - चिंदरवंदर चॆयनी
शरालंटि दंतालतो - बहुवुलनि जघनालनि
चील्चि चील्चि चंडाडि - गुच्चि गुच्चि पॊडवनी
बहुशा ई लागुनैन - नी प्रतिघातं तीरिते
ना वडलॆल्ला निंडिन -नी भ्रमपूरित कळंकालु
करिगि पोताएमोननि - ने कललु कंटुन्नानु
नन्नु नम्मु निक्कमिदे , ना प्रिये चारु शीले !
आ वसंत रातिरिलो - नुवु मिनहा इंकॆवरू
ना दरिदापुल्लो कूडा -चेरलेदु ,दूरलेदु
नीवु काक आन्युलॆवरु-ना नीडनैन चेरलेरु
ना लोपल ,ना वॆलुपल -नालुदिशला नन्नंता
अणुवणुवुनु आक्रमिंचि -अक्कुन चेरे अंदं
नीवुकाक इंकॆवरे- मुद्दुल ना राधा
इंकॊक्क निमुषमैना -नेनोर्वलेनु नी रोषं
कारणमे लेकुंडा पुट्टिन आ द्वेषं
रमणी ना हृदय राज्ञि !-प्रिये चारु शीले
कल्ला कपटं ऎरुगनि - कुलुकुल कुसुमं नुव्वु
ऎरगवु नीवॆन्नडू- ना ऎदलो नी स्थानं
ना शृंगारपु देवेरिवि - नीवे ना राधिका !
माटलिन्नि चॆप्पनॆल - ना सुंदर मल्लिका
ऒक मुक्कलॊ चॆबुतुन्ना -ना जीव धार नीवनि
तॆलुसा नीकॊरकॆ नेनु -ऎन्नि जन्मलॆत्तानो
सुडुलुगॊन्न समुद्रान्नि -ऎंतॆंतग चिलिकानो
वॆतुकुलाडुतू निन्नु -ऎचॆटेच टोतिरिगानु
काल गमन प्रवाहान -आसि नुंडि,अनंतानिकि
अंदरिपालिट नेनु -दारिद्र्यन्नैते ,
वारंदरिकी नीवु -शिरुलोलिके श्री लक्ष्मिवि
दुर्लभ मरकत मणी-प्रिये चारुशीले
नी अंदपु आग्रहं -प्रेमकदे संकेतं
नीहृदिलो ना हृदयं -ममेकमैपोयिंदि
ना शृंगारपु देवेरिवि नीवे ना राधिका
ओ ममतल मरकतमा -ना जीवधरवीवु
नी ममतल कम्मतनं -विदितमेनु नाकु
ना प्रेम माधुर्यं -ऎरिगिंदि कूडा नीवे
गुप्पॆडंत नी गुंडॆनु -इप्पुडिंक तॆरुवुमा
वॆलुगुल राराजु कूडा -वॆनुतिरिगाडिक चूडु
संगमिंचि पोनी -इक ना हृदि लॊ नी हृदयं
नाआ हृदयपु साम्राज्ञी-प्रिये चारु शीले
नीलोत्पलालु बोलु -नी काटुक कन्नुलु
कसि तो निलुवॆल्ल निंडि -रक्तोत्पललै नायि
मानस कॊलनॆंडिपोयि- निस्पृहमैपो तोंदि
पुव्वुल बाणं कादु -माधवुड्नि जयिंचिंदि
वास्तवमालोचिस्ते -नीवेने राधिका
नी चूपुलॊ वाडि ऐन -बाणालुन्नायि
अड्डगिंच वीलु कानि -प्रेम पाशमू वुंदि
नी वाडिऐन बाणालु -गायापरचायि नन्नु
प्रेम पाशालॆमो-नी बंदी गा चेशायि
ना हृदयपु देवेरी-प्रिये चारुशीले
अलुकलिंका मानि नुव्वु -चिरुनगवुलु चिंदिंचु
नी ऎदुटने उन्नाडु -अंदिकलो नी दोषि
नुवु कोरे कृष्णुडु -राधिका लोलुडु
नी आज्ञलु पाटिंचुनु -गाय पड्ड नी खैदी
आग्रहालु इप्पुडिंक - तिरुगु मुखं पट्टिंचु
अनुमानालन्नी इक -अंदलानिकंपेसॆय्
मॆडलोनी हारान्नि -इटू अटू कदलनी
नडुमुकुन्न मुव्वलन्नि - रवळिंचनिय्यि कॊंचॆंगा
नी सुम सदृश पादं - कॊंचॆं नावैपु चापु
चिरकालंगा ऒक कोरिक -कलवरपॆडुतोंदि नन्नु
सॊगसुल नी पदानिकि -ऎर्रनि पाराणि दिद्दि
अब्बुपडि तब्बिब्बय्-करिगिपोवालन्न
ना कामितमीडेर्चवा -यीरोजे त्वरितंगा
ना हृदयपु देवेरी !प्रिये चारु शीले !
नी दोषि नी ऎदुटे -निल्चुनि उन्नाडु
ईरोजी पनिकूडा -चॆय्यवे ना चलिया
तन्नु नन्नु तमकं तो-रम्या ना राधिका
ना शिरसुन तदेकंग -तांडवमे चॆय्यि
नी पादपु पाराणि तडि-नन्नु चेयुनशोकुनिग
अप्पुडु ना शिरस्सु पैन -विकाशिंचुनु चूडु
नी प्रेमलो तडसिन -सहस्रदळपद्मालु
ना हृदयपु साम्राज्ञी- प्रिये चारु शीले
नी ममतल अमृतमु -अद्भुतमू ,अखंडम्
दहिस्तुंदि दानि शक्ति -नालोपलि वासनलु
नव पल्लवाल मिंचिन -नी कोमल पादाल चॆंत
उंचा ना शिरस्सुनु -प्रेम मीर ना प्रिया!
शांतिंचिंदिप्पुडु -दारुण दावनलम्
वॆलुगुल राराजिप्पुडु वॆनुतिरिगि पोयाडु
कुरिपिंचवॆ ना चॆलिया नी -चिरुनगवुल कौमुदी !!
प्रिये चारुशीले
(प्रिये चारुशीले मुंच मयि मानमनिदानम्
सपदि मदनानलो दहति मम मानसम्
देहि मुखकमल मधुपानम् !
– गीतगोविंद, दशम सर्ग)
प्रिये चारुशीले !
उन्होंने मुझे भ्रमर कहा
और तुमने मान लिया,
मेरे प्रेम को जानते हुए भी
मुझे त्याग दिया।
पास आना चाहा
तो रोक दिया हाथ के इशारे से।
छूना चाहा
तो दे दिया देश-निकाला
तर्जनी उठाकर।
देखो, अब तो सूरज ढल गया,
मैं दिन भर धूप में खड़ा रहा
तुम्हारे संकेत की प्रतीक्षा करता,
पर बुलाया नहीं तुमने।
दिन भर सुलगती रहीं तुम भी तो,
दहकती रहीं अपनी ही आँच में।
देखो, अब तो सूरज ढल गया
ढल जाने दो इस ताप को भी।
दहक तुम रही हो
सुलग तुम रही हो
और जल रहा है मानसरोवर
पिघल रहा है हिमालय।
जो मन्मथ के किए न हुआ,
मानिनी! तुम्हारे रोष ने कर दिया।
इस आग को अमृत बना दो
मुख-कमल की माधुरी के दान से।
*
प्रिये चारुशीले !
सुनो तो –
मुझे कुछ नहीं कहना है
अपनी सफाई में।
जब तुमने
दोषी मान ही लिया मुझे,
तो हाँ, मैं हूँ दोषी;
दंड का अधिकारी।
राजराजेश्वरी !
भूखे आदमखोर शेर छोड़ दो मेरे ऊपर –
चिर जाने दो नाखूनों से मेरा वक्षस्थल,
क्षत-विक्षत हो जाने दो पैने दाँतों से
मेरी बाँहों और जंघाओं को।
शायद इस तरह
तृप्त हो तुम्हारी प्रतिहिंसा
और मिट जाएँ मेरे अंग-अंग पर लगे
मिथ्या लांछन।
सच मानो,
उस वासंती रात में कोई भी तो नहीं था मेरे पास,
सिवा तुम्हारे।
मेरे पास
कभी कोई हो भी कैसे सकता है
सिवा तुम्हारे?
एक तुम ही तो व्यापती हो, राधा !
मेरे भीतर –
- बाहर
- चहुँदिश;
बस यों ही सहा नहीं जाता
यह तुम्हारा अकारण रोष !
*
प्रिये चारुशीले !
बहुत भोली हो तुम।
नहीं जानतीं, तुम क्या हो मेरे लिए.
राधिके ! तुम मेरा शृंगार हो,
मेरा जीवन हो तुम।
जाने कितने जन्म लिए मैंने,
मथ डाले समुद्र जाने कितने,
जाने कहाँ-कहाँ खोजता फिरा तुम्हें
काल के प्रवाह में अनादि से अनंत तक।
मैं सदा का दरिद्र,
और तुम –
सदा की लक्ष्मी
- दुर्लभ रत्न सरीखी !
तुम्हारा कोप भी प्रेम ही है तुम्हारा।
मेरा हृदय तुम्हारा हृदय हो गया है।
राधिके ! शृंगार हो तुम मेरा,
दुर्लभ रत्न हो –
मेरा जीवन
हो;
मेरा हृदय
हो तुम !
तुम्हारे प्रेम को जानता हूँ मैं,
मेरे प्रेम से परिचित हो तुम
अब खुल जाने दो हृदय को।
देखो, अब तो सूरज ढल गया,
ढल जाने दो हृदय में हृदय को।
*
प्रिये चारुशीले !
रक्त कमल-सी दहक रही हैं तुम्हारी कजरारी आँखें
और पछाड़ें खा रहा है मानसरोवर तप-तपकर.
पुष्पधन्वा ने नहीं, तुमने
पराजित किया है कृष्ण को।
तुम्हारी दृष्टि में प्रखर शर भी हैं
और दुर्निवार पाश भी।
लो, मैं घायल भी हुआ
और बँध भी गया !
*
प्रिये चारुशीले !
अब मुस्करा दो,
प्रस्तुत है तुम्हारा अपराधी,
तुम्हारा कृष्ण।
तुम्हारे हर आदेश का पालन करेगा
तुम्हारा यह घायल कैदी।
अब क्रोध को जाने भी दो,
जाने दो संकोच को भी;
हिलने दो हृदय के हार को,
बजने दो करधनी के घुँघरुओं को।
उठाओ तो सही अपने कोमल चरण;
कब की इच्छा थी –
इन तलुओं को सरस महावर से रँगने की !
पूरी हो जाने दो आज वह चाह !
*
प्रिये चारुशीले !
तुम्हारा अपराधी तुम्हारे सामने नतमस्तक है।
आज यह भी हो जाने दो –
ठुकराओ, राधा ठकुरानी!
मेरे मस्तक को ठुकराओ |
गीले महावर में रचे तुम्हारे चरण
मुझे अशोक कर देंगे
और मेरे मस्तक पर खिल उठेंगे
तुम्हारी प्रीति के सहस्रों कमल !
*
प्रिये चारुशीले !
तुम्हारी प्रीति अमृत है,
वासना के विष को काटती है।
नव पल्लव से सुकोमल इन चरणों में
रख दिया है मैंने अपना सिर;
लो देखो, शांत हो गई सारी दारुण ज्वाला !
*
सूरज कब का ढल चुका,
अब तो मुस्कान की चाँदनी बरसा दो !
('प्रेम बना रहे' - पृष्ठ 55)
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