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रविवार, 7 नवंबर 2010

और कब तक

मैं लोकतंत्र में विश्वास रखता हूँ
किसी की आज़ादी में कटौती मुझे स्वीकार नहीं

उसे बंदूक चलाने की आज़ादी चाहिए
मेरी खोपड़ी उड़ाने के लिए

मेरे हाथ बँधे हैं, उसके खुले

1 टिप्पणी:

cmpershad ने कहा…

वह उस नारी जितना सुंदर भी नहीं कि कहते बने...
लड़ते है पर हाथ में तलवार भी नहीं