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सोमवार, 22 नवंबर 2010

चूहे की मौत

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है 
मैं बहुत फुर्तीला था 
बहुत तेज़ दौड़ता था 
बहुत  उछल कूद करता था 

तुमसे देखी नहीं गई
               मेरी यह जीवंतता
और तुम ले आए 
एक खूबसूरत सा 
खूब मज़बूत सा 
               पिंजरा 
सजा दिए उसमें
कई तरह के खाद्य पदार्थ 
               चिकने और कोमल 
               सुगंधित और नशीले 
महक से जिनकी 
फूल उठे मेरे नथुने 
फड़कने लगीं मूँछें
खिंचने लगा पूरा शरीर 
               काले जादू में बँधा सा 

जाल अकाट्य था तुम्हारा 
मुझे फँसना ही था 
               मैं फँस गया 

तुम्हारी सजाई चीज़ें 
मैंने जी भरकर खाईं
परवाह नहीं की 
क़ैद हो जाने की 

सोचा - पिंजरा है तो क्या 
               स्वाद भी तो है 
               स्वाद ही तो रस है 
               रस ही आनंद 
               'रसो वै सः' 

उदरस्थ करते ही स्वाद को 
मेरी पूरी दुनिया ही उलट गई 
यह तो मैंने सोचा भी न था 
झूठ थी चिकनाई 
झूठ थी कोमलता 
झूठ थी सुगंध 
और झूठ था नशा 

सच था केवल ज़हर 
               केवल विष 
जो तुमने मिला दिया था 
               हर रस में 

और अब 
तुम देख ही रहे हो
मैं किस तरह छटपटा रहा हूँ 


सुस्ती में बदल गई है मेरी फुर्ती 
पटकनी खा रही है मेरी दौड़ 
मूर्छित हो रही है मेरी उछल कूद 

मैं धीरे धीरे मर रहा हूँ 

तुम्हारे चेहरे पर 
उभर रही है एक क्रूर मुस्कान 
तुम देख रहे हो 
               एक चूहे का 
               अंतिम नृत्य 

बस कुछ ही क्षण में 
मैं ठंडा पड़ जाऊँगा

पूँछ से पकड़कर तुम 
फेंक दोगे मुझे 
बाहर चीखते कव्वों की 
               दावत के लिए!  


<21 सितंबर  2003>   

6 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

bhav gahre hain apki saral-sahaj kavita ke!

ajit gupta ने कहा…

ॠषभ जी, हम तो चूहे को फेंकते थे तो चील लेकर जाती थी। हा हा हाहा। बहुत ही सशक्‍त रचना है।

ऋषभ Rishabha ने कहा…

@ajit gupta

इस चूहे को कव्वे ले जाने वाले हैं .....अर्थात कम दुर्गत होगी!


@सुरेन्द्र सिंह " झंझट "

आगमन और टिप्पणी के लिए आभारी हूँ.

cmpershad ने कहा…

और तुम ले आए
एक खूबसूरत सा
खूब मज़बूत सा
पिंजरा
सजा दिए उसमें
कई तरह के खाद्य पदार्थ
चिकने और कोमल
सुगंधित और नशीले

यही तो होगा बाज़ारवाद का परिणाम। सफ़ेद कौवे ले जाएंगे मृत चूहों को :(

ऋषभ Rishabha ने कहा…

उपभोक्तावाद तो क्या उपभोग बल्कि भोग भर काफी है इस तमाम दुर्गत के लिए.

पर भर्तृहरि कह गए हैं न
- धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

आत्मगौरव की भावना से रहित केवल भोगने का सुख यही परिणति देता है - साधु !