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रविवार, 26 दिसंबर 2010

वह

मैं जब भी उससे मिलता हूँ आजकल
मेरी आँखें उसकी भोंहों के बीच टिक जाती हैं.

उसे पता भी नहीं चलता
और मुझे उसकी
पल-पल बदलती सूरतें दिख जाती हैं.

कभी वह पत्रकार दिखता हैं तो कभी कवि,
कभी जनता का नेता तो कभी तानाशाह.
रावण से लेकर हिटलर तक कितने रूप हैं उसके!

वैसे 'राम-राम' लिखता है
ऊपर से गांधी दिखता है.

(दो अक्टूबर 2003)

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