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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

भगवती, पत्‍नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ (पत्नीं मनोरमां देहि)



भगवती, पत्नी हमरा इच्‍छाआक अनुकूल दिअ
('पत्नीं मनोरमां देहि' का मैथिली अनुवाद)
हिंदी मूल - डॉ. ऋषभ देव शर्मा  *  मैथिली अनुवाद - अर्पणा दीप्ति



* व्यवस्था जरुरी थिक समाज के सुचारु संचालनकहेतु। ए॓हि हेतु
ओ ’घर’ आओर ’बाहर’ बँटवारा कयलनि

एकरा संगे-संगेबाँटि देलन्हि श्रम के।
जन्मना स्त्री होयबाक कारण, हमरा हिस्सा में ’घर’ आओर ’घर’ काज
आबि गेल।
ओ शै‌नेः शै‌नेः मालिक बनइत गेलाह आओर हम गुलाम।
हम चाहियोक अपन दायरा नहि बद‌इल सकलहूँ।
सेवा कयनाइ आब हमर भाग्य बनि चूकल छल।
 

* मालिक त मालिक होइत अछि।
गुलाम ओकरा लेल मेहनत आ उत्पादन करैत अछि।
हम औरत सब मिलक बुझि पर‌‍इत अछि जेना, अपन मेहनत आओर उत्पादन
मालिकक नाऊ क देल्हूँ।
घर बनयलहूँ हम- बसयलहूँ हम।
मालिक भ गेलाह ओ।
हमर मालिक त छलाह पहिलहि सँ, आब घरक मालिक सेहो भ गेलाह।
आओर त आओर हमर, धिया-पुता सेहो हमर नहि रहल।
उत्पादक स्‍त्री, उत्पादन स्‍त्रीक; उत्पाद मालिकक।
हमर परिश्रमक फल, हमर सृजनक फल- दुनु हमर नहि भेल।।
 

* देह सँ हम श्रम कयलहुँ आओर सृजन।
उत्पादन आओर पुनरुत्पादन- दुनु हमर मेहनत हमर भक हमर
नहि अछि।
नहि देह पर नहि घर-द्वार पर हमर अधिकार अछि।
अपना लेल, अपना शरीरक लेल, अपना घरक लेल, अपना
धिया-पुताक लेल- किछु फैसला करबाक अधिकार नहि अछि हमरा हाथ में।
सब फैसला कर लगलाह ओ- कहियो पिता ब‍इनक त कहियो
पति ब‍इनक।
ओ दिन सेहो आबि गेल जखन ओ फैसला लेब‍अ लगलाह,
स्‍त्री के जन्म लेबाक चाही वा नहि।
पुरुख विधाता बनि चुकल छल।
बुझि पर‍इत अछि विधाता केओ पुरुखे रहल हेताह- कखनो वा कहियो॥

* सब निर्णय हुनका हिस्सा में आबि गेल।
आओर हमरा हिस्सा में परल अनुकरण,अनुगमन,अनुपालन,अनुसरण।
बेशक ओ हमरा देवी बनाक पुजल‌इथ सेहो।
मुदा कतेक चलाकी सँ हमर अजादीक बंधक-पत्र पर दस्खत करवा लेलैथ।
भक्‍त बनि हमरा सामने अयलाह; आओर हाथ जोड़िक विनती कयलाह-
"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृतानुसारिणी/
तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम।"
हँ ! ओ हमरा पत्नी बना लेलाह-हमरा हुनकर आज्ञाक जरे-जरे
हुनकर मानसिक आ अप्रकट इच्छाक अनुसरण सेहो करअ परत।
अपन कुलीनता आ पवित्रताक बल पर, हुनका पाप‍अक दुर्गम
संसार सागर सँ बेड़ा पार सेहो लगावअ पड़त।
हम त साधन छी, हम माध्यम छी - मात्र हुनकर मुक्‍तिक लेल॥

* आओर हमर मुक्‍ति?

[हमर देहक मुक्‍ति, हमर मनक मुक्‍ति, हमर आत्माक मुक्‍ति ??
हमर व्यक्‍तिक मुक्‍ति, सामाजिक मुक्‍ति- आर्थिक मुक्‍ति आओर आध्‍यात्मिक मुक्‍ति ???
नहि हमर मुक्‍तिक कोई अर्थ नहि अछि -जखन तक हम परछाईं छी।
परछाईं कहियो मुक्‍त नहि हो‍इत अछि।
हम...परछाईं छी हम...चिरबद्ध परछाईं।
स्‍त्री नहि छी हम ?] 

पत्नीं मनोरमां देहि

* व्यवस्था ज़रूरी है समाज के सुचारू संचालन के लिए। इसलिए 
उन्होंने 'घर' और 'बाहर' का बंटवारा कर दिया।


इसी के साथ बंटवारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में 'घर' और 'घर का काम' आ गया।
वे धीरे-धीरे मालिक बन गए और मैं गुलाम।
मैं चाहकर भी अपना क्षेत्र नहीं बदल सकती थी।
सेवा करना ही अब मेरी नियति थी !


  • मालिक तो मालिक है।
गुलाम उसके लिए मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं।
हम औरतों ने भी अपनी मेहनत और अपना उत्पादन सब जैसे मालिक के नाम कर दिया।
घर बनाया हमने - बसाया हमने।
मालिक वे हो गए।
होते ही.
हमारे मालिक थे, तो हमारे घर के भी मालिक थे।
हमें बहलाना भी उन्हें खूब आता था।
वस्तुओं पर हमारे नाम अंकित कर दिए गए।
हम खुश।
पर सच तो यही था कि नाम भले हमारे लिखे गए हों, सब कुछ था मालिक का ही।
और तो और, हमारे बच्चे भी हमारे न थे।
उत्पादक स्त्री, उत्पादन स्त्री का; उत्पाद मालिक का।
हमारे श्रम का फल, हमारे सृजन का फल - दोनों ही हमारे न हुए.


  • देह से हमने श्रम भी किया और सृजन भी।
उत्पादन और पुनरुत्पादन - दोनों क्षमताएँ हमारी होकर भी हमारी न रहीं।
न देह और न घर - पर हमारा नियंत्रण रहा।
अपने बारे में, अपने शरीर के बारे में, अपने घर के बारे में, अपनी संतान के बारे में - कोई फैसला करने का हक हमारे पास नहीं रहा।
सारे फैसले हमारे लिए वे करने लगे - कभी पिता बनकर, तो कभी पति बनकर।
वह दिन भी आ गया जब स्त्री को जन्म लेना है या नहीं, यह भी वे ही तय करने लगे।
पुरूष विधाता बन गया।
शायद विधाता कोई पुरूष ही होगा - अगर कहीं हो, या कभी रहा हो।

  • सारे निर्णय उनके हिस्से में आए।
और मेरे हिस्से में आया अनुकरण, अनुगमन, अनुपालन, अनुसरण।
बेशक, उन्होंने मुझे देवी बनाकर पूजा भी।
पर कितनी चालाकी से मुझसे मेरी आजादी के बंधक-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए।
भक्त बनकर आए वे मेरे सामने; और हाथ जोड़कर याचना की -"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणी/तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम। "
हंह!उन्होंने मुझे पत्नी बना लिया - मुझे उनकी आज्ञाओं का ही नहीं, मानसिक और अप्रकट इच्छाओं का भी अनुसरण करना होगा,
अपनी कुलीनता औ पवित्रता के बल पर मैं उन्हें पापों के दुर्गम संसार सागर के पार ले जाऊं।
मैं तो साधन हूँ, माध्यम भर हूँ - उनकी मुक्ति के लिए।

  • और मेरी मुक्ति?

[मेरी देह की मुक्ति, मेरे मन की मुक्ति, मेरी आत्मा की मुक्ति??
मेरी वैयक्तिक मुक्ति, मेरी सामाजिक - आर्थिक मुक्ति, मेरी आध्यात्मिक मुक्ति???
नहीं, शायद मेरी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं - जब तक मैं छाया हूँ।
छाया कहीं कभी मुक्त होती है?
तो...छाया हूँ मैं...चिर बद्ध छाया?

स्त्री नहीं हूँ मैं?]

('देहरी', पृष्ठ 81)

2 टिप्‍पणियां:

Sriram Roy ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति... barbadhiya likhliye ahna..ples read my poetry www.sriramroy.blogspot.in and join..

आशा जोगळेकर ने कहा…

घर बनाया हमने मालिक वे बन गये । हम गुलाम ।

सुदर सच्ची अभिव्यक्ति ।