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सोमवार, 10 अप्रैल 2017

बारह त्रिपदियाँ


1.

नहीं पता होता, कल क्या होगा......
आज को उसकी छाया से क्यों नहीं बचा पाते हम.....
*
यह क्षण भी रिस गया,लो!

2.

रात का तीसरा पहर
गीता पढ़ लूँ
*
फाँसी के वक़्त सामान्य रहना है!

3.

घिर रहा नीला अँधेरा
सिकुड़ती हैं नसें.....
*
भोर के संगीत से सूरज नहीं उगता!

4.

आज वह मेरे पास बैठा
बहुत देर बैठा रहा
*
पहले सा गुस्सा नहीं आया ; प्यार भी तो नहीं!

5.

नागफनी बोई थी बरसों पहले
नादानी थी
*
बड़ा समझदार है काँटों का जंगल!

6.

जितने देखे सारे सपने चूर हो गए
जितने भी थे सारे अपने दूर हो गए
*
वह जिद्दी अब भी अपनों के सपने जीता है!

7.

कल जिन्होंने अभिनंदन किया था,
आज चीर हरण कर रहे हैं
*
सम्मान सत्ता का होता है, अपमान व्यक्ति का!

8.

क्रोध रिश्तों को ध्वस्त कर देता है
आजकल सभी बड़े क्रोध में हैं
*
दम तोड़ रहे हैं सारे रिश्ते!

9.

उसने मणियों को समझा कंकर-पत्थर
लुटाता रहा झोली भर-भर
*
नीलाम हो गया मणियों के बाज़ार में!

10.

इतने दिन से खड़ा हुआ था चौखट पर
आज कहा - भीतर आ जाओ
*
जब मुझको वापस जाना है!

11.
सुगंध ने बाँधा
फिर बाँधा सौगंध ने
*
आज बंधन टूटने को हैं सभी!

12.

हवाओं को डँस रहे हैं नाग
चाँद को निगल रही है अमावस
*
माँ, मुझे चंदन बनना है!

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