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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

बचपन की तलाश

वह खोए बचपन की तलाश करता हुआ अचानक बच्चों के बीच पहुँच गया।
पर यह देखकर सकते में आ गया कि बच्चे तो उससे ज़्यादा बूढ़े लगने लगे हैं।
तनाव और थकान से भरे बच्चे बड़े अजनबी से लगे उसे।
वे उसे पहचान भी नहीं सके।
वह भी कहाँ उन्हें पहचान सका था!
खिलना-खिलखिलाना वे भूल चुके थे - अभिनय ज़रूर कर रहे थे।
उसे याद आया; उसी ने तो दिया है बच्चों को यह असुरक्षित वर्तमान और अनिश्चित भविष्य।
••• और वह वापस अपनी काल कोठरी में लौट आया।

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