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रविवार, 20 दिसंबर 2009

सुन्दरता

सुन्दरता

http://balsabhaa.blogspot.com/2008/06/blog-post.html


मैंने फूलों को देखा खिलते हुए,

मैंने चिडियों को देखा चहकते हुए,


मैंने लहरों को देखा मचलते हुए,

मैंने बादल को देखा बरसते हुए,



मैंने किसान को देखा पसीना बहाते हुए,

मैंने लुहार को देखा लोहे सा तपते हुए


मैंने चाँद को देखा घटते-बढ़ते हुए,

मैंने सूरज को देखा चमकते हुए,



हर बार मुझे लगा,

यह दुनिया कितनी सुंदर है।


लोग इसे कुरूप क्यों बनाते हैं?
यह तो सचमुच सुंदर है!!!

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
Email- sanjay.kumar940@gmail.com