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रविवार, 20 दिसंबर 2009

मुझे मेरा पीहर लौटा दो

कब से देख रही हूँ रास्ता
माँ के घर से बुलावा आएगा
मैं पीहर जाऊँगी
सबसे मिलूँगी
बचपन से अपनी पसंद के पकवान
जी भर खाऊँगी
निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी

बरस भर से देख रही हूँ रास्ता

याद आता है बचपन
बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी
दूर पहाड़ी  की तलहटी में  खिलखिलाते गाँव से
घाटी के घर में,
भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी
पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर  ससुराल की घाटी से

कितनी बार कहा इमा से
कितनी बार कहा इपा  से
कितनी बार कहा तामो से

मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी
इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी

पर ब्याही गई इतनी ही दूर
काले कोसों
कहाँ घाटी में माँ का घर
कहाँ नौ  पहाड़ियों  के पार मेरी ससुराल

सबने यही कहा था
निंगोल चाक्कौबा  पर तो हर बरस आओगी ही
[इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ
घाटी और पहाड़ी की]
सारी सुहागिनें इस दिन
न्यौती जाती हैं माँ के घर

प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से
उपहार देगा भाई

हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे
निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक
विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे
भोजन कराते थे [चाक्कौबा]

घाटी और पहाड़ी का प्यार
इस तरह
बढ़ता जाता था हर बरस
सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व

पर इस बार
कोई बुलावा नहीं आया
कोई न्यौता नहीं आया

भाई भूल गया क्या?
माँ तू कैसे भूल गई
दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को?
मैं तड़प रही हूँ यहाँ
तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या?

माँ बेटी के बीच में
भाई बहन के बीच में
पर्वत  घाटी के बीच में
यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी???

क्यों अलगाते हो
पर्वत को घाटी से
भाई को बहन से
माँ को बेटी से ???

मुझे मेरा पीहर लौटा दो
मेरी माँ मुझे लौटा दो
मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!!

कब से देख रही हूँ रास्ता ........

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