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रविवार, 20 दिसंबर 2009

'न' कहने की सज़ा



'न' कहने की सज़ा
 
- उन्होंने जोरों से घोषणा की :
अब से तुम आजाद हो,
अपनी मर्जी की मालिक.
 
- मुझे लगा,
मैं अब अपने सारेनिर्णय ख़ुद लूंगी,
इन  देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना  पड़ेगा.
 
-मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी 
कि फ़रिश्ते आ गए. 
बोले-हमारे साथ चलो.
हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे.
 
-मैंने इनकार कर दिया.
मेरा अकेले उड़ने का मन था.
-फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए.
उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए.
गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई.
 
-सर्पविष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली 
और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन 
एक एक धमनी में समाती चली गई.
 
-मैं तड़प रही  हूँ.
फ़रिश्ते जश्न मना  रहे हैं - जीत का जश्न.
 
-जब जब वे मुझसे हारे हैं 
उन्होंने यही तो किया है.
 
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी ,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा,
तब तब या तो  मुझे 
आग के दरिया में कूदना पड़ा
या उन्होंने अपने अग्निदंश से
मुझे जीवित लाश बना दिया.
 
-जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी,
जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा
तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा
या महाभारत रचाना पड़ा.
 
-मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे 
कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे
कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी
कितनी बार....
कितनी बार...
 
-पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है
घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में ;
और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' 
तो वे सारी नफरत 
सारा तेजाब 
उलट देते हैं मेरे मुँह पर . 
 
-मैं अब नरक में हूँ
अन्धकार और यातना के नरक में . 
 
-अब मुझे नींद नहीं आती
आते हैं जागती आँखों डरावने सपने.
नहीं,
उड़ान के सपने नहीं,
आग के सपने 
तेजाब के सपने 
साँपों  के सपने
यातनागृहों के सपने
वैतरणी के सपने . 
 
-यमदूतो ! मुझे नरक में तो जीने दो!!

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