समर्थक

रविवार, 20 दिसंबर 2009

पुरुष विमर्श

1.
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
नन्हें हाथों में कलम धरी.
भाई! तेरा भी धन्यवाद
आगे आगे हर बाट करी.
तुम साथ रहे हर संगर में
मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद;
बेटे! तेरा अति धन्यवाद
हर शाम दिवस की थकन हरी.

शिव बिना शक्ति कब पूरी है
शिव का भी शक्ति सहारा है.
मेरे भीतर की अमर आग
को तुमने नित्य सँवारा है.
अनजान सफ़र पर निकली थी
विश्वास तुम्हीं से था पाया;
मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका कुछ श्रेय तुम्हारा है.

2.
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा भी धन्यवाद
तुम दूध छीन कर इठलाए ||
          संदेहों की शरशय्या दी
          पतिदेव! आपका धन्यवाद ;
बेटे! तुमको भी धन्यवाद
आरोप-दोष चुन-चुन लाए ||

मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
तुमसब के कद से बड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
          कलकल छलछल बहती सरिता
         जम गई अहल्या-शिला हुई;
मन की कोमलता कड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!

कोई टिप्पणी नहीं: