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सोमवार, 21 दिसंबर 2009

खसम हमारे की गली, लाल किले के पार।


दोहे : 15 अगस्त

0 सहसा बादल फट गया, जल बरसा घनघोर!
इसी प्रलय की राह में, रोए थे क्या मोर?!

0 चिडिया उडने को चली, छूने को आकाश।
तनी शीश पर काँच की, छत, कैसा अवकाश ?!

0 कहना तो आसान है, "लो, तुम हो आजाद'!
सहना लेकिन कठिन है, "वह' जब हो आजाद!!

0 कटी-फटी आजादियाँ, नुचे-खुचे अधिकार।
तुम कहते जनतंत्र है, मैं कहता धिक्कार!!

0 रहबर! तुझको कह सकूँ, कैसे अपना यार?
तेरे-मेरे बीच में, शीशे की दीवार!!

0 मैं तो मिलने को गई, कर सोलह सिंगार।
बख्तर कसकर आ गया, मेरा कायर यार॥

0 खसम हमारे की गली, लाल किले के पार।
लिए तिरंगा मैं खडी, वह ले कर हथियार॥

0 षष्ठिपूर्ति पर आपसे, मिले खूब उपहार।
लाठी, गोली, हथकडी, नारों की बौछार॥

0 ऐसे तो पहले कभी, नहीं डरे थे आप?
आजादी के दर पडी, किस चुड़ैल की थाप??

0 अपराधी नेता बने, पकडो इनके केश।
जाति धर्म के नाम पर, बाँट रहे ये देश॥

0 कैसा काला पड गया, लोकतंत्र का रंग।
अब ऐसे बरसो पिया, भीजे सारा अंग॥


15 अगस्त, 2007 

रविवार, 20 दिसंबर 2009

निवेदन


निवेदन



जीवन
बहुत-बहुत छोटा है,
लम्बी है तकरार!
और न खींचो रार!!

यूँ भी हम तुम
मिले देर से
जन्मों के फेरे में,
मिलकर भी अनछुए रह गए
देहों के घेरे में.


जग के घेरे ही क्या कम थे
अपने भी घेरे
रच डाले,
लोकलाज के पट क्या कम थे
डाल दिए
शंका के ताले?


कभी
काँपती पंखुडियों पर
तृण ने जो चुम्बन आँके,
सौ-सौ प्रलयों
झंझाओं में
जीवित है झंकार!
वह अनहद उपहार!!


केवल कुछ पल
मिले हमें यों
एक धार बहने के,
काल कोठरी
मरण प्रतीक्षा
साथ-साथ रहने के.


सूली ऊपर सेज सजाई
दीवानी मीराँ ने,
शीश काट धर दिया
पिया की
चौखट पर
कबिरा ने.


मिलन महोत्सव
दिव्य आरती
रोम-रोम ने गाई,
गगन-थाल में सूरज चन्दा
चौमुख दियना बार!
गूंजे मंगलचार!!


भोर हुए
हम शंख बन गए,
सांझ घिरे मुरली,
लहरों-लहरों बिखर बिखर कर
रेत-रेत हो सुध ली.


स्वाति-बूँद तुम बने
कभी, मैं
चातक-तृषा अधूरी,
सोनचम्पई गंध
बने तुम,
मैं हिरना कस्तूरी .


आज
प्राण जाने-जाने को,
अब तो मान तजो,
मानो,
नयन कोर से झरते टप-टप
तपते हरसिंगार!
मुखर मौन मनुहार!!




स्रोत: ताकि सनद रहे(कविता संग्रह) -२००२

नवसंवत्सर की शुभकामनाएँ !



"तेज़ धार का कर्मठ पानी,
चट्टानों के ऊपर चढ़कर,
मार रहा है
घूँसे कस कर
तोड़ रहा है तट चट्टानी !"
(केदारनाथ अग्रवाल). 

रूप की, गुण की,
निरंतर
कर्म की जय हो !!
नया वर्ष मंगलमय हो !!!
 

क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें






क्यों बड़बड़ाती हैं औरतें






नहीं मालूम कि अपने आप से बतियाना कैसी आदत है। नहीं मालूम, लोग ऐसे आदमी को कैसी नज़र से देखते होंगे.. फिर भी अच्छा लगता है अपने आप से बतियाना। कभी कभी अपने आप से गुँथ जाना - फल की अपेक्षा के बिना।

मैं ख़ुद से मुखातिब हुआ तो
लगा किसी ने कहा हो - बड़बड : आप ही आप ; औरतों की तरह. क्यों बडबडाती हैं औरतें ! नहीं, अब कहाँ बडबडाती हैं औरतें !अब तो वे खूब बोलती हैं. जाने कब से चुप थीं !!

जाने कब से चुप थी मैं!
शायद तब से जब पहली बार मुझसे मेरा मैं छीन लिया गया था .
 छीन लिया गया था मुझसे मेरा जंगल, मेरा खेत, मेरा शिकार, मेरी ताकत. कल तक सारी धरती सबकी साझी थी, घर भी साझा था।

कितना मनहूस था वह दिन जब किसी पिता ने किसी भाई ने किसी बेटे ने किसी पति ने किसी बेटी को
किसी बहन को
किसी मां को 
किसी पत्नी को सुझाव दिया था घर में रहने का, हिदायत दी थी देहरी न लांघने की और बंटवारा कर दिया था दुनिया का - घर और बाहर में.
बाहर की दुनिया पिता की थी - वे मालिक थे, संरक्षक थे.
 भीतर की दुनिया माँ की थी - वे गृहिणी थीं संरक्षिता थीं. माँ ने कहा था - मैं चलूंगी जंगल में तुम्हारे साथ; मुझे भी आता है बर्बर पशुओं से लड़ना !! हँसे थे पिता -तुम और जंगल? तुम और शिकार ??कोमलांगी, तुम घर को देखो. बाहर के लिए मैं हूँ न ! प्रतिवाद नहीं सुना था पिता ने और चले गए थे सावधान रहने का निर्देश देकर दरवाजे को उढकाते हुए. माँ रह गयी थी बड़बड़ाती हुई ........

बस तभी से बड़बड़ा रही हैं औरतें ............


पत्नीं मनोरमां देहि


पत्नीं मनोरमां देहि




* व्यवस्था ज़रूरी है समाज के सुचारू संचालन के लिए। इसलिए उन्होंने 'घर' और 'बाहर' का बंटवारा कर दिया


इसी के साथ बंटवारा कर दिया श्रम का।
जन्मना स्त्री होने के कारण मेरे हिस्से में 'घर' और 'घर का काम' आ गया।
वे धीरे-धीरे मालिक बन गए और मैं गुलाम।
मैं चाहकर भी अपना क्षेत्र नहीं बदल सकती थी।
सेवा करना ही अब मेरी नियति थी !


  • मालिक तो मालिक है।
गुलाम उसके लिए मेहनत करते हैं, उत्पादन करते हैं।
हम औरतों ने भी अपनी मेहनत और अपना उत्पादन सब जैसे मालिक के नाम कर दिया।
घर बनाया हमने - बसाया हमने।
मालिक वे हो गए।
होते ही.
हमारे मालिक थे, तो हमारे घर के भी मालिक थे।
हमें बहलाना भी उन्हें खूब आता था।
वस्तुओं पर हमारे नाम अंकित कर दिए गए।
हम खुश।
पर सच तो यही था कि नाम भले हमारे लिखे गए हों, सब कुछ था मालिक का ही।
और तो और, हमारे बच्चे भी हमारे न थे।
उत्पादक स्त्री, उत्पादन स्त्री का; उत्पाद मालिक का।
हमारे श्रम का फल, हमारे सृजन का फल - दोनों ही हमारे न हुए.


  • देह से हमने श्रम भी किया और सृजन भी।
उत्पादन और पुनरुत्पादन - दोनों क्षमताएँ हमारी होकर भी हमारी न रहीं।
न देह और न घर - पर हमारा नियंत्रण रहा।
अपने बारे में, अपने शरीर के बारे में, अपने घर के बारे में, अपनी संतान के बारे में - कोई फैसला करने का हक हमारे पास नहीं रहा।
सारे फैसले हमारे लिए वे करने लगे - कभी पिता बनकर, तो कभी पति बनकर।
वह दिन भी आ गया जब स्त्री को जन्म लेना है या नहीं, यह भी वे ही तय करने लगे।
पुरूष विधाता बन गया।
शायद विधाता कोई पुरूष ही होगा - अगर कहीं हो, या कभी रहा हो।

  • सारे निर्णय उनके हिस्से में आए।
और मेरे हिस्से में आया अनुकरण, अनुगमन, अनुपालन, अनुसरण।
बेशक, उन्होंने मुझे देवी बनाकर पूजा भी।
पर कितनी चालाकी से मुझसे मेरी आजादी के बंधक-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए।
भक्त बनकर आए वे मेरे सामने; और हाथ जोड़कर याचना की -"पत्नीं मनोरमां देहि, मनोवृत्तानुसारिणी/तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम। "
हंह!उन्होंने मुझे पत्नी बना लिया - मुझे उनकी आज्ञाओं का ही नहीं, मानसिक और अप्रकट इच्छाओं का भी अनुसरण करना होगा,
अपनी कुलीनता औ पवित्रता के बल पर मैं उन्हें पापों के दुर्गम संसार सागर के पार ले जाऊं।
मैं तो साधन हूँ, माध्यम भर हूँ - उनकी मुक्ति के लिए।

  • और मेरी मुक्ति?
मेरी देह की मुक्ति, मेरे मन की मुक्ति, मेरी आत्मा की मुक्ति??
मेरी वैयक्तिक मुक्ति, मेरी सामाजिक - आर्थिक मुक्ति, मेरी आध्यात्मिक मुक्ति???
नहीं, शायद मेरी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं - जब तक मैं छाया हूँ।
छाया कहीं कभी मुक्त होती है?
तो...छाया हूँ मैं...चिर बद्ध छाया?



स्त्री नहीं हूँ मैं?

जितने बंधन, उतनी मुक्ति


जितने बंधन, उतनी मुक्ति







मेरे पिताजी संस्कृत के अध्यापक थे।
आचार्य थे, ज्योतिषी थे.
अनेक शिष्य थे उनके , पुरूष भी, महिलाएं भी।
सभी उनके चरण स्पर्श करते थे आदर से॥
पर महिलाओं को - लड़कियों को - वे मना कर देते थे चरण छूने से।
सदा कहते - स्त्रियों को किसी के चरण नहीं छूने चाहिए - पति और ससुराल पक्ष के वरिष्ठों के अलावा।
कभी किसी ने पूछ लिया - गुरु जी के चरण स्पर्श में कैसी आपत्ति?
आपत्ति है, बेटा। मैं नहीं हूँ आपका गुरु. स्त्री का गुरु है उसका पति.-कहा था उन्होंने
बार बार याद आती है वह बात ; स्त्री का गुरु है उसका पति !!
मन ही मन कई बार पूछा पिताजी से - यह कैसा न्याय है आपका?
पति चुनने का अधिकार तो आपके समाज ने स्त्री से पहले ही छीन लिया था,
आपने गुरु चुनने का अधिकार भी छीन लिया?
आपने तो अपनी ओर से सम्मान दिया स्त्री जातक को, स्त्री जाति को
- चाहे वह किसी भी आयु की हो चरण छूने से रोक दिया; आशीर्वाद दिया, शुभ कामनाएँ दीं ।
अच्छा किया।
पर पति को गुरु घोषित करके कहीं स्त्री के लिए विद्या,ज्ञान और साधना द्वार पर एक स्थायी पहरेदार तो नहीं खड़ा कर दिया ?
वह जिज्ञासा मन में रही - बाल मन की जिज्ञासा थी।
पर आज भी जब कोई छात्रा चरण स्पर्श के लिए झुकती है तो उस आचरण का संस्कार द्विविधा में डाल देता है मुझे।
नहीं, नहीं; लड़कियाँ पैर नहीं छूतीं हमारे यहाँ
- सहज ही मुंह से निकल जाता है उन्हें बरजता यह वाक्य.
कई बार समझाना भी पड़ा है -
मैं आपकी श्रद्धा को समझता हूँ, लेकिन स्त्री पूजनीय है हमारे लिए;
अरे, हम तो कन्या के चरण स्पर्श करते हैं।
[कई बार अपने को टटोला तो यह भी लगा कि दम्भी हूँ - शायद इस तरह अपनी छवि बनाता होऊँगा।]कई बार सोचता हूँ - कैसा दोहरा व्यवहार है हमारा!
एक और हम उनके चरण स्पर्श करते हैं और दूसरी और आज भी पैर की जूती समझते हैं।
गृह लक्ष्मियों की जूतों से पूजा आज भी हो रही है- गाँव ही नहीं, शहर में भी; अशिक्षित घरों में ही नहीं, उच्च शिक्षित घरानों में भी।
जब तक अपना गुरु, अपना मार्ग, अपना मुक्ति पथ स्वयं चुनने की अनुमति नहीं, तब तक इस घरेलू हिंसा से बचना कैसे सम्भव है?
कहते हैं , एक समय की बात है
लोग भगवान बुद्ध के पास पहुंचे और शिकायत की कि यदि स्त्रियाँ बौद्ध भिक्षु बन जायेंगी तो हमारे घर कैसे चलेंगे ?
और तब महिलाओं के सम्बन्ध में तथागत ने यह व्यवस्था दी कि स्त्रियों को पिता,पति और पुत्र के आदेश से चलना चाहिए और उनकी अनुमति से ही संघ में सम्मिलित होना चाहिए।
यानि, मुक्ति पथ है स्त्रियों के लिए भी - पर सशर्त !
जब तक पुरूष न चाहे तब तक स्त्री को बंधन में रहना ही है!
ऊपर से यह सवाल कि कैसी मुक्ति?
किससे मुक्ति??
कितनी मुक्ति???
नहीं, व्याख्या की ज़रूरत नहीं।
मुक्ति चाहिए वहाँ वहाँ, जहाँ जहाँ बंधन हैं !!!
किसी के हाथ बंधे हों, पैर भी मुंह भी, आँख नाक कान भी।
और कोई किसी एक बंधन की कोई एक गाँठ खोलकर पूछे -
और कितनी गांठें खोलनी हूँगी?
मसीहा बनने चले हो तो सारी गांठें खोलो न !
एक भी गाँठ कहीं बंधी रह गई तो मुक्ति तो अधूरी रहेगी न?



मैं नीलकंठ नहीं हुई


मैं नीलकंठ नहीं हुई






वे आए और रेखाएं खींच गए
मेरे चारों ओर
मेरे ऊपर नीचे
सब तरफ़ रेखाएँ ही रेखाएँ
.
मेरे हँसने पर पाबंदी
मेरे बोलने पर पाबंदी
मेरे सोचने पर पाबंदी
.
हँसी, तो सभा में उघाड़ी गई
बोली, तो धरती में समाना पडा
सोचा, तो आत्मदाह का दंड भोगा
.
फिर भी मैंने कहा
मैं हँसूँगी
मैं बोलूँगी
मैं सोचूँगी
.
मैंने पैरों में घुंघरू बाँध लिए
और अपने साँवरे के लिए
नाचने लगी
.
नाचती रही
नाचती रही
.
उन्होंने मुझे पागलखाने में डाल दिया
कुलनाशी और कुलटा कहा
साँपों की पिटारी में धर दिया
.

मेरे अंग-अंग से साँप लिपटते रहे
दिन दिन भर
रात-रात भर
मेरे पोर-पोर को डंसते रहे
चूर-चूर हो गयीं
नाग फाँस में मेरी हड्डियां
.

फिर भी
मैं नाचती रही
नाचती रही
नाचती रही
अपने साँवरे के लिए
.
उन्होंने विष का प्याला भेजा
मेरा नाच रुक जाए
मेरी साँस रुक जाए
.

मैंने पी लिया
विष का प्याला
सचमुच पी लिया
कंठ में नहीं रोक कर रखा
.

मैं नीलकंठ नहीं हुई
सारी नीली हो गई
साँवरी हो गयी
साँवरे का रंग जो था
.

मैं हँसती रही
मैं नाचती रही
.

मैं रोती रही
आँसुओं से सींचकर
प्रेम की बेल बोती रही.
.

जाने कब से हँस रही हूँ
जाने कब से नाच रही हूँ
जाने कब से रो रही हूँ
अकेली
.

कभी तो आनंद फल लगेगा
कभी तो अमृत फल उगेगा
*

मुझे भी बालिग़ होना है ....



मुझे भी बालिग़ होना है ....






''मैं सत्पथ पर रहूँगी ,
या कुपथ पर चलूंगी,
यह जिम्मेदारी भी अपने ही सिर पर लेना चाहती हूँ.
मैं बालिग़ हूँ
और
अपना नफ़ा - नुकसान देख सकती हूँ.
आजन्म किसी की रक्षा में नहीं रहना चाहती,
क्योंकि रक्षा का कार्य
पराधीनता के सिवा कुछ नहीं.''
यह क्या बोले जा रही हूँ मैं ?
हाँ, याद आया 'प्रेमचंद' की 'सोफिया'
मिली थी 'रंगभूमि' में.
बस उसी की कही
जबान पर चढ़ गई !
सोफिया का तो पता नहीं
पर मुझे यह क्यों लगता है कि
उन्होंने सारी शिक्षाएं मेरे लिए ही बनाई हैं,
सारे उपदेश मेरे लिए हैं.
वे शिक्षित करके मुझे भली लडकी बनाना चाहते हैं.
भली लडकी
जो सिर झुकाए उनके पीछे चले,
उनके संरक्षण में रहे .
वे मेरी रक्षा के लिए
प्राण निछावर कर देंगे
अगर मैं उनके पथ को एकमात्र पथ समझूं..
सत्पथ हो या कुपथ
मैं अब अपने आप चुनूंगी अपना रास्ता
और वे मुझे स्वेच्छाचारिणी घोषित कर देंगे,
मैं दृढ़ता से चलूंगी अपने चुने रास्ते पर
और वे मुझे अपने घर से निकाल देंगे.
चलेंगे चालें
तरह तरह की-
मैं आ जाऊं वापस उनकी सुरक्षा में,
उनके संरक्षण में,
उनकी ठोकरों में.
पर सोफिया की तरह
मुझे भी समझ आने लगा है
सुरक्षा का अर्थ!
जिसे सुरक्षा की गारंटी दी जा रही है,
उसे स्वतंत्रता की ज़रूरत ही क्या है
चिंता मुक्त हो कर
विवेक खोकर
व्यक्तित्व खोकर
अपना आपा खोकर-
सुरक्षा का सुख लेते रहना है बस!
सौदा तो अच्छा है!
पर बहुत महंगा सौदा है.
ठीक कहती है सोफिया
सही चुनूँ या ग़लत
पर चुनूँ तो सही!
मुझे ख़ुद उठानी है अपनी ज़िम्मेदारी!
हजारों साल हो गए
मैं अभी तक कमसिन हूँ;
मुझे भी बालिग़ होना है,
अपने फैसले ख़ुद करने है,
हानि लाभ की पहचान करनी है.
वे कहते हैं,
तुम लड़की हो!
तुम क्या फैसले लोगी?
तुम क्या पहचान करोगी?
मेरी समझ में नहीं आता:
वे तो जन्म से पुरुष हैं
फिर उन्होंने आज तक तमाम ग़लत फैसले क्यों लिए?
आज तक अपने पराये तक को नहीं पहचाना?
उन्हीं के फैसलों ने तो
धरती को युद्ध और आतंक से भर छोड़ा है!
विस्फोटों से दहलती हुई यह दुनिया उन्ही की बनाई है न?
वे न तो अस्पताल को बख्शते हैं
न पाठशाला को.
वे आज भी जंगली हैं?
औरतों को उनसे आज भी वैसे ही डरना होता है
जैसे भेडियों और लक्कड़बग्घों से?
अभी उनका सभ्य होना शेष है.
जब तक वे सभ्य नहीं होते -
युद्ध होते रहेंगे,
आतंक बना रहेगा,
लोग मरते रहेंगे,
बच्चे रोते रहेंगे,
औरतें चीखती रहेंगी !
बस इसीलिए
वे औरतों को बनाए रखते है कमसिन
और करते रहते हैं रक्षा,
मेरी नहीं,
अपने जंगलीपन की!
हजारों साल हो गए,
वे अभी तक जंगली हैं ;
पर मैं अब बालिग़ हो गई हूँ!!


गुड़िया-गाय-गुलाम




गुड़िया-गाय-गुलाम


परसों तुमने मुझे
चीखने वाली गुड़िया समझकर
जमीन पर पटक दिया
और पैरों से रौंद डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 0
कल तुमने मुझे
अपने खूंटे की गाय समझकर
मेरे पैरों में रस्सी बाँध दी
और मेरे थनों को दुह डाला पर मैंने कोई शिकायत नहीं की. 0 आज तुमने मुझे
अपने हुक्म का गुलाम समझ कर
गरम सलाख से मेरी जीभ दाग दी है और अब भी चाहते हो
मैं कोई शिकायत न करूँ. 0 नहीं! मैं गुड़िया नहीं,
मैं गाय नहीं,
मैं गुलाम नहीं!! 0

 http://streevimarsh.blogspot.com/2008/08/blog-post_20.html

कई नाम दिए उन्होंने मुझे



कई नाम दिए उन्होंने मुझे

उन्होंने मुझे
एक नाम दिया - माँ
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
बहुत सारी स्वतंत्रताएं
दुहने की ज़मीन की तरह मुझे
और उपेक्षित छोड़ देने की. * उन्होंने मुझे
दूसरा नाम दिया - बहन
और अपने लिए सुरक्षित कर लिए
बहुत सारे अधिकार
मेरा अधिकार हड़पने के
और उपेक्षित छोड़ देने के . * उन्होंने मुझे
तीसरा नाम दिया - पत्नी
और अपने लिए सुरक्षित कर लिया
दुनिया भर का प्रभुत्व और वर्चस्व
मेरा सर्वस्व हरण करने को
और उपेक्षित छोड़ देने को. * उन्होंने मुझे
चौथा नाम दिया - बेटी
और अपने लिए सुरक्षित कर लीं
स्वर्ग की सीढियां , करके कन्यादान
बाँध कर पराये खूंटे पर अरक्षित मुझे. * उन्होंने मुझे
एक और नाम दिया - वेश्या
और आरक्षित कर ली अपने लिए
भूमिका पतितपावन , उद्धारक और मसीहा की
धकेलते रहने को बार बार मुझे
उनकी अपनी वासना के नरक में .......
*************************************************





संक्रांति



प्रतीक्षा है सूर्य के उत्तरायण होने की..
अस्थियों में पैठा मरणान्तक अवसाद तब शायद कुछ पिघले.
अशुभ जो अभी अभी छूकर गुज़र गया .
उसकी छायाओं पर
संक्रांति की शुभ कामना की धूप........


हाँ,
सुबह का इन्तज़ार बेहद ज़रूरी है
हमें भी है.

नव संवत्सर शुभाकांक्षा





गए बरस की दहशतगर्दी
ठिठुरन सी भर गई नसों में,
नया बरस
कुछ तो गरमाहट लाए .........

अभिनव शाकुंतल




यह दूसरी शकुंतला
यह दूसरा दुष्यंत.
इस बार फिर
गान्धर्व विवाह,
इस बार फिर
वही
अपरिचय का नाटक,
वे ही लांछन, वे ही धक्के।



और फिर
आ गया है चक्रवर्ती
भूल के अपराध को
भूल जाने को,
भोली शकुंतला को
राजमहल के
स्वप्न दिखाने को।



शकुंतला
लेकिन शकुंतला नहीं रही.
प्रेम का मायाजाल
और नहीं मोह पाया.
आँखें अंगार हुईं,
उठ गई तर्जनी।




तर्जनी संकेत पर
सिंहों से खेलता
बालक भरत
बोला पास आकर यों-



राजरानी कौन,
राजमाता मैं बनाऊँगा.
सिंहासन मेरा है,
भीख नहीं लूँगा मैं

राजा से छीन लाऊँगा.



मर्दिता




बहुत मार खाई मैंने 
तुम्हारे लिए ,
तुम्हारे प्यार के लिए.


मैंने सपने देखे ,
तुम्हें अपना माना 
और बहुत मार खाई 
पिता के हाथों,
समाज के हाथों भी :
भला यह भी कोई बात हुई 
कि औरत सपने देखे  
कि औरत प्यार करे 
कि औरत इज़हार करे!


मेरा अंग अंग रोता रहा 
एक स्पर्श के लिए 
और तुम 
रौंदते रहे मुझे 
मिट्टी समझकर.


बहुत मार खाई मैंने 
तुम्हारे लिए,
तुम्हारे हाथों!  

    http://streevimarsh.blogspot.com/2009/12/blog-post.html                           

पुरुष विमर्श

1.
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
नन्हें हाथों में कलम धरी.
भाई! तेरा भी धन्यवाद
आगे आगे हर बाट करी.
तुम साथ रहे हर संगर में
मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद;
बेटे! तेरा अति धन्यवाद
हर शाम दिवस की थकन हरी.

शिव बिना शक्ति कब पूरी है
शिव का भी शक्ति सहारा है.
मेरे भीतर की अमर आग
को तुमने नित्य सँवारा है.
अनजान सफ़र पर निकली थी
विश्वास तुम्हीं से था पाया;
मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका कुछ श्रेय तुम्हारा है.

2.
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा भी धन्यवाद
तुम दूध छीन कर इठलाए ||
          संदेहों की शरशय्या दी
          पतिदेव! आपका धन्यवाद ;
बेटे! तुमको भी धन्यवाद
आरोप-दोष चुन-चुन लाए ||

मैं आज शिखर पर खड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
तुमसब के कद से बड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!
          कलकल छलछल बहती सरिता
         जम गई अहल्या-शिला हुई;
मन की कोमलता कड़ी हुई
इसका सब श्रेय तुम्हारा है!

मुझे मेरा पीहर लौटा दो

कब से देख रही हूँ रास्ता
माँ के घर से बुलावा आएगा
मैं पीहर जाऊँगी
सबसे मिलूँगी
बचपन से अपनी पसंद के पकवान
जी भर खाऊँगी
निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी

बरस भर से देख रही हूँ रास्ता

याद आता है बचपन
बड़ी बहन इसी दिन हर बरस आती थी
दूर पहाड़ी  की तलहटी में  खिलखिलाते गाँव से
घाटी के घर में,
भाभी इसी दिन हर बरस जाती थी
पर्वत शिखर से बतियाते अपने पीहर  ससुराल की घाटी से

कितनी बार कहा इमा से
कितनी बार कहा इपा  से
कितनी बार कहा तामो से

मैं इतनी दूर नहीं जाऊँगी
इतनी दूर ब्याही गई तो जी नहीं पाऊँगी

पर ब्याही गई इतनी ही दूर
काले कोसों
कहाँ घाटी में माँ का घर
कहाँ नौ  पहाड़ियों  के पार मेरी ससुराल

सबने यही कहा था
निंगोल चाक्कौबा  पर तो हर बरस आओगी ही
[इस दिन मिट जाती हैं सब दूरियाँ
घाटी और पहाड़ी की]
सारी सुहागिनें इस दिन
न्यौती जाती हैं माँ के घर

प्रेम से भोजन कराएगी माँ अपने हाथ से
उपहार देगा भाई

हमारे मणिपुर में इसी तरह तो मनाते थे
निंगोल चाक्कौबा पिछले बरस तक
विवाहित लड़कियों [निंगोल] को घर बुलाते थे
भोजन कराते थे [चाक्कौबा]

घाटी और पहाड़ी का प्यार
इस तरह
बढ़ता जाता था हर बरस
सारा समाज मनाता था मणिपुरी बहनापे का पर्व

पर इस बार
कोई बुलावा नहीं आया
कोई न्यौता नहीं आया

भाई भूल गया क्या?
माँ तू कैसे भूल गई
दूर पहाड़ी पार ब्याही बेटी को?
मैं तड़प रही हूँ यहाँ
तुम वहाँ नहीं तड़प रहीं क्या?

माँ बेटी के बीच में
भाई बहन के बीच में
पर्वत  घाटी के बीच में
यह राजनीति कहाँ से आ गई अभागी???

क्यों अलगाते हो
पर्वत को घाटी से
भाई को बहन से
माँ को बेटी से ???

मुझे मेरा पीहर लौटा दो
मेरी माँ मुझे लौटा दो
मेरा निंगोल चाक्कौबा लौटा दो !!!

कब से देख रही हूँ रास्ता ........

यो मे प्रतिबलो लोके

तुम तो त्रिलोक के स्वामी हो. तुमने देवों को जीता है.
सब रत्न तुम्हारे चरणों में.
सब पर अधिकार तुम्हारा है.
तुमने ऐरावत छीन लिया
बिगडे घोड़ों को साधा है.
धरती पर्वत आकाश वायु
पाताल सिंधु को बाँधा है.

तुमने मुझको भी रत्न कहा .
चाहा किरीट में जड़ लोगे.
जीवित ज्वाला की लहरों को
अपनी मुट्ठी में कर लोगे.

मुझको यह प्रभुता रास नहीं.
मैं रत्न नहीं! मैं दास नहीं!

तेरा स्वभाव तो प्रभुता का .
'ना' सुनने का अभ्यास नहीं.

तेरी लोलुपता आहत हो
मेरे केशों की ओर बढ़ी.
तू मुझे धरा पर खींचेगा,
मेरी मर्यादा नोंचेगा;
था ज्ञात मुझे तू इसी तरह
वश में करने की सोचेगा.

पर मेरे केश नहीं आते
तेरे जैसों की मुट्ठी में.
मैं तिरस्कार का कालकूट
पी चुकी प्रथम ही घुट्टी में.
मैं कोमल मधुमय दीपशिखा
आशीष बरसने वाली हूँ.
अपनी करुणा की किरणों से
रसधार सरसने वाली हूँ.
पर मैं ही ज्वालामुखी शिखर.
मैं ही श्मसान का आर्तनाद.
प्राणों में झंझावात लिए
मैं प्रलय निशा का शंखनाद.
तू मुझको जान नहीं पाया.
कोई न अभी तक भी जाना.
मैं वस्तु नहीं, जीवित प्राणी.
पर तूने मुझे भोग्य माना.

बस इसीलिए तो मुझको यह
संग्राम जीतना ही होगा.
जो सचमुच मेरा प्रतिबल हो
वह प्रणय खोजना ही होगा!

जाने कैसी स्त्री थी वह

जाने कैसी स्त्री थी वह ,
कितनी धीर ,
कितनी सबल !

कैसे कहा होगा उसने
माता पिता से,
पीहर और ससुराल से -
- नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं
- न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को
- गुडिया के खेल तक की समझ न थी मुझे
विवाह की समझ कैसे होती
- आपका दिया यह पति मेरा पति नहीं !

कैसे टटोला होगा अपने आप को
जवाब दिया होगा दुनिया को -

- बंधन है बिना प्रेम का विवाह
और मुझे अस्वीकार
- कोई पुरुष दीखा ही नहीं
प्रेम के योग्य ;
एक परमपुरुष के सिवा
- वह आलोकसुंदर परमपुरुष ही मेरा प्रियतम है !

कैसे किया होगा सामना
तन मन को बींधती ज़हरबुझी नज़रों का ,
नकारा होगा अध्यात्म का भी आकर्षण
तोड़कर शृंखला की कड़ियाँ सारी
भारी -

- स्त्री पुरुष में जो भेद करे
वह धर्म मेरा नहीं
- स्त्री जाति से जो भयभीत हो
वह गुरु मेरा नहीं !

कैसे बाँटा होगा उसने अपने अस्तित्व को
अपने स्वयं रचे परिवार में -
किसी विधवा नौकरानी को
किसी सेवक को
किसी जिज्ञासु को
किसी गाय, किसी
गिलहरी , किसी मोरनी को !

उसने जीते जी मुक्ति अर्जित की
विराटता सिरजी -
कभी बदली
कभी दीप
कभी कीर बनकर.
उसी ने दिखाया मुक्ति का मार्ग मेरी स्त्री को
संपूर्ण आत्मदान के बहाने
न्यस्त करके स्वयं को
सर्वजन की आराधना में .

वह सच ही महादेवी थी !!

हे अग्नि!



हे अग्नि!

तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।


बहुत क्षमता है तुममें बड़ा ताप है -

बड़ी जीवंतता।

तुम जल में भी सुलगती हो और वायु में भी,

भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो

और व्यापती हो आकाश में भी तुम।

हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम

प्राण बनकर।


परमपावनी!

तुममें अनंत संभावनाएँ हैं

तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में।

फूँकती हो तुम सारे कलुष को,

शोधती हो फिर-फिर

हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को।

तुम ही तो जगती हो हमारे अग्निहोत्र में

और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो

संध्या के दीप की लौ में हम।




जगो, आज फिर,

खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर

डँसता है प्रकाश की किरणों को,

फैलाता है अँधेरे का जाल

उगलता है भ्रम की छायाओं को।




उठो,

तुम्हें करना है

छायाओं में छिपे सत्य का शोध।

तुम चिर शोधक हो,

हे अग्नि! तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।


राधा क्या चाहे




''राधिके!''
''हूँ?''
''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?''
''पता नहीं.''


''पौरुष?''
''होगा.
बहुतों में होता है.''


''सौंदर्य?''
''होगा.
पर वह भी बहुतों में है.''


''प्रभुता?''
''होने दो.
बहुतों में रही है.''


''फिर क्यों खिंची जाती है तू
बस उसी की ओर?''
''उसे मेरी परवाह है न!''

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अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी !

दो बेटे हैं मेरे.
बहुत प्यार से धरे थे मैंने
इनके नाम - बलजीत और बलजोर!

गबरू जवान निकले दोनों ही.
जब जोट मिलाकर चलते,
सारे गाँव की छाती पर साँप लोट जाता.
मेरी छातियाँ उमग उमग पड़तीं.
मैं बलि बलि जाती
अपने कलेजे के टुकडों की!

वक़्त बदल गया.
कलेजे के टुकडों ने
कलेजे के टुकड़े कर दिए.
ज़मीन का तो बँटवारा किया ही,
माँ भी बाँट ली!

ज़मीन के लिए लड़े दोनों
- अपने अपने पास रखने को,
माँ के लिए लड़े दोनों
- एक दूसरे के मत्थे मढ़ने को!

बलजोर ने बरजोरी लगवा लिया अँगूठा
तो माँ उसके काम की न रही,
बलजीत के भी तो किसी काम की न रही!

दोनों ने दरवाजे बंद कर लिए,
मैं बाहर खड़ी तप रही हूँ भरी दुपहरी;
दो जवान बेटों की माँ!

जीवन भर रोटी थेपती आई.
आज भी जिसका चूल्हा झोंकूँ,
रोटी दे दे ...शायद!